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भारतीय विज्ञान और 'गैर-आवश्यक उद्योगों' पर कर का विवाद: कर-आधारित' समाधान बनाम वास्तविक संरचनात्मक सुधार
सामान्य अध्ययन पेपर – III: प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
संदर्भ
भारतीय विज्ञान अनुसंधान में वित्तपोषण की कमी एक चिरकालिक और गंभीर मुद्दा रही है। इस चुनौती से निपटने के लिए अक्सर यह लोकप्रिय समाधान प्रस्तुत किया जाता है कि सिनेमा, पर्यटन, परिधान और इत्र जैसे 'अवैौद्धिक' या गैर-आवश्यक उद्योगों पर भारी कर लगाकर वैज्ञानिक अनुसंधानों के लिए एक बड़ा कोष तैयार किया जाए। यह आलेख इस 'टैक्स-दिस-टू-फंड-दैट' की अवधारणा की आर्थिक व्यवहार्यता और इसके निहितार्थों का गहराई से परीक्षण करता है।
'गैर-आवश्यक' या 'तुच्छ' उद्योग क्या हैं?
परिभाषा और दायरे: समाज में उन उद्योगों को ' गैर-आवश्यक' (Frivolous) मान लिया जाता है जो विलासिता, फैशन या मनोरंजन से जुड़े हैं और जिन्हें मानवीय जीवन की अनिवार्य प्राथमिकताओं में नहीं गिना जाता।
- व्यापक आर्थिक योगदान: इस श्रेणी में आने वाले क्षेत्र जैसे सिनेमा, पर्यटन और पेशेवर खेल केवल विलासिता तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये अर्थव्यवस्था के व्यापक पहिए हैं।
चर्चा में क्यों
आईपीएल पर कर का प्रस्ताव: हाल ही में भारत के एक प्रमुख अनुसंधान संस्थान के शिक्षाविद् ने इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) पर भारी कर लगाने का सुझाव दिया, जिसके तहत वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए "$15 बिलियन" का भारी-भरकम कोष जादुई रूप से जुटाने का दावा किया गया।
- जनमानस में लोकप्रियता: इस प्रकार के सुझाव तुरंत लोकप्रिय हो जाते हैं क्योंकि यह आम जनमानस में एक सहज और नैतिक अपील पैदा करते हैं कि एक 'फायदेमंद' व्यवसाय को एक 'नेक' वैज्ञानिक उद्देश्य के लिए धन देना चाहिए।
हालिया घटनाक्रम
तुलनात्मक विमर्श: यह बहस तब और तेज हो गई जब अकादमिक गलियारों में यह तर्क दिया गया कि मनोरंजन या खेल आयोजनों का भारी-भरकम मुनाफा और प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक उपकरणों (जैसे सेंट्रीफ्यूज) की भारी किल्लत एक-दूसरे के पूरक या परस्पर विरोधी हैं।
- समर्थन बनाम वास्तविकता: हालांकि इस तरह के "मास्टरस्ट्रोक" सुझावों को तात्कालिक वाहवाही मिलती है, लेकिन अर्थशास्त्री इसे व्यावहारिक नहीं मानते।
मुख्य चिंताएं
रोजगार और कैस्केड प्रभाव: संगठित खेल या मनोरंजन जैसे क्षेत्र मर्चेंडाइज, खाद्य-पेय, प्रसारण, फिजियोथेरेपी और खेल विज्ञान जैसे कई सहायक उद्योगों में लाखों रोजगार पैदा करते हैं। इन पर कर का कुठाराघात पूरे इकोसिस्टम को प्रभावित कर सकता है।
- कृत्रिम नैतिक विभाजन: उद्योगों को 'जरूरी' और 'गैर-जरूरी' के खानों में बांटना और यह मान लेना कि एक की सफलता दूसरे की बर्बादी पर टिकी है, एक खतरनाक नीतिगत दृष्टिकोण है।
'तुच्छ उद्योगों' पर कर का तर्क
वित्तीय सुगमता का भ्रम: समर्थकों का यह तर्क रहता है कि बड़े पैमाने पर लाभ कमाने वाले खेल या फिल्म उद्योगों पर कर की दरें बढ़ाकर विज्ञान क्षेत्र की वित्तीय समस्याओं को तुरंत दूर किया जा सकता है।
- नैतिक दायित्व: इसके पीछे यह विचार काम करता है कि समाज के धन का एक हिस्सा अनिवार्य रूप से विज्ञान और तकनीकी प्रगति की 'उच्चतर' वेदी पर समर्पित होना चाहिए।
