Read Current Affairs
संदर्भ
संसद की लोक लेखा समिति (PAC) ने कौशल विकास मंत्रालय की प्रमुख 'संकल्प' योजना के क्रियान्वयन में हो रही अत्यधिक देरी और बजटीय विसंगतियों के लिए सरकार की तीखी आलोचना की है।
वर्तमान समाचार के प्रमुख बिंदु
- PAC की टिप्पणी: समिति ने योजना के कार्यान्वयन को "लापरवाह" करार दिया है।
- वित्तीय सुस्ती: नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट के अनुसार, 2017 से 2023 के बीच कुल बजटीय प्रावधान का केवल 44% हिस्सा ही खर्च किया जा सका।
- निधि का कम उपयोग: विश्व बैंक द्वारा वितरित ₹1,606.15 करोड़ के मुकाबले मंत्रालय केवल ₹850.71 करोड़ का ही उपयोग कर पाया।
- निगरानी का अभाव: रिपोर्ट में योजना के लिए किसी केंद्रीय निगरानी तंत्र की कमी और प्रशासनिक तैयारियों में भारी चूक को उजागर किया गया है।
- समय सीमा: योजना की मूल समाप्ति अवधि मार्च 2023 थी, जिसे बढ़ाकर मार्च 2024 किया गया था, फिर भी लक्ष्य अधूरे हैं।
संकल्प (SANKALP) योजना: विस्तृत तथ्य और जानकारी
- पूरा नाम: आजीविका संवर्धन हेतु कौशल अधिग्रहण एवं ज्ञान जागरूकता (SANKALP)।
- लॉन्च तिथि: इसे आधिकारिक तौर पर 19 जनवरी 2018 को शुरू किया गया था (आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति द्वारा अक्टूबर 2017 में मंजूरी)।
- मंत्रालय: यह कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय (MSDE) की एक प्रमुख योजना है।
- वित्तपोषण: यह योजना विश्व बैंक के ऋण द्वारा समर्थित है। इसमें कुल ₹4,455 करोड़ का परिव्यय है, जिसमें ₹3,300 करोड़ विश्व बैंक का ऋण शामिल है।
- उद्देश्य:
- कौशल प्रशिक्षण की गुणवत्ता में सुधार करना और उसे बाजार की मांग के अनुरूप बनाना।
- संस्थागत तंत्र को मजबूत करना और जिला स्तर पर कौशल योजनाओं का विकेंद्रीकरण करना।
- महिलाओं, अनुसूचित जाति/जनजाति और दिव्यांगों जैसे हाशिए पर रहने वाले समुदायों को कौशल विकास से जोड़ना।
- प्रमुख प्रावधान:
- जिला कौशल समितियों (DSCs) को सशक्त बनाना।
- निजी क्षेत्र और उद्योगों के साथ जुड़ाव बढ़ाना।
- प्रशिक्षकों के प्रशिक्षण और मूल्यांकन की गुणवत्ता सुनिश्चित करना।
- राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर कौशल पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण।
निष्कर्ष
'संकल्प' योजना भारत के कौशल विकास और रोजगार सृजन के लिए एक क्रांतिकारी कदम है, परंतु इसकी सफलता इसके प्रभावी क्रियान्वयन और वित्तीय पारदर्शिता पर निर्भर करती है। यदि प्रशासनिक तैयारियों और निगरानी तंत्र को सुदृढ़ किया जाए, तभी यह योजना अपने निर्धारित सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त कर सकेगी।
संदर्भ
वैश्विक स्तर पर आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित करने हेतु भारत ने अमेरिका के नेतृत्व वाले तकनीकी गठबंधन 'पैक्स सिलिका' शामिल होने का निर्णय लिया है। यह कदम चीन के बढ़ते प्रभुत्व और उसके द्वारा आपूर्ति में उत्पन्न की जाने वाली बाधाओं का मुकाबला करने के लिए उठाया गया है।
वर्तमान समाचार बिंदु
- हस्ताक्षर समारोह: नई दिल्ली में आयोजित 'AI Impact Summit' के दौरान भारत ने औपचारिक रूप से इस समूह में शामिल होने के लिए दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए।
- प्रमुख उपस्थिति: इस अवसर पर केंद्रीय आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव और अमेरिका के अवर सचिव जैकब हेलबर्ग उपस्थित रहे।
- गठबंधन का विस्तार: भारत अब उन विशिष्ट देशों की सूची में शामिल हो गया है जिसमें कनाडा, जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोपीय संघ (EU) जैसे प्रमुख भागीदार हैं।
- आर्थिक संप्रभुता: जैकब हेलबर्ग ने कहा कि भारत और अमेरिका जैसे देशों के लिए अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर संप्रभुता पुनः प्राप्त करना आवश्यक है ताकि "बाहरी ताकतों" के दबाव को कम किया जा सके।
- चीन का मुकाबला: यह समूह विशेष रूप से दुर्लभ पृथ्वी तत्वों और इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए चीन पर निर्भरता कम करने पर ध्यान केंद्रित करेगा।
पैक्स सिलिका क्या है?
