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महादयी नदी विवाद

संदर्भ

हाल ही में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने लोकसभा में स्पष्ट किया है कि कर्नाटक द्वारा महादयी नदी के डायवर्जन के लिए कोई भी पर्यावरण मंजूरी (EC) प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है। साथ ही, राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड ने भी कलासा नाला परियोजना के लिए वन भूमि के उपयोग को मंजूरी नहीं दी है।

महादयी नदी:

  • महादयी (म्हादेई/मंडोवी) नदी का उद्गम कर्नाटक के बेलगावी (बेलगाम) जिले के खानापुर तालुका में स्थित भीमगढ़ वन्यजीव अभयारण्य के क्षेत्र में, पश्चिमी घाट से होता है।

  • महादयी बेसिन कर्नाटक, गोवा और महाराष्ट्र तीनों राज्यों में फैला है। नदी मुख्यतः कर्नाटक से गोवा में प्रवेश करती है और अरब सागर में गिरती है।
  • इसे गोवा में 'मंडोवी नदी' के नाम से जाना जाता है और इसे गोवा की जीवन रेखा कहा जाता है।

चर्चा में क्यों है?

  • यह नदी पिछले कई दशकों से कर्नाटक और गोवा के बीच जल बँटवारे को लेकर कानूनी और राजनीतिक विवाद का केंद्र बनी हुई है।

  • हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा यह स्पष्ट किए जाने के कारण कि महादयी बेसिन के डायवर्जन या संचयी प्रभाव आकलन (CIA) के लिए कोई औपचारिक प्रस्ताव नहीं है, यह मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा में आ गया है।

महत्वपूर्ण बिंदु

  • जल विवाद न्यायाधिकरण: इस नदी के जल बँटवारे के विवाद को सुलझाने के लिए 2010 में 'महादयी जल विवाद न्यायाधिकरण' का गठन किया गया था।

  • पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र: यह नदी पश्चिमी घाट के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र से होकर गुजरती है, जो जैव विविधता और वन्यजीव गलियारों (जैसे काली और सह्याद्री टाइगर रिजर्व) के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है।
  • प्रमुख परियोजनाएँ: इस विवाद से जुड़ी मुख्य परियोजनाएँ कलसा-बंडूर नाला परियोजना हैं, जिन्हें कर्नाटक सरकार पेयजल आपूर्ति के उद्देश्य से बनाना चाहती है।
  • संघीय विवाद: यह मामला अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत राज्यों (कर्नाटक, गोवा और महाराष्ट्र) के बीच जल अधिकारों और संसाधनों के बँटवारे के संघीय संघर्ष को दर्शाता है।

अन्य महत्वपूर्ण बिंदु

  • पारिस्थितिकी पर प्रभाव: गोवा और पर्यावरणविदों का तर्क है कि इस नदी के डायवर्जन से गोवा में पेयजल संकट पैदा हो सकता है, खारा पानी तटीय भूमि में प्रवेश कर सकता है और पारिस्थितिकी तंत्र को भारी नुकसान पहुँच सकता है।

  • कानूनी स्थिति: न्यायाधिकरण ने अपने फैसले में तीनों राज्यों के बीच पानी के बँटवारे का आवंटन किया था, जिसे लेकर कानूनी और राजनीतिक खींचतान अभी भी जारी है।


निष्कर्ष

महादयी नदी विवाद केवल दो राज्यों के बीच पानी का बँटवारा नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और मानवीय विकास के बीच एक संवेदनशील संतुलन का मुद्दा है। इस जटिल चुनौती के दीर्घकालिक समाधान के लिए सहयोगात्मक संघवाद और वैज्ञानिक आधार पर पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) बेहद आवश्यक हैं।


स्वास्थ्य सेवा में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की भूमिका: संभावनाएँ और चुनौतियाँ

सामान्य अध्ययन पेपर – II:  शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।

सामान्य अध्ययन पेपर – III:  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।