तर्क की सीमाएं
जीरो-सम गेम की भूल: यह मानना कि धन एक स्थिर या 'फिक्स्ड पाई' है और X की प्रगति Y की कीमत पर ही संभव है, आर्थिक रूप से पूरी तरह गलत है। इतिहास गवाह है कि प्रगति शून्य-योग नहीं होती।
- राजकोषीय अविश्वास और नौकरशाही: राज्य द्वारा जुटाए गए करों का पुनर्निर्देशन अक्सर अत्यधिक नौकरशाही, रिसाव और राजनीतिक प्राथमिकताओं (जैसे चुनावी लाभ) की भेंट चढ़ जाता है, जिससे विज्ञान तक वास्तविक लाभ नहीं पहुंच पाता।
भारत की वास्तविक संरचनात्मक बाधाएं
अप्रचलित कानून और भर्ती प्रक्रिया: भारत में वैज्ञानिकों की भर्ती आज भी पुराने और रूढ़िवादी 'विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम (1956)' के दायरे में संचालित होती है, जिससे कई प्रतिभाशाली वैज्ञानिक विदेशों की ओर पलायन कर जाते हैं।
- खरीद और लालफीताशाही की जकड़न: सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) और अत्यधिक कठोर खरीद नियम (जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स और कंस्यूमेबल्स के बीच अव्यवहारिक वर्गीकरण) के कारण वैज्ञानिक अपनी जरूरत का सामान समय पर नहीं खरीद पाते। इसके चलते 'आवश्यकता' के बजाय 'अनुमत' सामान खरीदने की विवशता होती है।
- निजी निवेश पर अंकुश: CSR नियमों की सख्त अनुपालन शर्तें, FCRA की जटिल प्रक्रियाएं और भारी आयात शुल्क भारतीय विज्ञान में निजी पूंजी के प्रवाह और विदेशी अनुदान को रोकते हैं।
आगे का रास्ता
बॉटलनेक्स का उदारीकरण: सरकार को उद्योगों पर कर लगाने के बजाय विज्ञान के आंतरिक खरीद नियमों, लालफीताशाही और नौकरशाही के नियंत्रण को उदार बनाना चाहिए।
- निजी बंदोबस्त को प्रोत्साहन: निजी क्षेत्र और कॉर्पोरेट जगत के दान को अनुसंधान के क्षेत्र में आकर्षित करना चाहिए, क्योंकि एक निजी निवेशक का हित अनुसंधान की सफलता में किसी अज्ञात नौकरशाह से कहीं अधिक होता है।
- कर रियायतें: वैज्ञानिक उपकरणों पर से भारी आयात शुल्क और जीएसटी (GST) को हटाना चाहिए ताकि अनुसंधान की लागत कम हो सके।
निष्कर्ष
विज्ञान के विकास का मार्ग नए करों के बोझ तले नहीं, बल्कि नीतिगत बाधाओं से मुक्ति में निहित है। अर्थव्यवस्था के कुछ सफल क्षेत्रों यानी "सोने के अंडे देने वाली उन मुर्गियों" को दंडित या करों से दबाने के बजाय, हमें उन वित्तीय और प्रशासनिक चैनलों को पारदर्शी व उदार बनाना होगा जिनके जरिए पूंजी सहजता से शिक्षा जगत तक पहुंच सके। यही दृष्टिकोण भारत को वैश्विक वैज्ञानिक नेतृत्व की दिशा में आगे ले जा सकता है।
संख्यात्मक हरितीकरण बनाम पारिस्थितिक बहाली: “पेड़ों के लिए जंगल खोना” की प्रशासनिक और विश्लेषणात्मक समीक्षा
सामान्य अध्ययन पेपर – III: प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
संदर्भ
भारत जैसे विकासशील और जैव विविधता से संपन्न राष्ट्र में, वन केवल लकड़ी या कच्चे माल के स्रोत नहीं हैं, बल्कि वे पारिस्थितिक स्थिरता, जलवायु परिवर्तन के शमन और ग्रामीण आजीविका के मुख्य आधार हैं। वैश्विक मंचों पर भारत ने अपनी पर्यावरणीय प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए वनीकरण पर विशेष जोर दिया है, परंतु हालिया प्रशासनिक और लेखापरीक्षा रिपोर्टों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हमारी नीतियां केवल 'संख्यात्मक आंकड़ों' तक सीमित होकर रह गई हैं?