पैक्स सिलिका एक अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक गठबंधन है जिसका उद्देश्य दुनिया भर में इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर और महत्वपूर्ण खनिजों की एक लचीली और सुरक्षित आपूर्ति श्रृंखला बनाना है।
- स्थापना: इसका उद्घाटन शिखर सम्मेलन दिसंबर 2025 में वाशिंगटन, डी.सी. में हुआ था।
- उद्देश्य: सदस्य देशों को आर्थिक ब्लैकमेल और "हथियारबंद निर्भरता" से बचाना।
- कार्य: यह गठबंधन सेमीकंडक्टर निर्माण से लेकर एआई (AI) बुनियादी ढांचे तक, पूरे 'सिलिकॉन स्टैक' को सुरक्षित करने का कार्य करता है।
निष्कर्ष
भारत का पैक्स सिलिका में शामिल होना न केवल देश की तकनीकी आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ करेगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर विश्वसनीय भागीदार के रूप में भारत की स्थिति को भी मजबूत करेगा। यह गठबंधन भविष्य की चुनौतियों और आर्थिक दबावों के विरुद्ध एक सुरक्षा कवच का कार्य करेगा।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
लोकतंत्र की आधारशिला निष्पक्ष और त्रुटिहीन निर्वाचन प्रक्रिया होती है। पश्चिम बंगाल में आगामी चुनावों से पूर्व मतदाता सूचियों के विशेष गहन संशोधन (SIR) की प्रक्रिया चल रही है। इस प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य मतदाता सूची से विसंगतियों को दूर करना और पात्र नागरिकों के नाम सुनिश्चित करना है। हालांकि, पिछले कुछ समय से यह प्रक्रिया प्रशासनिक और राजनीतिक विवादों के कारण अधर में लटकी हुई थी, जिससे लाखों नागरिकों के मताधिकार और उनकी नागरिकता की स्थिति पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे थे।
वर्तमान समाचार बिंदु
- भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल की इस रुकी हुई SIR प्रक्रिया को गति देने के लिए एक 'असाधारण' निर्णय लिया है।
- मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने निर्देश दिया है कि अब इस प्रक्रिया में न्यायपालिका के अधिकारियों को सीधे तौर पर शामिल किया जाएगा।
- न्यायालय ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया है कि वे जिला और अतिरिक्त जिला न्यायाधीश स्तर के सेवारत एवं सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों को इस कार्य हेतु तैनात करें।
- ये अधिकारी अब उन लाखों मतदाताओं की शिकायतों की सुनवाई करेंगे जिनके नाम ड्राफ्ट रोल से हटा दिए गए हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय के कारण
उच्चतम न्यायालय को यह कठोर कदम निम्नलिखित कारणों से उठाना पड़ा:
- विश्वास की कमी: न्यायालय के अनुसार, पश्चिम बंगाल सरकार और भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के बीच गहरे अविश्वास की स्थिति बनी हुई है, जिससे संवैधानिक कार्य ठप हो गया है।
- प्रशासनिक गतिरोध: राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच अधिकारियों की नियुक्ति और उनकी योग्यता को लेकर लगातार आरोप-प्रत्यारोप चल रहे थे, जिसके कारण संशोधन प्रक्रिया समय सीमा के भीतर पूरी नहीं हो पा रही थी।
- नागरिकता और मताधिकार का प्रश्न: न्यायालय ने माना कि यदि SIR प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं हुई, तो लाखों लोगों के नागरिकता दावों और उनके वोट देने के अधिकार पर "गंभीर परिणाम" हो सकते हैं।
- समय का अभाव: दावों और आपत्तियों के निस्तारण की अंतिम तिथि 28 फरवरी अत्यंत निकट है, जिसे देखते हुए सामान्य प्रशासनिक तंत्र अक्षम प्रतीत हो रहा था।
निर्णय के संभावित प्रभाव
इस न्यायिक हस्तक्षेप के दूरगामी प्रभाव पड़ने की संभावना है:
- प्रक्रिया में निष्पक्षता: न्यायिक अधिकारियों की उपस्थिति से मतदाता सूची के सत्यापन में पारदर्शिता आएगी और राजनीतिक पक्षपात की गुंजाइश कम होगी।
- त्वरित निस्तारण: जिला न्यायाधीश स्तर के अधिकारियों के जुड़ने से लाखों लंबित मामलों की सुनवाई में तेजी आएगी।
- प्रशासनिक जवाबदेही: न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि न्यायिक अधिकारियों के निर्देश सर्वोच्च न्यायालय के आदेश माने जाएंगे, जिसका पालन करना राज्य प्रशासन के लिए अनिवार्य होगा।
- न्यायिक कार्यभार में वृद्धि: न्यायालय ने स्वयं स्वीकार किया है कि इस कार्य के कारण नियमित अदालती मामलों पर प्रभाव पड़ सकता है, जिसके समाधान हेतु संक्षिप्त अवधि के लिए मामलों को अन्य अदालतों में स्थानांतरित करने का सुझाव दिया गया है।
