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संदर्भ

दक्षिण कोरिया और जापान के बीच 'डोकडो/ताकेशिमा' द्वीपों को लेकर दशकों पुराना विवाद एक बार फिर गहरा गया है। यह तनाव मुख्य रूप से 1910-1945 के दौरान कोरियाई प्रायद्वीप पर जापान के औपनिवेशिक शासन की कड़वी यादों और क्षेत्रीय संप्रभुता के दावों से जुड़ा है।

ताज़ा घटनाक्रम के मुख्य बिंदु

  • जापान का 'ताकेशिमा दिवस': जापान के शिमाने प्रान्त में विवादित द्वीपों के सम्मान में 'ताकेशिमा दिवस' का आयोजन किया गया, जिसमें एक वरिष्ठ जापानी सरकारी अधिकारी ने हिस्सा लिया।
  • दक्षिण कोरिया का कड़ा विरोध: सियोल ने इस आयोजन को अपनी संप्रभुता का "अन्यायपूर्ण उल्लंघन" बताते हुए तीव्र आपत्ति दर्ज की है।
  • राजनयिक बुलावा: दक्षिण कोरियाई विदेश मंत्रालय ने विरोध दर्ज कराने के लिए सियोल में तैनात एक शीर्ष जापानी राजनयिक को तलब किया।
  • जापान का पक्ष: जापानी सरकार ने इस बार कैबिनेट मंत्री के बजाय एक उप-मंत्री को भेजकर मामले को संतुलित करने की कोशिश की, लेकिन अपने संप्रभुता के दावे पर कायम रहा।
  • तनावपूर्ण समय: यह विरोध जापान के विदेश मंत्री द्वारा संसद में दिए गए उस बयान के ठीक बाद आया है जिसमें उन्होंने इन द्वीपों को टोक्यो का हिस्सा बताया था।

डोकडो द्वीप

  • नाम: दक्षिण कोरिया में इसे 'डोकडो' और जापान में 'ताकेशिमा' कहा जाता है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसे 'लियानकोर्ट रॉक्स' के नाम से भी जाना जाता है।
  • स्थिति: यह द्वीप समूह जापान के सागर (पूर्वी सागर) में स्थित छोटे ज्वालामुखी चट्टानों का एक समूह है।
  • नियंत्रण: वर्तमान में इन द्वीपों पर दक्षिण कोरिया का नियंत्रण है, जहाँ उनकी सुरक्षा पुलिस तैनात रहती है।
  • आर्थिक महत्व:
    • मत्स्य पालन: यह क्षेत्र दुनिया के सबसे उपजाऊ मछली पकड़ने वाले क्षेत्रों में से एक है।
    • प्राकृतिक संसाधन: माना जाता है कि इन द्वीपों के नीचे प्राकृतिक गैस हाइड्रेट के विशाल भंडार हैं, जिनकी कीमत अरबों डॉलर हो सकती है।
    • विशाल ऊर्जा भंडार: हालिया सर्वेक्षणों के अनुसार, इन द्वीपों के नीचे 600 मिलियन टन गैस हाइड्रेट्स (फायर आइस) होने का अनुमान है।
    • आर्थिक महत्व: इस प्राकृतिक गैस संसाधन का वार्षिक मूल्य लगभग $10 बिलियन है, जो इसे एक अत्यंत कीमती क्षेत्र बनाता है।
    • रणनीतिक संपत्ति: इतनी बड़ी खनिज संपदा की मौजूदगी इन विवादित द्वीपों को दोनों देशों के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक ऊर्जा संपत्ति बनाती है।
    • ऐतिहासिक दावा: दक्षिण कोरिया का कहना है कि ये द्वीप छठी शताब्दी से उनके क्षेत्र का हिस्सा रहे हैं, जबकि जापान 17वीं शताब्दी से अपना ऐतिहासिक दावा पेश करता है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विवाद की उत्पत्ति