संदर्भ

आधुनिक चिकित्सा ने ज्ञान के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है, किंतु यह विशेषज्ञता समय पर जरूरतमंद मरीजों तक पहुँचाना एक बड़ी चुनौती रही है। भारत जैसे विकासशील देश में, जहाँ स्वास्थ्य के बुनियादी ढाँचे का विस्तार हो रहा है और बीमारियाँ जटिल होती जा रही हैं, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच को व्यापक बनाना बेहद आवश्यक हो गया है।

स्वास्थ्य सेवा में एआई

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) स्वास्थ्य क्षेत्र में एक नया आयाम जोड़ती है, जो संचित चिकित्सा ज्ञान को सीधे 'देखभाल के बिंदु' पर उपलब्ध कराती है। अब एआई केवल अनुसंधान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नैदानिक वर्कफ़्लो, परामर्श और अस्पताल के दैनिक संचालन का एक अभिन्न हिस्सा बनता जा रहा है।

हालिया चर्चा के कारण

  • वैश्विक प्रगति: जनवरी 2025 में अमेरिकी एफडीए (FDA) ने 1,000 से अधिक एआई-सक्षम चिकित्सा उपकरणों को अधिकृत किया। वहीं, यूके (UK) में एनएचएस (NHS) ने डॉक्टरों का समय बचाने के लिए 'एम्बिएंट स्क्रिबिंग' तकनीक को अपनाया।

  • भारत की डिजिटल छलांग: मई 2026 तक 100 करोड़ से अधिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड आयुष्मान भारत हेल्थ अकाउंट से जुड़ चुके हैं। इसके अलावा, एबीडीएम (ABDM) 'स्कैन एंड शेयर' सेवा ने अस्पतालों में पंजीकरण के समय को घटाकर मात्र 2 से 5 मिनट कर दिया है।

एआई किस तरह महत्वपूर्ण है?

  • यह रेडियोलॉजी स्कैन को प्राथमिकता देने और गंभीर रूप से बीमार मरीजों की पहचान करने में मदद करता है।

  • छोटे शहरों या दूरदराज के इलाकों में बैठे चिकित्सकों को जटिल मामलों में सटीक निर्णय लेने के लिए आभासी विशेषज्ञ सहायता प्रदान करता है।
  • यह अस्पताल के प्रशासनिक कार्यों के बोझ को कम करके डॉक्टरों का कीमती समय बचा सकता है।
  • एआई के उपयोग से स्वास्थ्य सेवा की दक्षता में भारी सुधार होता है।
  • यह रिमोट मॉनिटरिंग के जरिए अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद भी मरीजों की देखभाल सुनिश्चित करता है।
  • जोखिम-आधारित निवारक कार्यक्रमों के माध्यम से यह शुरुआती स्तर पर ही बीमारियों की पहचान करने में सक्षम बनाता है।

रिपोर्ट्स

जनवरी 2026 के एक मै मैकिंज़ी (McKinsey) विश्लेषण के अनुसार, स्वास्थ्य सेवा के राजस्व-चक्र संचालन में एआई का उपयोग करने से संग्रह की लागत में 30% से 60% तक की भारी कमी आ सकती है, जिससे अस्पतालों को बेहतर संसाधन जुटाने में मदद मिलती है।

प्रभाव

  • आर्थिक प्रभाव: अस्पतालों के प्रशासनिक खर्च में कमी आती है और कार्य कुशलता बढ़ती है।
  • सामाजिक प्रभाव: मधुमेह, हृदय रोग और कैंसर जैसी पुरानी बीमारियों के निरंतर प्रबंधन से मरीजों के जीवन की गुणवत्ता सुधरती है और स्वास्थ्य सेवा अधिक समावेशी बनती है।

चिंताएँ

  • विविधता और पूर्वाग्रह: एक अस्पताल या क्षेत्र में सफल रहने वाला एआई मॉडल देश के अन्य राज्यों या विभिन्न जनसांख्यिकीय पैटर्न पर समान रूप से प्रभावी नहीं हो सकता है।
  • वास्तविक दुनिया का मूल्यांकन: एफडीए (FDA) द्वारा सितंबर 2025 में उठाई गई चिंता के अनुसार, लॉन्च के समय एआई उपकरणों का अच्छा प्रदर्शन यह गारंटी नहीं देता कि वे समय के साथ सटीक परिणाम देते रहेंगे। इसमें निरंतर मानवीय निरीक्षण की आवश्यकता बनी रहती है।