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण
- संवैधानिक आधार: संविधान का अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को पूर्ण शक्ति देता है, लेकिन जब संस्थानों के बीच 'गतिरोध' से मौलिक अधिकारों (मतदान का अधिकार) पर संकट आए, तो सर्वोच्च न्यायालय अनुच्छेद 142 का प्रयोग कर 'पूर्ण न्याय' हेतु हस्तक्षेप कर सकता है।
- ऐतिहासिक संदर्भ: यद्यपि चुनाव प्रक्रिया में न्यायिक हस्तक्षेप दुर्लभ है, परंतु पूर्व में 'लक्ष्मी कांत पाण्डेय' केस और परिसीमन विवादों के दौरान न्यायालय ने विशेष समितियाँ नियुक्त की हैं। जिला न्यायाधीशों की पूरी 'फोर्स' को SIR प्रक्रिया में उतारना एक ऐतिहासिक मिसाल है।
- अंकुश नहीं, सहयोग: यह कदम आयोग की स्वायत्तता पर अंकुश नहीं, बल्कि 'विश्वास की कमी' को दूर करने हेतु एक विधिक सहयोग है। इससे प्रक्रिया राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त होगी और इसकी विश्वसनीयता बढ़ेगी।
- न्यायिक सक्रियता: यह 'न्यायिक सक्रियता' का सटीक उदाहरण है, जहाँ न्यायालय ने एक 'मध्यस्थ' बनकर प्रशासनिक तंत्र को पुनर्जीवित किया है ताकि किसी भी पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची से अन्यायपूर्ण तरीके से न हटे।
निष्कर्ष
सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय भारतीय लोकतंत्र की रक्षा हेतु एक सुरक्षा कवच के समान है। जब दो संवैधानिक संस्थाएं (राज्य सरकार और चुनाव आयोग) आपसी समन्वय स्थापित करने में विफल रहती हैं, तब न्यायपालिका का हस्तक्षेप अनिवार्य हो जाता है। यद्यपि न्यायिक अधिकारियों को प्रशासनिक कार्यों में लगाना एक असाधारण कदम है, परंतु नागरिकों के मताधिकार की शुचिता बनाए रखने के लिए यह वर्तमान परिस्थितियों में अत्यंत आवश्यक है। यह कदम सुनिश्चित करेगा कि चुनावी प्रक्रिया में "विश्वास के संकट" को दूर कर एक पारदर्शी और त्रुटिहीन मतदाता सूची तैयार की जा सके।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
वैश्विक भू-राजनीति में टैरिफ (आयात शुल्क) अब केवल एक कर नहीं, बल्कि आर्थिक युद्ध के एक 'रणनीतिक हथियार' के रूप में स्थापित हो चुका है, जिसके तहत विगत वर्षों में अमेरिका और चीन के बीच भीषण ट्रेड-वॉर तथा भारत पर रूसी तेल खरीद के कारण 50% शुल्क लगाने जैसी धमकियाँ देखी गईं। इसी संरक्षणवादी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने 'राष्ट्रीय आपातकाल' के नाम पर दुनिया भर पर जो व्यापक टैरिफ थोपे थे, उन्हें अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा असंवैधानिक घोषित किए जाने के बाद यह मुद्दा एक बार फिर वैश्विक विमर्श और कानूनी विवाद का केंद्र बन गया है।
'ट्रंप टैरिफ' और अमेरिका फर्स्ट नीति
- उद्देश्य: ट्रंप प्रशासन ने अप्रैल 2025 में व्यापार घाटे को 'राष्ट्रीय आपातकाल' बताकर भारत सहित वैश्विक स्तर पर भारी शुल्क लगाए। इसका लक्ष्य अमेरिकी विनिर्माण को पुनर्जीवित करना और 'अमेरिका फर्स्ट' के तहत अन्य देशों पर दबाव बनाना था।
- आर्थिक प्रभाव: इस नीति से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बाधित हुई और व्यापार युद्ध (Trade War) की स्थिति पैदा हुई। अमेरिका में आयातित माल महंगा होने से महंगाई बढ़ी और उपभोक्ताओं पर बोझ पड़ा।
चर्चा में क्यों?
सुप्रीम कोर्ट ने 6-3 के बहुमत से ट्रंप प्रशासन के उस फैसले को पलट दिया जिसमें 'अंतर्राष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्ति अधिनियम' (IEEPA) का उपयोग कर दुनिया भर पर टैरिफ थोपे गए थे।
- मुख्य न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स ने कहा कि IEEPA राष्ट्रपति को "आयात विनियमित" करने की शक्ति देता है, न कि "अनियंत्रित कर" लगाने की। उन्होंने स्पष्ट किया कि कर लगाने की शक्ति केवल कांग्रेस की है।
- ट्रंप ने अप्रैल 2025 में व्यापार घाटे को "राष्ट्रीय आपातकाल" बताकर भारत सहित लगभग सभी देशों पर भारी शुल्क लगाए थे, जिससे दिसंबर 2025 तक $133 बिलियन एकत्र हुए। अब कोर्ट ने इसे अवैध ठहराया है।
- इस फैसले को राज्यों और बड़ी व्यापारिक संस्थाओं (जैसे कॉस्टको) ने कोर्ट में चुनौती दी। उनका तर्क था कि राष्ट्रपति "आपातकाल" के नाम पर संसद (कांग्रेस) की कर लगाने की संवैधानिक शक्ति को नहीं छीन सकते।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद की स्थिति