  • प्राचीन विरासत और साक्ष्य: दक्षिण कोरिया के दावों की जड़ें 6वीं शताब्दी के 'सिल्ला साम्राज्य' तक जाती हैं। कोरियाई पक्ष 'सेजोंग सिल्लोक जिरीजी' जैसे प्राचीन मानचित्रों और आधिकारिक दस्तावेजों का प्रमाण देता है, जो इन द्वीपों को ऐतिहासिक रूप से कोरियाई क्षेत्र का अभिन्न अंग दर्शाते हैं।
  • 1905 का जापानी अधिग्रहण: रूस-जापान युद्ध के दौरान, जापान ने इन द्वीपों को 'शिमाने प्रान्त' के अधीन कर लिया। उस समय जापान ने इन्हें 'टेरा नलियस' यानी 'लावारिस भूमि' घोषित किया था। हालांकि, दक्षिण कोरिया इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन और जापानी औपनिवेशिक विस्तारवाद की एक अवैध कार्रवाई मानता है।
  • द्वितीय विश्व युद्ध और वर्तमान स्थिति: 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध में जापान के आत्मसमर्पण के बाद, इन द्वीपों का प्रबंधन मित्र देशों के पास चला गया। अंततः, 1954 में दक्षिण कोरिया ने यहाँ अपनी स्थायी 'कोस्ट गार्ड' (तटरक्षक बल) की टुकड़ी तैनात कर इस पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर लिया, जिसे वह अपने औपनिवेशिक मुक्ति के प्रतीक के रूप में देखता है।

निष्कर्ष

हालांकि चीन और अमेरिका के साथ व्यापारिक समीकरणों के बीच दोनों देश क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा देने पर सहमत हुए हैं, लेकिन 'डोकडो' जैसे भावनात्मक और आर्थिक मुद्दे उनके रिश्तों में "कांच की दीवार" बने हुए हैं। जब तक ऐतिहासिक घावों और संसाधनों की इस लड़ाई का कोई स्थायी समाधान नहीं निकलता, तब तक पूर्वी एशिया की इन दो प्रमुख शक्तियों के बीच पूर्ण शांति कठिन दिखाई देती है।

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।


संदर्भ

भारत दशकों से छद्म युद्ध और सीमा पार से प्रायोजित आतंकवाद का दंश झेल रहा है। पारंपरिक रूप से आतंकवाद को केवल सैन्य या पुलिसिया कार्रवाई के रूप में देखा जाता था, लेकिन आधुनिक युग में आतंकवाद का स्वरूप 'हाइब्रिड' हो चुका है। तकनीकी प्रगति, डार्क वेब, और ड्रोन के बढ़ते उपयोग ने पुरानी सुरक्षा प्रणालियों के समक्ष गंभीर चुनौतियाँ उत्पन्न कर दी हैं। इन पुरानी समस्याओं के जटिल होने और उनके स्थायी निवारण की अनिवार्य आवश्यकता को देखते हुए, भारत सरकार ने एक एकीकृत और भविष्योन्मुखी दृष्टिकोण अपनाते हुए अपनी पहली आधिकारिक आतंकवाद-विरोधी नीति जारी की है। हाल ही में कश्मीर (पहलगाम) और पंजाब की सीमाओं पर हुई घटनाओं ने इस बात को पुख्ता किया कि अब खंडित प्रयासों के स्थान पर एक 'नेशनल रिस्पॉन्स' की आवश्यकता है।

'प्रहार' क्या है?

'प्रहार' भारत की पहली 'राष्ट्रीय आतंकवाद-विरोधी नीति और रणनीति' है। यह नौ पृष्ठों का एक व्यापक विधिक और रणनीतिक दस्तावेज़ है, जिसे केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा तैयार किया गया है।

  • मूल मंत्र: आतंकवाद के विरुद्ध 'शून्य सहिष्णुता' और इसके 'पारिस्थितिकी तंत्र' का पूर्ण विनाश।
  • प्रकृति: यह नीति केवल रक्षात्मक नहीं, बल्कि प्रतिघाती और निवारक दोनों है।
  • विशिष्टता: यह आतंकवाद को किसी धर्म या जाति से जोड़ते हुए इसे एक वैश्विक सुरक्षा खतरे के रूप में परिभाषित करती है।

चर्चा में क्यों?

  • केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा नवंबर 2024 में की गई घोषणा के बाद, 23 फरवरी 2026 को इसे आधिकारिक तौर पर जारी किया गया।
  • यह नीति विशेष रूप से 'राष्ट्र-राज्यों' द्वारा समर्थित साइबर हमलों और आपराधिक हैकर्स द्वारा भारतीय डेटा को निशाना बनाने की बढ़ती घटनाओं के बीच आई है।
  • केंद्र सरकार अब सभी राज्यों में एक 'यूनिफॉर्म एंटी-टेरर स्ट्रक्चर' बनाना चाहती है, जिससे पूरे देश में आतंकी हमलों के प्रति एक समान 'प्रोटोकॉल' का पालन हो सके।

नीति के मुख्य आयाम

  • त्रि-आयामी सुरक्षा ढांचा

नीति स्पष्ट करती है कि भारत की संप्रभुता को जल, थल और नभ तीनों मोर्चों पर खतरों का सामना करना पड़ रहा है। 'प्रहार' के तहत इन तीनों क्षेत्रों में निगरानी और प्रतिघाती क्षमताओं को उन्नत करने पर बल दिया गया है ताकि किसी भी घुसपैठ या हमले का त्वरित प्रत्युत्तर दिया जा सके।

  • महत्वपूर्ण आर्थिक क्षेत्रों की सुरक्षा

आतंकवाद का लक्ष्य अब केवल जनहानि तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्र की आर्थिक रीढ़ को तोड़ना भी है। इस नीति में निम्नलिखित क्षेत्रों को 'क्रिटिकल सेक्टर' मानकर उनकी सुरक्षा के लिए विशेष प्रोटोकॉल निर्धारित किए गए हैं:

  • ऊर्जा और परमाणु शक्ति केंद्र।
  • रेलवे, नागरिक उड्डयन और प्रमुख बंदरगाह।
  • रक्षा, अंतरिक्ष अनुसंधान और डिजिटल अर्थव्यवस्था।
  • तकनीकी खतरों का मुकाबला: साइबर और सीबीआरएनईडी

आधुनिक आतंकवाद के डिजिटल स्वरूप को स्वीकार करते हुए नीति ने 'प्रहार' के तहत निम्नलिखित चुनौतियों को चिन्हित किया है:

  • साइबर हमले: राष्ट्र-राज्यों और आपराधिक हैकर्स द्वारा डिजिटल बुनियादी ढांचे पर प्रहार।
  • सीबीआरएनईडी: रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल, परमाणु, विस्फोटक और डिजिटल खतरों को रोकने के लिए खुफिया तंत्र को और अधिक सतर्क बनाना।
  • ड्रोन तकनीक: पंजाब और जम्मू-कश्मीर जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों में ड्रोन और रोबोटिक्स के दुरुपयोग को रोकने के लिए एंटी-ड्रोन सिस्टम का विकास।

रणनीतिक दृष्टिकोण

  • परिभाषा की स्पष्टता: भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपना रुख दोहराया है कि आतंकवाद का जुड़ाव किसी विशिष्ट धर्म, जातीयता या सभ्यता से नहीं है। यह एक वैश्विक मानवता-विरोधी कृत्य है।
  • एकीकृत जांच प्रणाली: जांच के हर चरण में कानूनी विशेषज्ञों को शामिल करना ताकि अपराधियों के विरुद्ध न्यायालय में ठोस मामले बनाए जा सकें।
  • संस्थानिक समन्वय: राज्यों के बीच एक 'समान आतंकवाद-विरोधी संरचना' स्थापित करना, जिससे केंद्र और राज्य की एजेंसियों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान और कार्रवाई 'सहक्रियात्मक' हो सके।