आगे की राह

  • स्वास्थ्य सेवा में एआई का उपयोग अंधाधुंध नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण होना चाहिए।

  • नैदानिक मान्यता, प्रतिनिधि डेटा और सख्त मानवीय निगरानी के लिए मजबूत नियामक मानक तैयार किए जाने चाहिए।
  • प्रौद्योगिकी का मुख्य उद्देश्य तकनीक बेचना नहीं, बल्कि मरीजों तक समय पर पहुँचना और जीवन की रक्षा करना होना चाहिए।


निष्कर्ष

किसी भी राष्ट्र की आर्थिक शक्ति अंततः उसके नागरिकों के स्वास्थ्य और उत्पादकता पर निर्भर करती है। स्वास्थ्य सेवा में एआई का वास्तविक मूल्यांकन प्रणालियों की संख्या से नहीं, बल्कि इसके द्वारा बचाए गए जीवन और जनसाधारण के चेहरे पर आई मुस्कान से तय होगा।

पश्चिम एशिया में बदलता भू-राजनीतिक समीकरण: भारत के समक्ष उभरती रणनीतिक चुनौतियाँ और विकल्प

सामान्य अध्ययन पेपर – II:  शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।

संदर्भ

पश्चिम एशिया वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार और भू-राजनीतिक संतुलन की धुरी रहा है। इस क्षेत्र में शक्ति संतुलन का कोई भी संरचनात्मक बदलाव प्रत्यक्ष तौर पर भारत की ऊर्जा सुरक्षा, वृहद आर्थिक स्थिरता, प्रवासी नागरिकों के हितों और इंडो-पैसिफिक से जुड़े सामरिक हितों को प्रभावित करता है।

भारत और पश्चिम एशिया:

  • ऊर्जा सुरक्षा की रीढ़: भारत अपनी कुल ऊर्जा आवश्यकताओं (कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस) का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है।

  • आर्थिक संप्रभुता (प्रवासी रेमिटेंस): खाड़ी देशों (GCC क्षेत्र) में कार्यरत करोड़ों भारतीय प्रवासियों द्वारा भेजा जाने वाला अरबों डॉलर का वार्षिक रेमिटेंस भारत के विदेशी मुद्रा भंडार और चालू खाता घाटे (CAD) को संतुलित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • विस्तृत पड़ोस नीति: यह क्षेत्र भारत की 'एक्ट वेस्ट पॉलिसी' का केंद्रीय आधार है, जो सुरक्षा और व्यापारिक मोर्चे पर द्विपक्षीय साझीदारियों पर टिका है।

हालिया चर्चा के कारण

  • सुरक्षा वास्तुकला का विखंडन: अमेरिका-इजराइल और ईरान के मध्य जारी संघर्ष के क्षेत्रीय प्रसार ने पश्चिम एशिया के सामरिक समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है।

  • पारंपरिक सुरक्षा छाते पर पुनर्विचार: खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देश बदलते भू-राजनीतिक परिवेश में पारंपरिक अमेरिकी 'सुरक्षा छाता' की प्रभावशीलता और विश्वसनीयता का पुनर्मूल्यांकन कर रहे हैं।
  • रणनीतिक गठजोड़ का उद्भव: क्षेत्र में उभरते नए बहुपक्षीय रक्षा समझौतों और सामरिक गठबंधनों के कारण भारत की पारंपरिक 'संतुलित कूटनीति' के समक्ष एक गंभीर सामरिक परीक्षा की स्थिति उत्पन्न हो गई है।

पश्चिम एशिया में भारत की पूर्व उपलब्धियाँ और उभरती रणनीतिक सीमाएँ

विगत दशक में भारत ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण कूटनीतिक लाभ अर्जित किए थे, जो अब भू-राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहे हैं:

  • उच्चस्तरीय रणनीतिक जुड़ाव: 2016 में सऊदी अरब द्वारा भारतीय प्रधानमंत्री को अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित किया जाना दोनों देशों के प्रगाढ़ होते रक्षा और रणनीतिक संबंधों का प्रतीक था।
  • I2U2 मंच (2021): भारत, इज़राइल, अमेरिका और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच यह मिनी-लेटरल मंच तकनीकी, आर्थिक और आपूर्ति श्रृंखला के मोर्चे पर सहयोग का नया माध्यम बना।
  • चाबहार बंदरगाह समझौता (2024): ईरान के चाबहार बंदरगाह के दीर्घकालिक विकास और संचालन का जिम्मा भारत को मिलना, मध्य एशिया, अफगानिस्तान और 'अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे' (INSTC) तक भारत की भू-आर्थिक पहुँच के लिए एक मील का पत्थर था।
  • वर्तमान चुनौती: वर्तमान क्षेत्रीय संघर्षों और भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण के कारण इन पहलों के सुचारू क्रियान्वयन पर संशय के बादल मंडराने लगे हैं।

हालिया भू-राजनीतिक प्रभाव और वर्तमान स्थिति

  • पश्चिम एशिया वर्तमान में 'रणनीतिक जुड़ाव' (जैसे UAE का दृष्टिकोण) और 'प्रतिरोध' (जैसे सऊदी अरब की संभावित रणनीति) के दो विरोधी छोरों पर खड़ा है।

  • ईरान-इजराइल संघर्ष के दायरे में वृद्धि और लाल सागर-खाड़ी क्षेत्र में मिलिशिया समूहों (जैसे हूती विद्रोहियों) की सक्रियता ने समुद्री वाणिज्य, ऊर्जा परिवहन लाइनों (SLOCs) और भू-राजनीतिक स्थिरता को प्रत्यक्ष जोखिम में डाल दिया है।

पाकिस्तान की कूटनीति और उभरता नया क्षेत्रीय समीकरण

  • कूटनीतिक मध्यस्थता: अमेरिका-ईरान संघर्ष में पाकिस्तान द्वारा मध्यस्थता के प्रयासों से उसे क्षेत्र में कुछ कूटनीतिक दृश्यता और प्रतिष्ठात्मक लाभ प्राप्त हुए हैं।

  • मक्का सामूहिक रक्षा समझौता: सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच हुआ हालिया रक्षा सहयोग ढांचा मुख्य रूप से ईरान के मुकाबले इज़राइल के सामरिक प्रतिरोध पर केंद्रित है। इसमें सऊदी पूंजी, पाकिस्तान की सैन्य क्षमता और तुर्किये की सामरिक-तकनीकी विशेषज्ञता का समन्वय करने का प्रयास किया गया है।
  • भारत के लिए निहितार्थ: यदि भविष्य में इज़राइल-पाकिस्तान सामरिक तनाव बढ़ता है या तुर्किये भारत विरोधी मुद्दों पर पाकिस्तान को प्रत्यक्ष सहायता प्रदान करता है, तो यह भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक संवेदनशील समीकरण बन सकता है।

भारत के समक्ष सामरिक चिंताएँ

  • मैरीटाइम सिक्योरिटी और ट्रेड वल्नरेबिलिटी: होर्मुज जलडमरूमध्य और बाब-एल-मंडेब जैसे चोकपॉइंट्स पर असुरक्षा बढ़ने से भारत का ऊर्जा आयात और मर्चेंट शिपिंग सीधे प्रभावित हो रही है।

  • रणनीतिक दुविधा: एक तरफ इज़राइल और UAE के साथ मजबूत रक्षा व आर्थिक संबंध, तथा दूसरी तरफ ईरान और सऊदी अरब के साथ पारंपरिक ऊर्जा व रणनीतिक हितों के बीच संतुलन साधना अत्यंत जटिल हो गया है।
  • बाहरी शक्तियों का प्रभाव: तुर्किये-पाकिस्तान-सऊदी अरब धुरी के उभरने से पश्चिम एशियाई भू-राजनीति में भारत के पारंपरिक रणनीतिक लाभ प्रभावित हो सकते हैं।