सुप्रीम कोर्ट द्वारा IEEPA आधारित टैरिफ रद्द करने के बाद, ट्रंप प्रशासन अब वैकल्पिक कानूनों का सहारा ले रहा है। उन्होंने 150 दिनों के लिए 10% टैरिफ लगाने का आदेश दिया है, जिसे केवल कांग्रेस ही आगे बढ़ा सकती है। अब $133 बिलियन के रिफंड को लेकर निचली अदालतों में कानूनी लड़ाई शुरू हो गई है।
वैश्विक प्रभाव:
इससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बाधित होती है और 'ट्रेड वॉर' की स्थिति पैदा होती है। 2025 में इसके कारण वैश्विक जीडीपी विकास दर में गिरावट दर्ज की गई।
भारत-अमेरिका संबंध: अवसर और चुनौतियाँ
भारत के लिए यह स्थिति विरोधाभासी है:
- द्विपक्षीय समझौता: फरवरी 2026 में हुए समझौते के तहत टैरिफ 50% से घटकर 18% होने थे।
- नया अवरोध: कोर्ट के फैसले के तुरंत बाद, ट्रंप ने ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 122 के तहत फिर से 10% वैश्विक टैरिफ लगा दिया।
- विश्वास का संकट: हालांकि ट्रंप ने आश्वासन दिया कि भारत के साथ हुई डील पर इसका असर नहीं पड़ेगा, लेकिन उनका इतिहास (जैसे रूसी तेल खरीद पर 50% टैरिफ की धमकी) 'सावधान कूटनीति' की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
विश्लेषण: जिद बनाम आवश्यकता
'अमेरिका फर्स्ट' नीति घरेलू राजनीति में लोकप्रिय हो सकती है, लेकिन वैश्विक स्तर पर यह अमेरिका को अलग-थलग कर रही है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह सिद्ध करता है कि आर्थिक राष्ट्रवाद को भी लोकतांत्रिक मर्यादाओं और शक्तियों के पृथक्करण का पालन करना होगा।
आगे की राह: भारत के लिए रणनीति
भारत को अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' बनाए रखने के लिए निम्न कदम उठाने चाहिए:
- बाजार विविधीकरण: निर्यात के लिए केवल अमेरिका पर निर्भर न रहकर EU, ASEAN और अफ्रीकी बाजारों पर ध्यान केंद्रित करना।
- विधिक सक्रियता: संचित $133 बिलियन टैरिफ में से भारतीय निर्यातकों का 'रिफंड' सुनिश्चित करने हेतु कूटनीतिक प्रयास करना।
- आपूर्ति श्रृंखला लचीलापन: 'आत्मनिर्भर भारत' के माध्यम से घरेलू विनिर्माण को इतना प्रतिस्पर्धी बनाना कि वैश्विक झटकों का असर कम हो।
- बाइंडिंग क्लॉज: भविष्य के समझौतों में ऐसे प्रावधान जोड़ना जो नेतृत्व परिवर्तन की सनक से प्रभावित न हों।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय 'चेक एंड बैलेंस' की जीत है। भारत को अमेरिका के साथ संबंधों में "भरोसा करें, लेकिन जांचें" की नीति अपनानी होगी, ताकि हमारी आर्थिक सुरक्षा किसी व्यक्ति विशेष की महत्वाकांक्षाओं की भेंट न चढ़े।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।
संदर्भ:
मणिपुर पिछले दो वर्षों से भी अधिक समय से जातीय हिंसा की अग्नि में झुलस रहा है। 4 फरवरी, 2026 को नई सरकार के गठन और नेमचा किपगेन जैसी महिला नेतृत्व की उप-मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्ति ने शांति की एक नई उम्मीद जगाई है। हालांकि, धरातल पर समुदायों के बीच अविश्वास की खाई और सुरक्षा संबंधी चिंताएं अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।
संकट की पृष्ठभूमि और वर्तमान सांख्यिकी
मणिपुर में हिंसा की शुरुआत 3 मई, 2023 को हुई, जब मैतई समुदाय की 'अनुसूचित जनजाति' (ST) के दर्जे की मांग के विरोध में आदिवासी एकजुटता मार्च निकाला गया।
- हताहत और विस्थापन: अब तक 250 से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं और लगभग 60,000 लोग अपने घरों से विस्थापित होकर शिविरों में रहने को मजबूर हैं।
- त्रिकोणीय संघर्ष: प्रारंभ में यह संघर्ष केवल मैतई और कुकी-ज़ो समुदायों के बीच था, किंतु हालिया रिपोर्टों के अनुसार कुकी-ज़ो और नागा समुदायों के बीच भी झड़पें देखी गई हैं (जैसे उखरुल जिले की घटना), जो संकट के और अधिक जटिल होने का संकेत है।
शांति बहाली में प्रमुख बाधाएं
- विश्वास का अभाव: समुदायों के बीच ही नहीं, बल्कि राज्य प्रशासन और सुरक्षा बलों के प्रति भी अविश्वास की गहरी भावना है।
- भौगोलिक और सामाजिक विभाजन: मणिपुर वर्तमान में स्पष्ट रूप से 'घाटी' (मैतई बहुल) और 'पहाड़ी' (कुकी और नागा बहुल) क्षेत्रों में विभाजित हो गया है। 'बफर ज़ोन' की उपस्थिति ने आवाजाही को सीमित कर दिया है।