कानून के तहत वन की परिभाषा
वन वह भू-भाग है जो प्राकृतिक रूप से वृक्षों, झाड़ियों तथा अन्य वनस्पतियों से आच्छादित होकर एक विशिष्ट पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करता है और जो विधि के अंतर्गत वन के रूप में मान्य या संरक्षित हो। भारतीय विधि प्रणाली के अंतर्गत 'वन' शब्द की परिभाषा और इसके दायरे को समय-समय पर न्यायिक और विधाई माध्यमों से स्पष्ट किया गया है:
- टी.एन. गोदावर्मन थिरुमुलपाद बनाम भारत संघ मामला (1996): सर्वोच्च न्यायालय ने ‘वन’ शब्द के शब्दकोशीय अर्थ को महत्व दिया और सरकारी अभिलेखों में वन के रूप में दर्ज भूमि को भी व्यापक संरक्षण के दायरे में माना।
- वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 (2023 संशोधन): इस अधिनियम के अंतर्गत लागू होने वाली भूमि की श्रेणियों को विधिक रूप से अधिक स्पष्ट किया गया है, जिससे वन संरक्षण के दायरे और प्रशासनिक अनुपालन को सटीक बनाया जा सके।
चर्चा में क्यों
भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) द्वारा ग्रीन इंडिया मिशन (GIM) पर प्रस्तुत परफॉर्मेंस ऑडिट रिपोर्ट ने इसके लचर क्रियान्वयन और लक्ष्यों में भारी कमी को उजागर किया है।
- सरकार द्वारा हाल के वर्षों में चलाए गए विशाल वृक्षारोपण अभियानों (जैसे 'एक पेड़ माँ के नाम' अभियान, जिसे 5 जून 2024 को विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर शुरू किया गया था) और धरातल पर वास्तविक 'वन पारिस्थितिकी' की स्थिति के बीच के अंतर ने विशेषज्ञों का ध्यान खींचा है।
(CAG) द्वारा ग्रीन इंडिया मिशन (GIM) का परफॉर्मेंस ऑडिट
CAG की परफॉर्मेंस ऑडिट रिपोर्ट (जो 16 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में 2015–16 से 2024–25 की अवधि पर आधारित है) के प्रमुख निष्कर्ष निम्नलिखित हैं:
- वन गुणवत्ता में सुधार: इसके लिए निर्धारित 1.4 मिलियन हेक्टेयर के लक्ष्य के मुकाबले केवल 0.11384 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में सुधार दर्ज हुआ जो कि लगभग 91.87% की कमी को दर्शाता है।
- वन आवरण में वृद्धि: इसके लिए निर्धारित 1.4 मिलियन हेक्टेयर के लक्ष्य के मुकाबले केवल 0.03409 मिलियन हेक्टेयर की वृद्धि दर्ज हुई जो कि लगभग 97.57% की कमी है।
- रणनीतिक कमियाँ: मिशन के प्रमुख भौतिक एवं वित्तीय लक्ष्यों की प्राप्ति में गंभीर कमी तथा योजना, वित्तपोषण, अभिसरण और निगरानी संबंधी महत्वपूर्ण कमियाँ पाई गईं।
सरकार द्वारा चलाई गई योजनाएं
कैम्पा (CAMPA): वन भूमि के गैर-वानिकी उपयोग के बदले उपयोगकर्ता एजेंसियों से प्राप्त प्रतिपूरक वनीकरण, शुद्ध वर्तमान मूल्य (NPV) और अन्य निधियों का उपयोग वनीकरण, प्राकृतिक पुनर्जनन, वन संरक्षण और वन्यजीव संरक्षण जैसी गतिविधियों में किया जाता है।
- मनरेगा (MGNREGS; वर्तमान में VB–G RAM G के रूप में पुनर्गठित): इसके तहत ग्रामीण स्तर पर मजदूरी श्रम का उपयोग वृक्षारोपण और भूमि-पुनर्प्राप्ति कार्यों के लिए किया जाता है।
- 'एक पेड़ माँ के नाम' अभियान: वर्ष 2024 में शुरू किया गया राष्ट्रव्यापी वृक्षारोपण अभियान।
वर्तमान में उनकी स्थिति