सामाजिक और निवारक रणनीतियाँ

नीति केवल सैन्य या कानूनी बल पर निर्भर नहीं है, बल्कि 'नर्म शक्ति' और सामुदायिक भागीदारी पर भी जोर देती है:

  • कट्टरपंथ विरोधी प्रयास: युवाओं को गुमराह होने से बचाने के लिए उदारवादी धार्मिक नेताओं और नागरिक समाज (NGOs) को जोड़ना।
  • पारिस्थितिकी तंत्र का विनाश: आतंकवादियों के वित्तपोषण, सुरक्षित पनाहगाहों और रसद आपूर्ति करने वाले नेटवर्क को पूरी तरह ध्वस्त करना।
  • स्थानीय संगठनों और रसद का गठजोड़: नीति में उल्लेख है कि विदेशी आतंकी संगठन (जैसे अल-कायदा, IS) अब स्थानीय अपराधियों और स्लीपर सेल्स के 'लॉजिस्टिक्स' और 'भौगोलिक ज्ञान' का उपयोग कर रहे हैं। इसे तोड़ने के लिए 'इंटेलिजेंस शेयरिंग' को अनिवार्य बनाया गया है।

भारत और आतंकवाद: नवीनतम वैश्विक एवं राष्ट्रीय रिपोर्ट्स (2025-26)

  • ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स (GTI) 2026
  • जारीकर्ता: इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस (IEP)
  • वैश्विक स्थिति: आतंकवाद से होने वाली मौतों में 28% की कमी दर्ज।
  • भारत: रैंकिंग में सुधार, किंतु 'मध्यम से उच्च' प्रभाव वाली श्रेणी में बरकरार; सीमावर्ती क्षेत्रों में ड्रोन तकनीक का दुरुपयोग मुख्य चिंता।
  • पड़ोस: पाकिस्तान वर्ष 2025-26 में सर्वाधिक प्रभावित देश, जिसका सीधा असर भारत की सुरक्षा पर।
  • गृह मंत्रालय (MHA) 'इयर एंड रिव्यू 2025'
  • NIA की उपलब्धि: 95% दोषसिद्धि दर, जो वैश्विक स्तर पर सर्वोच्च है।
  • लक्ष्य: 31 मार्च 2026 तक भारत को 'नक्सलवाद मुक्त' बनाने का संकल्प।
  • नई पहल: अपराध और आतंकवाद की सांठगांठ तोड़ने हेतु दिल्ली में 'मल्टी-एजेंसी सेंटर' के नए मुख्यालय का संचालन।
  • FATF 'म्युचुअल इवैल्यूएशन' रिपोर्ट
  • निष्कर्ष: भारत को 'हाई लेवल ऑफ कम्प्लायंस' (उच्च अनुपालन) श्रेणी में स्थान।
  • प्रहार नीति का जुड़ाव: क्रिप्टो वॉलेट और एन्क्रिप्टेड ऐप्स पर नीतिगत ध्यान FATF की सिफारिशों के पूर्णतः अनुरूप।
  • UNSC 'टेररिज्म थ्रेट असेसमेंट' 2025
  • चेतावनी: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की विश्लेषण रिपोर्ट (जैसे S/2025/482) ने संकेत दिया है कि अल-कायदा और ISIL (K) दक्षिण एशिया में अपनी सक्रियता बढ़ा रहे हैं। वे स्थानीय शिकायतों का फायदा उठाकर 'लोन वुल्फ' (अकेले हमलावर) और 'स्लीपर सेल्स' को सक्रिय करने की कोशिश कर रहे हैं।

विश्लेषण:

  • एकीकृत ढांचा: 'प्रहार' नीति भारत के सुरक्षा ढांचे को 'साइलो' से निकालकर एक सूत्र में पिरोती है। अब जांच में पहले दिन से ही कानूनी विशेषज्ञों की भागीदारी होगी, जिससे दोषियों की सजा दर बढ़ेगी।
  • सॉफ्ट पावर और समुदाय: नीति केवल बल प्रयोग की बात नहीं करती, बल्कि यह 'कट्टरपंथ विरोधी जागरूकता' के लिए धार्मिक नेताओं और NGOs की भूमिका को भी महत्वपूर्ण मानती है।
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग: यह 'सीमा पार आतंकवाद' के विरुद्ध वैश्विक और क्षेत्रीय सहयोग पर बल देती है।

भविष्य की राह

  • राज्यों का समन्वय: संविधान के अनुसार 'पुलिस' राज्य का विषय है, अतः इस नीति को जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है।
  • तकनीकी अपग्रेडेशन: एजेंसियों को AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) और बिग डेटा एनालिटिक्स से लैस करना होगा ताकि साइबर-आतंकवाद को होने से पहले ही रोका जा सके।
  • विधिक सुधार: UAPA जैसे कानूनों और 'प्रहार' नीति के बीच सामंजस्य स्थापित करना होगा ताकि मानवाधिकारों का सम्मान करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित हो।

निष्कर्ष

'प्रहार' नीति केवल एक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि 21वीं सदी के 'अदृश्य और डिजिटल युद्ध' के विरुद्ध भारत का संकल्प है। यह आतंकवाद के वित्तपोषण से लेकर उसके वैचारिक प्रचार तक, हर कड़ी को तोड़ने की एक व्यापक रणनीति है। जैसा कि गृह मंत्री ने संकेत दिया है, भारत अब केवल हमलों का जवाब ही नहीं देगा, बल्कि आतंकवाद के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को जड़ से उखाड़ने के लिए प्रतिबद्ध है।

सामान्य अध्ययन पेपर –III:  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन

संदर्भ

भारत की ऊर्जा सुरक्षा वर्तमान में जीवाश्म ईंधन और उर्वरक कच्चे माल (नेचुरल गैस & ग्रे अमोनिया) के भारी आयात पर टिकी है, जो वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता और मुद्रा जोखिमों के प्रति संवेदनशील है। कार्बन उत्सर्जन को कम करने और 'नेट जीरो 2070' के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, पारंपरिक अमोनिया के विकल्प के रूप में 'ग्रीन अमोनिया' का स्वदेशी उत्पादन केवल पर्यावरणीय आवश्यकता है, बल्कि आर्थिक स्वतंत्रता के लिए भी अनिवार्य है।

ग्रीन अमोनिया:

यह ग्रीन हाइड्रोजन (जल इलेक्ट्रोलिसिस द्वारा) और नाइट्रोजन को 'हैबर-बॉश' प्रक्रिया के माध्यम से मिलाकर बनाया जाता है, जिसमें शत-प्रतिशत नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग होता है।

  • भंडारण एवं परिवहन: शुद्ध हाइड्रोजन की तुलना में अमोनिया का घनत्व अधिक होता है, जिससे इसे तरल अवस्था में स्टोर करना और मौजूदा जहाजों/टैंकरों के माध्यम से लंबी दूरी तक ले जाना अधिक किफायती है।
  • शून्य कार्बन फुटप्रिंट: इसके उत्पादन चक्र में CO2 का उत्सर्जन शून्य होता है, जो इसे 'ग्रे अमोनिया' (प्राकृतिक गैस से निर्मित) का सबसे स्वच्छ विकल्प बनाता है।
  • बहुमुखी उपयोग: यह उर्वरक निर्माण (यूरिया/DAP) के अलावा 'ग्रीन शिपिंग' के लिए ईंधन और ग्रिड-स्केल ऊर्जा भंडारण के रूप में क्रांतिकारी भूमिका निभा सकता है।

चर्चा में क्यों?