- संस्थागत चुनौतियां: राज्य की पहली महिला उप-मुख्यमंत्री नेमचा किपगेन का सुरक्षा कारणों से इंफाल में विधानसभा सत्र में शामिल न हो पाना शासन की विफलता और सुरक्षा की नाजुक स्थिति को दर्शाता है।
शांति के लिए प्रस्तावित 'मानवीय दृष्टिकोण'
नेमचा किपगेन ने शांति बहाली के लिए एक 'माँ' के समान दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया है, जिसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- सहानुभूति और देखभाल: दंड के स्थान पर समुदायों की पीड़ा को उनकी अपनी शर्तों पर सुनना।
- साझा विरासत का स्मरण: मणिपुर के साझा इतिहास, भाषाओं, सांस्कृतिक मूल्यों और जनजातीय विरासत को पुनः जीवित करना।
- विविधता में एकता: यह स्वीकार करना कि सद्भाव का अर्थ 'समानता' नहीं, बल्कि एक-दूसरे की विशिष्ट पहचान का सम्मान करते हुए साथ रहना है।
मैतई समुदाय
- निवास स्थान: ये मुख्य रूप से मणिपुर की इम्फाल घाटी में रहते हैं, जो राज्य के कुल क्षेत्रफल का लगभग 10% है।
- जनसंख्या: मणिपुर की कुल जनसंख्या का लगभग 53% हिस्सा मैतई हैं।
- धर्म: अधिकांश मैतई हिंदू हैं, लेकिन इनमें एक छोटा वर्ग 'सनमाही' और मुस्लिम (मैतई पंगल) भी हैं।
- भाषा: इनकी भाषा 'मैतईलोन' (मणिपुरी) है, जो संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल है।
- मुख्य मांग: वे लंबे समय से 'अनुसूचित जनजाति' (ST) के दर्जे की मांग कर रहे हैं ताकि वे पहाड़ियों में जमीन खरीद सकें और नौकरियों में आरक्षण प्राप्त कर सकें।
कुकी समुदाय
- निवास स्थान: ये मुख्य रूप से मणिपुर के पहाड़ी जिलों में रहते हैं, जो राज्य के कुल क्षेत्रफल का लगभग 90% है।
- जनसंख्या: कुकी और नागा मिलकर राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग 40% हिस्सा बनाते हैं।
- धर्म: अधिकांश कुकी समुदाय ईसाई धर्म को मानते हैं।
- सांस्कृतिक पहचान: कुकी एक जातीय समूह है जो भारत, म्यांमार और बांग्लादेश में फैला हुआ है। इन्हें 'चिन-कुकी-मिज़ो' समूह का हिस्सा माना जाता है।
- संवैधानिक स्थिति: इन्हें 'अनुसूचित जनजाति' (ST) का दर्जा प्राप्त है, जिससे इन्हें पहाड़ी क्षेत्रों में विशेष भू-अधिकार और आरक्षण मिलता है।
संघर्ष के मुख्य कारण
- भूमि अधिकार: मैतई लोग घाटी में रहते हैं जहाँ जनसंख्या घनत्व अधिक है, लेकिन मौजूदा कानूनों के कारण वे पहाड़ियों (ST क्षेत्र) में जमीन नहीं खरीद सकते।
- जनसांख्यिकीय परिवर्तन: म्यांमार (2021 के तख्तापलट के बाद) से अवैध प्रवासन के कारण पहाड़ियों में जनसंख्या संतुलन बिगड़ने का डर है।
- आरक्षण का मुद्दा: कुकी समुदाय को डर है कि यदि मैतई को ST दर्जा मिल गया, तो उनकी नौकरियों और संसाधनों पर मैतई का कब्जा हो जाएगा।
- अफीम की खेती और अतिक्रमण: सरकार द्वारा पहाड़ी क्षेत्रों में वन संरक्षण अधिनियम के तहत 'अतिक्रमणकारियों' को हटाने और अफीम की खेती के खिलाफ अभियान को कुकी समुदाय ने अपने खिलाफ लक्षित कार्रवाई माना।
संवैधानिक सुरक्षा उपाय
- अनुच्छेद 371C: यह मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान करता है, जिसके तहत एक 'पहाड़ी क्षेत्र समिति' का गठन किया गया है।
- 6वीं अनुसूची बनाम स्वायत्त जिला परिषद (ADC): मणिपुर में 6वीं अनुसूची लागू नहीं है, बल्कि यहाँ स्वायत्त जिला परिषदें (ADCs) कार्य करती हैं, जिन्हें कुकी समुदाय और अधिक सशक्त बनाने की मांग करते हैं।
विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण
मणिपुर का संकट केवल एक कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि यह पहचान की राजनीति और संसाधनों के वितरण के बीच का संघर्ष है। उग्रवाद का इतिहास और म्यांमार जैसे पड़ोसी देशों से होने वाली घुसपैठ ने इस आग में घी डालने का काम किया है। जब तक समुदायों के बीच 'सुरक्षा की गारंटी' सुनिश्चित नहीं होती, तब तक 'बफर ज़ोन' हटाना या विस्थापितों की घर वापसी एक जोखिम भरा कदम हो सकता है।
आगे की राह
- संवाद का विकेंद्रीकरण: केवल राजनीतिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि नागरिक समाज और धार्मिक समुदायों के बीच संवाद शुरू होना चाहिए।
- न्यायिक जवाबदेही: हिंसा के दोषियों को सजा देकर न्याय व्यवस्था में विश्वास बहाल करना अनिवार्य है।
- सुरक्षित गलियारे: जनप्रतिनिधियों और आम नागरिकों के लिए घाटी से पहाड़ियों तक सुरक्षित गलियारे बनाना ताकि शासन और रसद की आपूर्ति निर्बाध हो सके।