धरातल पर इन योजनाओं की स्थिति संतोषजनक नहीं है। मनरेगा (VB-G RAM G) और कैम्पा फंड का उपयोग तो हो रहा है, लेकिन GIM के साथ अपेक्षित अभिसरण न होने के कारण ये प्रयास छिटपुट और असंगठित हैं। पारंपरिक वनों के पुनरुद्धार के बजाय प्रशासनिक लक्ष्य पूरा करने के लिए केवल पौधों की संख्या बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
रिपोर्टें: भारत वन स्थिति रिपोर्ट
आईएसएफआर (ISFR) 2023 के आंकड़े: देश के कुल हरे आवरण में 1,445 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि दर्ज की गई है। इसमें वन आवरण की वृद्धि 156 वर्ग किमी और वृक्ष आवरण की वृद्धि 1,289 वर्ग किमी थी।
- पारिस्थितिक निहितार्थ: यह अंतर इस बात को रेखांकित करता है कि वृक्ष आवरण में वृद्धि को स्वतः प्राकृतिक वन पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली के बराबर नहीं माना जा सकता।
वैश्विक परिदृश्य,
जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (NAPCC): 30 जून 2008 को शुरू की गई इस योजना के मूल आठ मिशनों में से ग्रीन इंडिया मिशन एक प्रमुख स्तंभ है।
- पेरिस समझौता: भारत ने अपनी 'राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान' (NDCs) के तहत 2030 तक 2.5 अरब से 3 अरब टन का अतिरिक्त कार्बन सिंक सृजित करने का लक्ष्य रखा है। नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, भारत ने 2005–2021 के दौरान लगभग 2.29 अरब टन CO2 समतुल्य अतिरिक्त कार्बन सिंक निर्मित कर लिया है।
अन्य महत्वपूर्ण बिंदु
अरावली पारिस्थितिकी का संकट: अरावली क्षेत्र के अनेक हिस्से अवैध खनन, शहरीकरण, अतिक्रमण, भूजल दोहन और आक्रामक प्रजातियों (जैसे विलायती कीकर) के प्रसार के कारण गंभीर क्षरण का सामना कर रहे हैं। केवल नए पौधे लगाकर 'ग्रीन वॉल' बनाने से दशकों पुरानी पारिस्थितिक क्षति की भरपाई नहीं की जा सकती।
- प्राकृतिक वन बनाम प्लांटेशन: प्लांटेशन (रोपण) से वृक्ष आवरण तो बढ़ सकता है, लेकिन यह स्वतः एक प्राकृतिक वन पारिस्थितिकी तंत्र का पुनर्निर्माण नहीं करता है।
बॉक्स:
वन आवरण बढ़ना ≠ वन पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली किसी क्षेत्र में वन आवरण या पेड़ों की संख्या बढ़ने के बावजूद जैव विविधता में कमी, एकल प्रजाति का प्रभुत्व, आक्रामक प्रजातियों का फैलाव, जल चक्र पर विपरीत प्रभाव और वन्यजीव आवासों का कमजोर होना जैसी समस्याएं बनी रह सकती हैं। |
संवैधानिक प्रावधान
अनुच्छेद 48क (राज्य के नीति निर्देशक तत्व): राज्य को देश के पर्यावरण के संरक्षण और संवर्धन तथा वनों और वन्य जीवों की रक्षा करने का निर्देश देता है।
- अनुच्छेद 51क(छ) (मूल कर्तव्य): प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह वनों, झीलों, नदियों और वन्य जीव सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करे और उसका संवर्धन करे।
चिंताएं
- कागजी लेखांकन और केवल 'पेड़ों की गिनती' पर अत्यधिक प्रशासनिक फोकस।
- जैव विविधता से परिपूर्ण प्राकृतिक वनों के घनत्व में गिरावट और मोनोकल्चर को बढ़ावा मिलना।
- खनन, अतिक्रमण और औद्योगिक दबाव के कारण पारिस्थितिक तंत्र का क्षरण।
आगे की राह
परिणाम-आधारित मूल्यांकन: पेड़ कितने लगाए गए, इससे अधिक इस बात पर ध्यान हो कि 3–5 वर्ष बाद जीवित रहने की दर कितनी है और कितना पारिस्थितिक लाभ हुआ।