भारत के समक्ष उपलब्ध नीतिगत विकल्प

  • सक्रिय क्षेत्रीय राजनीतिक कूटनीति: भारत को केवल प्रतिक्रियावादी होने के बजाय सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों के साथ उच्च स्तरीय राजनीतिक संवाद को और अधिक प्रगाढ़ करना चाहिए।

  • विश्वास-बहाली में मध्यस्थता: भारत अरब देशों और ईरान के बीच तनाव कम करने तथा क्षेत्रीय स्तर पर संवाद के सेतु का कार्य कर सकता है।
  • समुद्री सुरक्षा और नौवहन की स्वतंत्रता: लाल सागर और पश्चिमी हिंद महासागर में मित्र देशों (जैसे मिस्र और क्षेत्रीय नौसेनाओं) के साथ संयुक्त नौवहन सुरक्षा अभियान और गश्त बढ़ाई जानी चाहिए।
  • विशेष दूत की नियुक्ति: पश्चिम एशिया के लिए एक उच्च-स्तरीय 'विशेष दूत' की नियुक्ति की जानी जो क्षेत्र के तमाम कूटनीतिक धागों (ऊर्जा, प्रवासी सुरक्षा, रक्षा और कूटनीति) को समन्वित कर सके।

आगे की राह

  • भारत को पश्चिम एशिया में अपनी नीति को केवल 'लेन-देन आधारित' से बदलकर 'दीर्घकालिक संस्थागत साझेदारी' के रूप में ढालना होगा।

  • ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री संप्रभुता और बहुपक्षीय सुरक्षा ढांचों में सक्रिय भागीदारी के माध्यम से ही भारत इस क्षेत्र में अपनी सामरिक स्वायत्तता को बनाए रख सकता है।


निष्कर्ष

पश्चिम एशिया में हो रहे तीव्र भू-राजनीतिक परिवर्तन यह स्पष्ट करते हैं कि भारत इस क्षेत्र की उथल-पुथल से तटस्थ नहीं रह सकता। एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति के रूप में, भारत के पास यह क्षमता और सामरिक उत्तरदायित्व दोनों हैं कि वह पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन को साधते हुए शांति, स्थिरता और पूर्वानुमान-क्षमता की बहाली में एक निर्णायक भूमिका निभाए।

बचपन से थोपा गया घरेलू बोझ: अदृश्य श्रम, लैंगिक असमानता और महिला सशक्तिकरण की चुनौती

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- I: भारतीय विरासत और संस्कृति, विश्व का इतिहास एवं भूगोल और समाज।

सामान्य अध्ययन पेपर – III:  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।

संदर्भ

समाज में महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक स्थिति का निर्धारण अक्सर वयस्कता से ही जोड़कर देखा जाता है, जबकि इसकी जड़ें बाल्यावस्था की सामाजिक संरचनाओं में धंसी होती हैं। परिवार और समाज द्वारा तय की जाने वाली भूमिकाएँ महिलाओं के जीवनभर के विकल्पों को अनजाने में ही बहुत सीमित कर देती हैं।

बचपन से घरेलू बोझ उठाने के लिए लड़कियों का प्रशिक्षण

लड़कियों की परवरिश का तरीका उन्हें शुरुआत से ही घर की चारदीवारी और रसोई के प्रबंधन के लिए मानसिक रूप से तैयार करता है। ग्रामीण हरियाणा की महिला उद्यमियों के साथ हालिया अनुभवों से यह बात सामने आई है कि महिलाओं की वेतनभोगी और स्वतंत्र आजीविका में सबसे बड़ी व्यावहारिक बाधा उनके समय का एक बड़ा हिस्सा खाना पकाने और घरेलू कामों में उलझा होना है। हैरानी की बात यह है कि इस अदृश्य श्रम के बोझ को कम करने में उनके भाई (बेटे) हाथ नहीं बंटाते, बल्कि उनकी अपनी छोटी बेटियां ही रसोई और घर के अन्य कामों में माँ का हाथ बंटाकर इस लैंगिक अंतर को अनजाने में अगली पीढ़ी तक पहुंचा रही हैं।