  • इंडिया एनर्जी वीक (IEW) 2026: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनवरी 2026 के उद्घाटन सत्र में भारत को वैश्विक ऊर्जा निवेश का केंद्र घोषित करते हुए $500 बिलियन के अवसरों को रेखांकित किया।
  • SECI की ऐतिहासिक नीलामी: भारतीय सौर ऊर्जा निगम (SECI) ने SIGHT कार्यक्रम के तहत 13 उर्वरक संयंत्रों के लिए 7.24 लाख टन वार्षिक ग्रीन अमोनिया की खरीद प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी की।
  • नया वैश्विक रिकॉर्ड: अगस्त 2025 में संपन्न हुए इन टेंडर्स में भारत ने ₹49.75 से ₹64.74 प्रति किलोग्राम की दर प्राप्त की है, जो यूरोपीय संघ की कीमतों से लगभग 40-50% सस्ती है।
  • सब्सिडी और अनुबंध: सफल बोलीदाताओं को 10-वर्षीय फिक्स्ड-प्राइस ऑफटेक समझौते दिए गए हैं, जिनमें पहले तीन वर्षों के लिए ₹8.82/kg तक की उत्पादन सब्सिडी शामिल है।

महत्वपूर्ण प्रभाव एवं आवश्यकता

  • आयात प्रतिस्थापन: यह पहल भारत के कुल अमोनिया आयात के लगभग 30% हिस्से को घरेलू हरित उत्पादन से बदल देगी, जिससे विदेशी मुद्रा की भारी बचत होगी।
  • मूल्य स्थिरता: दीर्घकालिक निश्चित-मूल्य अनुबंधों के कारण, भारतीय किसानों और उर्वरक कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय गैस बाजार की अस्थिरता से सुरक्षा मिलेगी।
  • तटीय रसद: वितरण बिंदुओं को तटीय संयंत्रों के पास पहचानकर परिवहन लागत को न्यूनतम किया गया है।

विश्लेषण

भारत का यह मॉडल 'मांग एकत्रीकरण' की शक्ति को दर्शाता है। जहाँ विकसित देश अभी भी उच्च लागत से जूझ रहे हैं, भारत ने बुनियादी ढांचे और पारदर्शी नीति के माध्यम से लागत को ग्रे अमोनिया ($515/टन) के प्रतिस्पर्धी स्तर पर ला खड़ा किया है। यह 'इकोनॉमी ऑफ स्केल' का सटीक उदाहरण है, जो भारत को वैश्विक स्तर पर ग्रीन अमोनिया का 'सप्लाई हब' बनाने की क्षमता रखता है।

आगे की राह

  • तकनीकी एकीकरण: सतत उत्पादन के लिए राउंड--क्लॉक (RTC) नवीकरणीय ऊर्जा और हाइब्रिड स्टोरेज सिस्टम को बढ़ावा देना।
  • नीतिगत सामंजस्य: ग्रिड एक्सेस और बैंकिंग शुल्क पर राज्यों के बीच एक समान नीति बनाना और अंतरराष्ट्रीय प्रमाणन मानकों के साथ तालमेल बिठाना।
  • वित्त पोषण: दीर्घकालिक निवेश आकर्षित करने के लिए 'रिस्क-मिटिगेशन इंस्ट्रूमेंट्स' और मिश्रित वित्त का प्रभावी उपयोग करना।

निष्कर्ष

ग्रीन अमोनिया की यह सफल पहल भारत की ऊर्जा यात्रा में एक 'पैराडाइम शिफ्ट' है। रणनीतिक नीति और बाजार-आधारित नीलामी के माध्यम से, भारत ने ऊर्जा सुरक्षा से ऊर्जा स्वतंत्रता की ओर एक ठोस कदम बढ़ाया है। यह केवल भारतीय कृषि को मजबूती प्रदान करेगा, बल्कि जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध वैश्विक लड़ाई में भारत के नेतृत्व को भी प्रमाणित करेगा।