- सहायक प्राकृतिक पुनर्जनन: जहाँ प्राकृतिक पुनर्जनन की क्षमता मौजूद हो, वहाँ बड़े पैमाने पर कृत्रिम वृक्षारोपण के बजाय इसे प्राथमिकता दी जाए।
- स्थान-विशिष्ट प्रजातियों का चयन: स्थानीय पारिस्थितिक परिस्थितियों के अनुरूप देशी प्रजातियों को रोपा जाए।
- भूदृश्य-स्तरीय योजना: छोटे और असंगठित वृक्षारोपण के बजाय वाटरशेड, वन्यजीव गलियारे और घासभूमि को जोड़कर समग्र नीति बनाई जाए।
- तकनीकी निगरानी: CAG द्वारा बताई गई कमियों को दूर करने के लिए GIS, उपग्रह इमेजिंग, जियोटैगिंग और थर्ड-पार्टी ऑडिट को अनिवार्य किया जाए।
निष्कर्ष
पर्यावरण संरक्षण और जलवायु न्याय केवल आंकड़ों की बाजीगरी या कागजी लक्ष्यों को पूरा करने तक सीमित नहीं होना चाहिए। वनों के वास्तविक संरक्षण के लिए संख्यात्मक वृक्षारोपण की संस्कृति से आगे बढ़कर पारिस्थितिकीय संतुलन, जैव विविधता की बहाली और जीवित रहने की दर को प्राथमिकता देनी होगी, तभी देश का पर्यावरणीय भविष्य सुरक्षित रह सकेगा।
लीडरबोर्ड्स के बजाय वर्कलोड्स से करें एआई मॉडल का मिलान: आधुनिक एंटरप्राइज़ रणनीतियों का एक नया दृष्टिकोण
सामान्य अध्ययन पेपर – III: प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
संदर्भ
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) उद्योग लंबे समय से केवल मॉडल रैंकिंग और लीडरबोर्ड्स पर अत्यधिक केंद्रित रहा है, जहां हर हफ्ते कोई नया मॉडल अपनी श्रेष्ठता का दावा करता है। हाल के समय तक, अधिकांश उद्यम सबसे मजबूत उपलब्ध मॉडल को चुनते थे और फ्रंटियर लैब्स से प्रबंधित एपीआई के माध्यम से उसका उपयोग करते थे, लेकिन आधुनिक तकनीकी परिदृश्य में यह निर्णय अब उतना सीधा या सरल नहीं रह गया है।
रैंकिंग बनाम कार्यभार:
इसका मुख्य अर्थ यह है कि किसी भी संगठन को केवल यह देखकर मॉडल का चयन नहीं करना चाहिए कि कौन सा मॉडल लीडरबोर्ड पर सर्वोच्च स्कोर कर रहा है।
- इसके विपरीत, सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि विशिष्ट वर्कलोड (कार्यभार) की जरूरत क्या है जैसे लागत, गवर्नेंस, डेटा रेजीडेंसी, बौद्धिक संपदा (IP) सुरक्षा और परिचालन जटिलता और उसके अनुसार सही मॉडल तथा परिनियोजन दृष्टिकोण का मिलान किया जाए।
चर्चा में क्यों
खुले वजन वाले मॉडलों का विस्तार: ओपन-वेट मॉडल के आने से संगठनों को प्रशिक्षित वजन को स्वयं चलाने और संवेदनशील डेटा को अपने सुरक्षित वातावरण में रखने की स्वतंत्रता मिली है।
- सुरक्षा घटनाएं: जुलाई 2026 में हगिंग फेस (Hugging Face), एक प्रमुख ओपन-सोर्स कृत्रिम बुद्धिमत्ता मंच, पर हुई सुरक्षा घटना ने यह साबित कर दिया कि फोरेंसिक और मैलवेयर विश्लेषण जैसे कुछ कार्यों के लिए तीसरे पक्ष के सुरक्षा गार्डरेल्स के बजाय पूरी तरह नियंत्रित मॉडल की आवश्यकता होती है।
- प्रबंधित इन्फेरेंस का उद्भव: सार्वम (Sarvam) द्वारा अपनी 'सार्वम इन्फेरेंस' सेवा के लॉन्च (एपॉक 2026’ सम्मेलन) जैसे घटनाक्रमों ने घरेलू बुनियादी ढांचे पर उत्पादन-स्तरीय एआई पहुंच को एक नया रूप दिया है, जिसके कारण यह विषय तकनीकी चर्चा के केंद्र में है।
समीकरण में बदलाव और ओपन-वेट मॉडल