चर्चा के कारण

  • 'भारतीय अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंध अनुसंधान परिषद' के शोधकर्ताओं (तनु एम. गोयल, मोहम्मद ताहूर और श्रावणी प्रकाश) द्वारा किए गए अध्ययन के कारण यह विषय केंद्र में आया है।

  • आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS, 2025) के हालिया आंकड़े बताते हैं कि श्रम बाजार से महिलाओं की अनुपस्थिति का सबसे प्रमुख कारण बाल देखभाल और घरेलू जिम्मेदारियाँ हैं। शहरी क्षेत्रों की 52.5% और ग्रामीण क्षेत्रों की 40% महिलाओं ने इसी कारण से श्रम बल से बाहर रहने की बात कही है, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 1% से भी कम है।

भारत का समय उपयोग सर्वेक्षण, 2025

भारत का नवीनतम समय उपयोग सर्वेक्षण, 2025 इस सच्चाई को उजागर करता है कि वयस्क जीवन में दिखने वाला भारी श्रम विभाजन अचानक पैदा नहीं होता, बल्कि यह बाल्यावस्था की कंडीशनिंग का परिणाम है। किशोरावस्था कोई अलग कालखंड नहीं है, बल्कि यह वह महत्वपूर्ण चरण है जहाँ भविष्य के वयस्क लैंगिक प्रतिमान और भूमिकाएँ आकार लेती हैं।

'बचपन से वयस्कता तक: घरेलू कार्यों का बढ़ता चक्र और सिकुड़ता व्यक्तिगत समय'

जीवन के शुरुआती चरणों में लड़के और लड़कियां घरेलू कार्यों में लगभग समान समय (प्रतिदिन लगभग 5 मिनट) देते हैं, लेकिन लगभग 10 वर्ष की आयु के बाद यह समानता समाप्त हो जाती है और दोनों के मार्ग पूरी तरह अलग दिशा में मुड़ जाते हैं। 10 वर्ष की आयु के बाद लड़कियों का घरेलू कार्य ग्राफ तेजी से ऊपर उठता है, जो किशोरावस्था के अंत तक पहुंचते-चढ़ते उन्हें घर के मुख्य कामकाजी हिस्से के रूप में स्थापित कर देता है और 30 वर्ष की आयु तक आते-आते यह अपने चरम पर पहुँच जाता है।

महत्वपूर्ण आंकड़े

  • उम्र के साथ बढ़ता समय: 6 वर्ष की उम्र में मात्र 5 मिनट से शुरू होने वाला बालिकाओं का घरेलू काम 10 वर्ष की आयु में 15 मिनट, 15 वर्ष की आयु में 75 मिनट और 17 वर्ष की आयु तक लगभग 130 मिनट प्रतिदिन तक पहुँच जाता है। इसके विपरीत, लड़कों का घरेलू कार्य ग्राफ 6 से 75 वर्ष की आयु के बीच किसी भी स्थिति में 65 मिनट को पार नहीं करता।

  • शिखर बिंदु: महिलाओं द्वारा घर के काम में बिताया जाने वाला समय 30 वर्ष की आयु के आसपास प्रतिदिन लगभग 460 मिनट (7.5 घंटे से अधिक) के उच्चतम स्तर पर पहुँच जाता है।
  • अवेतनिक कार्य अनुपात (लड़कियों और लड़कों का अनुपात): 6–9 वर्ष के बच्चों में यह अनुपात 1.6 है, जो 10–14 वर्ष की आयु में 4.5 और 15–17 वर्ष के किशोरों में बढ़कर 7.5 हो जाता है।
  • फुरसत में भारी गिरावट: 6 से 17 वर्ष की आयु के बीच लड़कियों का घरेलू काम 124 मिनट बढ़ जाता है, जबकि उनका खाली समय 115 मिनट घट जाता है।
  • रसोई बनाम बाहरी कार्य: 15–17 वर्ष की आयु के बीच 42.4% लड़कियाँ नियमित रूप से खाना पकाने के कार्य से जुड़ी हैं (औसतन लगभग 1 घंटा प्रतिदिन), जबकि लड़कों में यह भागीदारी मात्र 2.9% (लगभग 2 मिनट) है। इसके विपरीत, कृषि और खरीदारी जैसे बाहरी और खुले कार्य लड़कों के हिस्से में आते हैं।