- मानसिक स्वास्थ्य और पुनर्वास: विस्थापितों के लिए केवल आर्थिक सहायता ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके मानसिक आघात के उपचार के लिए परामर्श केंद्रों की आवश्यकता है।
निष्कर्ष
मणिपुर की स्थिति 'नफरत बनाम शांति' के बीच एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। नफरत की बयानबाजी और हिंसा का कोई विजेता नहीं होता। जैसा कि नेमचा किपगेन ने रेखांकित किया है, मणिपुर का भविष्य उसके बच्चों की सुरक्षा और समुदायों के बीच 'साझा आधार' को फिर से खोजने पर निर्भर है। सरकार को अब 'कठोर सुरक्षा' के साथ-साथ 'नरम कूटनीति' का मिश्रण अपनाना होगा।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।
भूमिका:
भारत वर्तमान में एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है जहाँ उसकी भाषाई विविधता विश्व के लिए एक मिसाल है। 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, भारत 1,300 से अधिक मातृभाषाओं और 121 संवैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त भाषाओं का धनी है। यह विविधता केवल सांख्यिकीय डेटा नहीं है, बल्कि एक राष्ट्रीय सामर्थ्य है। भाषा केवल संचार का साधन नहीं होती, बल्कि वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचित ज्ञान और दुनिया को समझने का एक विशिष्ट दृष्टिकोण होती है। जब कोई भाषा विलुप्त होती है, तो मानवता अपने ज्ञान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा खो देती है।
शिक्षण में मातृभाषा की केंद्रीय भूमिका
- यूनेस्को (UNESCO) के अनुसार, शिक्षा की गुणवत्ता के लिए यह अनिवार्य है कि शिक्षण उस भाषा में हो जिसे बच्चा सबसे बेहतर समझता और बोलता हो।
- अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 2025 की थीम "बहुभाषी शिक्षा पर युवाओं की आवाज़" भी इसी तथ्य को रेखांकित करती है कि जब कक्षा में छात्र की भाषाई पहचान को सम्मान मिलता है, तब स्कूल उनके लिए सीखने का एक समावेशी और सुखद स्थान बन जाता है।
वर्तमान चुनौतियाँ: भाषा की बाधा और सीखने का अंतराल
वैश्विक स्तर पर करोड़ों बच्चे उस भाषा में शिक्षा प्राप्त करने को मजबूर हैं जिसे वे समझ नहीं पाते। भारत के संदर्भ में, NCERT (2022) के आंकड़े बताते हैं कि लगभग 44% बच्चे ऐसी भाषा में शिक्षा प्राप्त करना शुरू करते हैं जो उनकी घर की भाषा (मातृभाषा) से भिन्न होती है। इसका सीधा दुष्प्रभाव छात्रों की नींव पर पड़ता है:
- शैक्षणिक अवधारणाओं को समझने से पहले अपरिचित भाषा को 'डिकोड' करने का अतिरिक्त बोझ।
- बुनियादी साक्षरता और संख्या ज्ञान (FLN) में गिरावट।
- आत्मविश्वास में कमी और स्कूल छोड़ने की बढ़ती संभावना।
नीतिगत सुधार और तकनीकी हस्तक्षेप
भारत ने इन चुनौतियों को पहचानते हुए 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020' के माध्यम से मातृभाषा आधारित बहुभाषी शिक्षा (MTB-MLE) को प्राथमिकता दी है। 'भाषा मैटर्स’ रिपोर्ट के अनुसार, कई राज्यों में इसके सफल प्रयोग देखे गए हैं:
- ओडिशा: 21 आदिवासी भाषाओं में शिक्षण कार्यक्रम, जिससे 90,000 छात्र लाभान्वित हो रहे हैं।
- तेलंगाना: 'दीक्षा' (DIKSHA) पोर्टल के माध्यम से स्थानीय भाषाओं में डिजिटल सामग्री की उपलब्धता।
- डिजिटल पहल: 'भाषिणी' (BHASHINI), 'पीएम ई-विद्या' और 'AI4Bharat' जैसे मंच कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उपयोग कर लुप्तप्राय भाषाओं के संरक्षण और शिक्षण सामग्री के अनुवाद में क्रांतिकारी बदलाव ला रहे हैं।
भविष्य का रोडमैप: नीतिगत सिफारिशों का सार
रिपोर्ट में भारत के लिए एक स्पष्ट कार्ययोजना का प्रस्ताव दिया गया है, जिसमें प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:
- स्पष्ट राज्य-स्तरीय बहुभाषी शिक्षा नीतियां।
- शिक्षकों की भर्ती और प्रशिक्षण में बहुभाषी शिक्षा शास्त्र (Pedagogy) को अनिवार्य बनाना।
- सामुदायिक भागीदारी और स्वदेशी ज्ञान को पाठ्यक्रम में शामिल करना।
- भाषा प्रौद्योगिकियों में जिम्मेदार और सतत निवेश।
- राष्ट्रीय मिशन: मंत्रालयों और शोध संस्थानों के बीच समन्वय हेतु एक समर्पित 'राष्ट्रीय मिशन' की स्थापना।
निष्कर्ष:
भाषाई विविधता विकास के मार्ग में बाधा नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और समानता का एक शक्तिशाली चालक है। साक्ष्य स्पष्ट हैं कि बच्चे अपनी भाषा में सबसे बेहतर सीखते हैं। आज भारत का बहुभाषी क्षण आ चुका है, जहाँ शिक्षा प्रणाली को हर शिक्षार्थी की भाषा को मान्यता देनी होगी। जब नीतिगत आकांक्षाएं एक राष्ट्रीय आंदोलन का रूप लेंगी, तभी भारत का युवा एक सशक्त भविष्य का निर्माण कर सकेगा।