ओपन-वेट मॉडल उद्यमों को रिमोट सेवाओं पर निर्भरता कम करने, मालिकाना ज्ञान पर फाइन-ट्यूनिंग करने और प्रति-टोकन लागत घटाने की अनुमति देते हैं।
- हालांकि, इन्हें उद्यम पैमाने पर चलाने के लिए जीपीयू बुनियादी ढांचा, सुरक्षा और लाइसेंसिंग की आवश्यकता होती है, जो छोटे उद्यमों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
सुरक्षा घटनाएं और नियंत्रण की आवश्यकता
जुलाई 2026 की सुरक्षा घटना के दौरान, कमर्शियल एपीआई के गार्डरेल्स ने हमलावर और अधिकृत उत्तरदाता में भेद न कर पाने के कारण फोरेंसिक अनुरोधों को ब्लॉक कर दिया था।
- इससे यह स्पष्ट हुआ कि कुछ वर्कलोड के लिए संरचनात्मक रूप से एक ऐसे मॉडल की आवश्यकता होती है जिसे संगठन खुद नियंत्रित करे ताकि डेटा परिधि से बाहर न जाए।
विविध वर्कलोड और आवश्यकताएं
किसी भी संगठन में सभी एआई कार्य एक जैसे नहीं होते; उदाहरण के लिए, गोपनीय डेटा का विश्लेषण करने वाले बैंक की जरूरतें मार्केटिंग टीम या साइबर सुरक्षा टीम से पूरी तरह भिन्न होती हैं।
- इसलिए, हर उपयोग के मामले में एक ही मॉडल या रणनीति फिट हो जाए, यह अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं है।
उभरता हुआ तीसरा विकल्प: प्रबंधित इन्फेरेंस
प्रबंधित इन्फेरेंस प्लेटफॉर्म्स नियंत्रित बुनियादी ढांचे पर अग्रणी ओपन-वेट परिवारों को होस्ट करते हैं।
- सार्वम (Sarvam) की 'सार्वम इन्फेरेंस' सेवा (जो GLM 5.2 और Gemma 4 जैसे मॉडलों को घरेलू बुनियादी ढांचे पर चलाती है) इसका ठोस उदाहरण है, जो "टोकन संप्रभुता" का समर्थन करती है।
मुख्य चिंताएं
प्रबंधित प्लेटफ़ॉर्म मॉडल परत के बजाय बुनियादी ढांचा परत पर विक्रेता निर्भरता को वापस ले आते हैं।
- पोर्टेबिलिटी, सुरक्षा और निकास पथों का मूल्यांकन करना प्रत्येक उद्यम के लिए आवश्यक है।
आगे की राह
संगठनों को कॉर्पोरेट डिफ़ॉल्ट अपनाने के बजाय प्रत्येक वर्कलोड के आधार पर निर्णय लेना चाहिए (जैसे- ग्राहक कार्यों के लिए बंद एपीआई, विनियमित कार्यों के लिए प्रबंधित ओपन-वेट, और फोरेंसिक के लिए सेल्फ-होस्टेड)।
- परिनियोजन विकल्प को खरीददारी का बाद का विचार न मानकर एक मुख्य स्थापत्य निर्णय माना जाना चाहिए।
निष्कर्ष
एआई से वास्तविक और दीर्घकालिक मूल्य वही संगठन प्राप्त कर पाएंगे, जो लीडरबोर्ड की अंधी दौड़ के बजाय क्षमता, नियंत्रण, लागत और सुशासन के बीच उचित संतुलन स्थापित करते हुए अपने कार्यभार के अनुरूप सही एआई मॉडल का चयन करेंगे। अंततः प्रतिस्पर्धात्मक लाभ उन्हीं संगठनों को मिलेगा, जो मॉडल के परिनियोजन और चयन को अपनी समग्र तकनीकी वास्तुकला तथा व्यावसायिक रणनीति का अभिन्न हिस्सा बनाएंगे।
लखीसराय के अशोक धाम मंदिर भगदड़ और सुरक्षा संकट: प्रशासनिक चुनौतियाँ, विधिक दायित्व और समाधान
सामान्य अध्ययन पेपर – III: प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
संदर्भ
भारत जैसे विविधतापूर्ण और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राष्ट्र में धार्मिक समागम और आस्था के केंद्र सदियों से सामाजिक ताने-बाने का मुख्य आधार रहे हैं। इन आयोजनों में लाखों की संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति भारतीय आध्यात्मिक चेतना के जीवंत स्वरूप को दर्शाती है, जो देश की सांस्कृतिक विरासत का एक अनिवार्य हिस्सा है।