प्रमुख चिंताएं

  • कौशल और 'एजेंसी' का संकुचन: खेल, विश्राम, मित्र मंडली और सृजनात्मक गतिविधियों के लिए समय न मिलने के कारण बालिकाओं में आत्मविश्वास, सामाजिक नेटवर्क और निर्णय लेने की क्षमता ('एजेंसी') का विकास बाधित होता है।

  • शिक्षा बनाम व्यक्तिगत समय का अंतर: यद्यपि लड़कियाँ अधिकांश आयु वर्ग में लड़कों की तुलना में पढ़ाई पर थोड़ा अधिक समय दे रही हैं और स्कूलों में अपनी उपस्थिति बनाए हुए हैं, फिर भी वे अपने व्यक्तिगत खाली समय और मानसिक विश्राम की भारी कीमत चुकाती हैं।
  • आर्थिक भागीदारी पर प्रतिकूल प्रभाव: वर्षों की इस लैंगिक कंडीशनिंग के कारण जब युवतियां श्रम बाजार में प्रवेश करती हैं, तो उनके करियर विकल्प और आर्थिक स्वतंत्रता पहले ही सीमित हो चुकी होती हैं।

महत्वपूर्ण बिंदु

  • घर के अंदर बनाम बाहर का विभाजन: समाज की यह पितृसत्तात्मक संरचना बालिकाओं को 'घर के अंदर' (रसोई, सफाई, देखभाल) के लिए और बालकों को 'बाहर की दुनिया' (खेत, बाजार, रोजगार) के लिए प्रशिक्षित करती है।

  • नीतिगत दायरे का विस्तार: अब तक की अधिकांश कल्याणकारी नीतियाँ वयस्क महिलाओं के लिए केवल चाइल्डकैअर, सामुदायिक रसोई या लचीले कार्य की बात करती हैं, किंतु समस्या की जड़ बाल्यावस्था में छुपी असमानता में है, जिसे नीतिगत स्तर पर संबोधित करना अनिवार्य है।

विश्लेषण

यह समस्या केवल समय प्रबंधन या व्यक्तिगत पसंद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक गहरी सामाजिक संरचना का हिस्सा है जो श्रम के लैंगिक विभाजन को सामान्य मान लेती है। जब तक बाल्यकाल से ही श्रम के इस लिंग-आधारित आवंटन को चुनौती नहीं दी जाएगी, तब तक केवल कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से महिलाओं की आर्थिक स्वावलंबन की परिकल्पना अधूरी रहेगी।

आगे की राह

  • स्कूली पाठ्यक्रम में व्यावहारिक कौशल: विद्यालयों में लड़कों और लड़कियों दोनों के लिए समान रूप से व्यावहारिक जीवन कौशल (जैसे- खाना पकाने से लेकर वित्तीय प्रबंधन, सिलाई और गृह प्रबंधन) अनिवार्य किए जाने चाहिए।

  • लैंगिक तटस्थ पारिवारिक दृष्टिकोण: घरेलू दायित्वों को केवल महिलाओं की नियति मानने की सामाजिक मानसिकता को बदलकर इसे परिवार के सभी सदस्यों के बीच साझा जिम्मेदारी बनाना होगा।
  • संस्थागत और सामाजिक संवेदीकरण: सरकार और समाज को मिलकर ऐसी सहायक अधोसंरचना का विकास करना चाहिए जो बालिकाओं पर से इस अतिरिक्त अदृश्य बोझ को कम कर सके।


निष्कर्ष

यदि हम भविष्य में एक समावेशी और विकसित भारत के निर्माण का लक्ष्य रखते हैं, तो हमें अपनी नीतियों का दायरा केवल कार्यस्थल तक सीमित न रखकर बाल्यकाल तक फैलाना होगा। बालकों और बालिकाओं को समान अवसर और गैर-भेदभावपूर्ण परवरिश देना ही लैंगिक समानता और एक सशक्त महिला कार्यबल की वास्तविक नींव रख सकता है।