सन्दर्भ
आज की दुनिया एक ऐसे बदलाव के दौर से गुजर रही है जहाँ सत्ता के पुराने ढांचे दरक रहे हैं और विरोध की एक नई भाषा जन्म ले रही है। इस बदलाव के केंद्र में है 'जेनरेशन ज़ेड' (Gen Z) वह पीढ़ी जिसका जन्म 1997 से 2012 के बीच हुआ। जहाँ पिछली पीढ़ियाँ विचारधाराओं और स्थापित संगठनों के इर्द-गिर्द लामबंद होती थीं, वहीं जेन ज़ी अपनी 'डिजिटल नेटिव' पहचान और 'अकेले मगर एकजुट' होने के अनूठे अंदाज से दुनिया को चौंका रही है।
वैश्विक परिदृश्य: सड़कों से सोशल मीडिया तक
दुनिया भर में जहाँ भी लोकतंत्र पर संकट आया है, वहाँ जेन ज़ी की उपस्थिति दर्ज की गई है।
- संयुक्त राज्य अमेरिका: 'मार्च फॉर अवर लाइव्स' जैसे आंदोलनों के जरिए इस पीढ़ी ने गन कंट्रोल जैसे जटिल मुद्दों पर अमेरिकी राजनीति को हिला कर रख दिया।
- बांग्लादेश और नेपाल: हालिया वर्षों (2024-25) में इन देशों में हुए सत्ता-परिवर्तन और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों में जेन ज़ी की भूमिका निर्णायक रही। उन्होंने दिखाया कि बिना किसी एक 'चेहरे' या नेता के भी बड़े से बड़े शासन को जवाबदेह ठहराया जा सकता है।
भारतीय संदर्भ: आत्मविश्वास और अनिश्चितता का संगम
भारत में जेन ज़ी एक अनोखे विरोधाभास में जी रही है। यह स्वतंत्र भारत की सबसे आत्मविश्वासी पीढ़ी है, जिसे तकनीक और सूचना तक सीधी पहुँच प्राप्त है।
- जाति और धर्म से ऊपर: बाज़ार और वैश्वीकरण ने इस पीढ़ी को 'उपभोग' के जरिए एक समान धरातल दिया है। एक दलित युवा और एक सवर्ण युवा के पास यदि एक जैसा स्मार्टफोन है, तो वह उनके बीच की सदियों पुरानी सामाजिक खाई को कम करने का एक जरिया बनता है।
- आर्थिक असुरक्षा: जहाँ एक तरफ तकनीक की ताकत है, वहीं दूसरी तरफ गायब होते रोजगार और 'गिग इकोनॉमी' ने इस पीढ़ी को गहरे मानसिक तनाव और 'भविष्य की चिंता' में धकेल दिया है।
विरोध का नया तरीका: 'छिटपुट' मगर 'प्रभावी'
जेन ज़ी के विरोध प्रदर्शन पुराने आंदोलनों (जैसे भारत का किसान आंदोलन) से बिल्कुल अलग हैं।
- बिना नेता के आंदोलन: इनके प्रदर्शनों में कोई एक कमांडर नहीं होता। ये सोशल मीडिया पर एकजुट होते हैं, बिजली की तरह चमकते हैं, अपना प्रभाव छोड़ते हैं और फिर गायब हो जाते हैं।
- व्यक्तिगत ही राजनीतिक है: उनके लिए राजनीति केवल वोट देना नहीं है, बल्कि वे क्या पहनते हैं, क्या खाते हैं और वे मानसिक स्वास्थ्य पर कितनी खुलकर बात करते हैं, यह भी उनकी राजनीति का हिस्सा है।
डिजिटल दुनिया और उग्र-राष्ट्रवाद
तकनीक जहाँ सशक्तिकरण का साधन है, वहीं यह एक 'इको-चेम्बर' भी बनाती है। सूचनाओं के तीव्र प्रवाह ने 'हाइपर-नेशनलिज्म' (उग्र-राष्ट्रवाद) को बढ़ावा दिया है। भारत जैसे देशों में जेन ज़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों पर गर्व करने के साथ-साथ भविष्य की आधुनिक संभावनाओं (जैसे स्पेस मिशन और सिलिकॉन वैली में भारतीय प्रभाव) को लेकर भी बेहद मुखर है।
निष्कर्ष: एक अनिश्चित मगर उज्ज्वल भविष्य
जेन ज़ी को अक्सर 'आभासी दुनिया में खोई हुई' पीढ़ी कहकर खारिज किया जाता है, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। वे दुनिया को नैतिकता के पुराने चश्मे से नहीं देखते। उनके लिए 'आईफोन' समानता का प्रतीक हो सकता है और 'थेरेपी' साहस का।
यह पीढ़ी हमें उन तरीकों से निराश करेगी जिसकी हम उम्मीद करते हैं, लेकिन उन तरीकों से आश्चर्यचकित भी करेगी जिसकी हमने कल्पना नहीं की थी। लोकतंत्र का भविष्य अब संसद की बहसों से ज्यादा, जेन ज़ी के स्मार्टफोन की स्क्रीन और उनकी सामूहिक भावनाओं पर टिका है।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
सन्दर्भ
हाल ही में तमिलनाडु सरकार द्वारा नियुक्त न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ समिति ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की है। यह रिपोर्ट भारत में पिछले कुछ दशकों से बढ़ते 'केंद्रीकरण' के रुझान पर एक गंभीर चेतावनी जारी करती है। समिति का मानना है कि भारतीय संघीय ढांचा वर्तमान में एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ राज्यों की स्वायत्तता कम हो रही है, जो लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए चिंताजनक है।