मंदिर भगदड़ की समस्या
धार्मिक स्थलों और आयोजनों के दौरान अचानक अत्यधिक भीड़ के अनियंत्रित होने, बैरिकेड टूटने या अफवाहें फैलने के कारण उत्पन्न होने वाली भगदड़ की घटनाएं अब एक गंभीर आवर्ती संकट बन चुकी हैं। ये त्रासदियाँ पलभर में उत्सव के माहौल को शोक में बदल देती हैं और भारी जान-माल की क्षति का कारण बनती हैं।
चर्चा में क्यों
लखीसराय के अशोक धाम मंदिर में सावन मास के दौरान अत्यधिक भीड़ और रेलवे स्टेशनों से एक साथ भारी तादाद में श्रद्धालुओं के पहुंचने के कारण भगदड़ की स्थिति बनी।
- इस दुर्घटना में सात महिला श्रद्धालुओं की मृत्यु और कई लोगों के घायल होने के कारण यह विषय राष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा प्रबंधन की समीक्षा के केंद्र में आ गया है।
- त्योहारों के दौरान धार्मिक स्थलों पर प्रशासनिक तैयारियों, भीड़ नियंत्रण के तौर-तरीकों और सुरक्षा व्यवस्थाओं की विफलता को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
घटना के मुख्य कारण
रेलवे स्टेशनों और मार्गों पर भारी दबाव: एक साथ कई ट्रेनों से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का उतरना और सीमित मार्गों से मंदिर की ओर एक साथ आगे बढ़ना।
- संरचनात्मक विफलता: अचानक बढ़े दबाव के कारण बांस के बैरिकेड्स का टूट जाना और स्थल पर बिजली के खंभे का क्षतिग्रस्त होना।
- अफवाहों का प्रसार: विद्युत रिसाव जैसी निराधार अफवाहों के फैलने से भीड़ में व्यापक स्तर पर अफरा-तफरी और घबराहट की स्थिति का उत्पन्न होना।
आस्था, भारी भीड़, प्रबंधन, सुरक्षा और शहर की क्षमता
अगाध आस्था बनाम क्षमता: विशेष पर्वों (जैसे सावन, महाशिवरात्रि) पर किसी शहर या मंदिर परिसर की भौतिक वहन क्षमता से कई गुना अधिक श्रद्धालुओं का पहुंचना बुनियादी ढांचे पर अत्यधिक दबाव डालता है।
- भीड़ नियंत्रण और समन्वय: मंदिर प्रशासनों, स्थानीय पुलिस और जिला प्रशासन के बीच वास्तविक समय पर तालमेल और प्रभावी नियंत्रण कक्ष का अभाव स्थिति को बिगाड़ देता है।
- सुरक्षा मानक: प्रवेश और निकास मार्गों का पृथक्करण न होना तथा आपातकालीन निकासी योजनाओं की अनुपस्थिति इन दुर्घटनाओं को आम बनाती है।
विधिक एवं संवैधानिक प्रावधान
संवैधानिक दायित्व: भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार) नागरिकों को सुरक्षित जीवन जीने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है, जिसके तहत राज्य की यह प्राथमिक जिम्मेदारी है कि वह सार्वजनिक स्थलों और धार्मिक आयोजनों में नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे।
- आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005: इस अधिनियम के तहत भीड़ प्रबंधन को मानव-निर्मित आपदाओं की श्रेणी में शामिल किया गया है, जिसके अंतर्गत स्थानीय प्रशासन और जिला अधिकारियों के लिए निवारक उपाय करना कानूनी रूप से अनिवार्य है।
- धार्मिक स्वतंत्रता और तर्कसंगत प्रतिबंध: अनुच्छेद 25 नागरिकों को अंतःकरण की और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है, परंतु सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के आधार पर राज्य इन अधिकारों पर तार्किक और आवश्यक प्रतिबंध लगा सकता है।
पूर्ववर्ती घटनाएं और इतिहास
लखीसराय के अशोक धाम मंदिर में सुरक्षा की दृष्टि से यह घटना पहली नहीं है; इससे पूर्व 12 अगस्त 2019 को भी यहाँ भगदड़ की घटना हुई थी, जिसमें एक श्रद्धालु की मृत्यु हो गई थी और लगभग 15 लोग घायल हुए ।
- पूर्व के वर्षों में सबरीमाला, नैना देवी मंदिर, जोधपुर की चामुंडा देवी मंदिर, हाथरस और प्रयागराज कुंभ तथा मध्य प्रदेश के रत्गढ़ माता मंदिर जैसी जगहों पर हुई त्रासदियों से यह स्पष्ट होता है कि भीड़ प्रबंधन के दिशा-निर्देशों के बावजूद जमीनी स्तर पर इनकी अनदेखी बार-बार भारी जनहानि का कारण बनती है।
सरकारी पहल
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के दिशा-निर्देश: बड़े मेलों और भीड़-भाड़ वाले धार्मिक आयोजनों के लिए NDMA द्वारा मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जारी की गई है, जिसमें पुलिस और आयोजकों के बीच समन्वय, सीसीटीवी निगरानी और प्रवेश-निकास नियंत्रण के स्पष्ट निर्देश शामिल हैं।
- स्मार्ट पुलिसिंग और तकनीकी एकीकरण: भीड़ के घनत्व को मापने के लिए कई प्रमुख तीर्थ स्थलों पर एआई-आधारित कैमरे, ड्रोन सर्विलांस और रियल-टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम का उपयोग बढ़ाया जा रहा है।
- तीर्थ क्षेत्र विकास योजनाएं: सरकार द्वारा प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्रों पर बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए प्रसाद (PRASHAD) जैसी योजनाएं चलाई जा रही हैं ताकि श्रद्धालुओं के आवागमन को सुगम बनाया जा सके।
मंदिर का कला एवं संस्कृति
नामकरण और खोज का इतिहास: लखीसराय (बिहार) के चौकी गाँव में स्थित यह मंदिर 'अशोक धाम मंदिर' के रूप में प्रसिद्ध है। इसका नाम 'अशोक' नामक एक चरवाहे (युवक) के नाम पर पड़ा, जिसने 7 अप्रैल 1977 को इस प्राचीन शिवलिंग की खोज की थी।
- ऐतिहासिक संदर्भ (लोक मान्यता): यद्यपि इस स्थान को स्थानीय परंपराओं में 8वीं शताब्दी (पाल राजा नारायण पाल) और 12वीं शताब्दी (राजा इंद्रद्युम्न) से जोड़ा जाता है, परंतु ये तथ्य लोक मान्यताओं और जनश्रुतियों पर आधारित हैं, न कि पुरातात्विक रूप से प्रमाणित ऐतिहासिक दस्तावेज।
- वास्तुकला एवं स्वरूप: इस आधुनिक व पुनर्जीवित मंदिर परिसर का जीर्णोद्धार एवं उद्घाटन 11 फरवरी 1993 को जगन्नाथपुरी के शंकराचार्य द्वारा किया गया था। मुख्य मंदिर के चारों ओर अन्य देवताओं (पार्वती, नंदी, दुर्गा आदि) के परिसरों का सुंदर समकालीन नागर-शैली व संकुल वास्तुकला समन्वय देखने को मिलता है।
आगे की राह
सभी प्रमुख तीर्थस्थलों पर मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार की जानी चाहिए जिसमें एआई-आधारित सीसीटीवी सर्विलांस और रियल-टाइम क्राउड डेंसिटी मैपिंग अनिवार्य हो।
- जिला प्रशासन और मंदिर न्यास (Trust) को संयुक्त रूप से आपातकालीन निकास मार्गों, चिकित्सा शिविरों और आपदा प्रतिक्रिया दलों को हमेशा तैयार रखना चाहिए।
निष्कर्ष
धार्मिक आयोजनों में जन-सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए। इसके लिए तकनीकी एकीकरण, सख्त विधिक अनुपालन तथा प्रशासनिक जवाबदेही की संस्कृति का विकास समय की सबसे बड़ी मांग है, ताकि आस्था के मार्ग पर चलने वाले श्रद्धालुओं का जीवन सुरक्षित रह सके।