कुरियन जोसेफ समिति की रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु
समिति ने केंद्र-राज्य संबंधों का गहन विश्लेषण किया है और निम्नलिखित प्रमुख पहलुओं को रेखांकित किया है:
- संरचनात्मक पुनर्गठन की आवश्यकता: रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय संघवाद को वर्तमान में 1991 के आर्थिक सुधारों के स्तर के एक बड़े 'स्ट्रक्चरल रीसेट' (संरचनात्मक पुनर्गठन) की आवश्यकता है।
- संविधान में संशोधन की सुगमता: समिति के अनुसार, भारतीय संविधान में संशोधन की प्रक्रिया काफी सरल है, जिसका लाभ उठाकर केंद्र अक्सर ऐसी नीतियां लागू करता है जो राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण करती हैं।
- राज्यों की क्षेत्रीय अखंडता: 2019 में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन का उदाहरण देते हुए रिपोर्ट बताती है कि राज्यों का अस्तित्व और उनकी सीमाएं केंद्र की इच्छा पर निर्भर हो गई हैं, जो संघीय भावना के विपरीत है।
- वित्तीय स्वायत्तता का ह्रास: जीएसटी (GST) के आने के बाद राज्यों के पास कर जुटाने के अपने साधन सीमित हो गए हैं। वित्तीय संसाधनों का आवंटन अब केंद्र के पक्ष में अधिक झुका हुआ है।
- संस्थागत हस्तक्षेप: रिपोर्ट में राज्यपाल के पद के राजनीतिकरण और शिक्षा व स्वास्थ्य जैसे 'राज्य सूची' के विषयों पर केंद्र के बढ़ते नियंत्रण पर तीखी आलोचना की गई है।
संघवाद को प्रभावित करने वाले अन्य महत्वपूर्ण पहलू
रिपोर्ट के अलावा, वर्तमान परिदृश्य में कुछ ऐसे मुद्दे हैं जो राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा होने चाहिए:
- परिसीमन की चिंता: आगामी लोकसभा सीटों का परिसीमन दक्षिण भारतीय राज्यों के लिए चिंता का विषय है। जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहने वाले राज्यों को डर है कि संसद में उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी कम हो जाएगी।
- एक राष्ट्र, एक भाषा/चुनाव: 'एक राष्ट्र, एक भाषा' या 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' जैसे विचार भारत की विविधतापूर्ण पहचान और स्थानीय मुद्दों की महत्ता को कम कर सकते हैं।
- एजेंसियों का उपयोग: केंद्रीय जांच एजेंसियों के कथित दुरुपयोग ने केंद्र और विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों के बीच अविश्वास की खाई को बढ़ा दिया है।
विश्लेषण
भारतीय संविधान के निर्माताओं ने भारत की अखंडता को बनाए रखने के लिए 'लचीला संघवाद' बनाया था, जिसमें केंद्र को अधिक शक्तियां दी गई थीं। हालांकि, वर्तमान समय में यह 'सहकारी संघवाद' से हटकर 'प्रतिस्पर्धी और दंडात्मक संघवाद' की ओर बढ़ता दिख रहा है।
केंद्रीकरण से प्रशासनिक कुशलता तो बढ़ सकती है, लेकिन भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में 'स्थानीय समस्याओं का राष्ट्रीय समाधान' हमेशा सफल नहीं होता। विविधता का सम्मान करना ही भारतीय लोकतंत्र की असली ताकत है।
आगे की राह
- अंतर-राज्य परिषद को मजबूत करना: अनुच्छेद 263 के तहत गठित इस परिषद को सक्रिय कर केंद्र और राज्यों के बीच विवादों को सुलझाने का मुख्य मंच बनाना चाहिए।
- वित्तीय विकेंद्रीकरण: 16वें वित्त आयोग को राज्यों के राजकोषीय हितों की रक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए और राज्यों को अधिक वित्तीय स्वतंत्रता देनी चाहिए।
- राज्यपाल के पद में सुधार: पुंछी आयोग और सरकारिया आयोग की सिफारिशों को लागू किया जाना चाहिए ताकि राज्यपाल का पद केवल एक संवैधानिक रक्षक के रूप में कार्य करे, न कि केंद्र के प्रतिनिधि के रूप में।
- साझा विमर्श: परिसीमन जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सभी राज्यों के साथ सर्वसम्मति बनाना अनिवार्य है।
निष्कर्ष
न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ समिति की रिपोर्ट मात्र एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के लिए एक 'वेक-अप कॉल' (चेतावनी) है। एक सशक्त भारत के लिए एक सशक्त केंद्र और सशक्त राज्यों का होना अनिवार्य है। यदि भारत को अपनी विविधता को बनाए रखते हुए प्रगति करनी है, तो उसे केंद्रीकरण के बजाय सहकारी संघवाद की मूल भावना को पुनर्जीवित करना होगा। जैसा कि रिपोर्ट सुझाव देती है, अब समय आ गया है कि हम संघवाद पर एक नई राष्ट्रीय बहस शुरू करें।