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन


संदर्भ

हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित 'एआई इम्पैक्ट समिट' भारत के तकनीकी भविष्य के लिए एक 'वाटरशेड मोमेंट' (निर्णायक मोड़) सिद्ध हुआ है। भारत, जो वर्तमान में अमेरिका के बाहर विश्व का सबसे बड़ा एआई उपयोगकर्ता आधार है, अब केवल एक 'उपभोक्ता' की भूमिका से निकलकर इस तकनीक के 'अधिष्ठाता' बनने की ओर अग्रसर है। 89 देशों द्वारा हस्ताक्षरित घोषणापत्र ने 'एआई के लोकतंत्रीकरण' की दिशा में एक वैश्विक विमर्श तो छेड़ा है, किंतु भारत के लिए यह यात्रा चुनौतियों और रणनीतिक अंतर्विरोधों से भरी है।

ढांचागत चुनौतियां और 'पूंजीगत परावलंबन'

एआई के इस नए युग में भारत की सबसे बड़ी चुनौती 'पूंजी और बुनियादी ढांचे' का स्वदेशीकरण है।

  • हार्डवेयर की बाधा: वर्तमान में एआई को शक्ति देने वाले ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट (GPU) और आवश्यक सर्वर तकनीक विदेशी संस्थाओं के नियंत्रण में हैं। इन उपकरणों की अत्यधिक लागत घरेलू स्तर पर एआई के प्रसार को आर्थिक रूप से बोझिल बनाती है।
  • ऊर्जा एवं डेटा केंद्र: भारत में डेटा केंद्रों का विस्तार तो हो रहा है, लेकिन एआई के लिए आवश्यक विशाल विद्युत क्षमता और शीतलन प्रणालियों का निर्माण एक जटिल कार्य है, जो सतत विकास के लक्ष्यों को भी प्रभावित कर सकता है।

'ITES' से 'AI' की ओर: आर्थिक प्रतिमान में बदलाव

भारत के पास सूचना प्रौद्योगिकी (IT) क्षेत्र में दशकों का अनुभव है, लेकिन एआई का अर्थशास्त्र भिन्न है:

  • श्रम बनाम एल्गोरिदम: आईटीईएस (ITES) युग में भारत को 'सस्ते और कुशल श्रम' का लाभ मिला था। एआई के दौर में, जहाँ मानवीय हस्तक्षेप कम हो रहा है, भारत को केवल 'मॉडल प्रविस्तारण' का हब बनने के बजाय 'मॉडल प्रशिक्षण' और 'फाइन-ट्यूनिंग' पर ध्यान केंद्रित करना होगा। यदि हम केवल विदेशी मॉडलों के उपयोगकर्ता बने रहे, तो हमारे आर्थिक लाभ सीमित रह जाएंगे।

वैश्विक शासन और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की भूमिका पर पुनर्विचार की आवश्यकता है:

  • नियामक निष्क्रियता का जोखिम: भारत ने एआई के प्रति अमेरिका की 'हस्तक्षेप करने' वाली नीति का समर्थन किया है। यह चिंताजनक है, क्योंकि एआई में सामाजिक और आर्थिक व्यवस्थाओं को छिन्न-भिन्न करने की असीम क्षमता है।
  • ग्लोबल साउथ का नेतृत्व: 'ग्रेट पावर राइवलरी' (महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता) के इस दौर में, भारत को उन विकासशील देशों का नेतृत्व करना चाहिए जो तकनीकी उपनिवेशवाद के प्रति संवेदनशील हैं। भारत को 'सहमति' से अधिक 'सुरक्षा मानकों' और 'नैतिक एआई' के प्रवर्तन पर बल देना चाहिए।

'इनफ्रेंस गैप' और डिजिटल समावेशिता

भारत की प्रगति तब तक अधूरी है जब तक देश की 'डिजिटल खाई' पूरी तरह से भर नहीं जाती।

  • लोकतांत्रिक पहुंच: एआई का लाभ समाज के अंतिम छोर तक पहुँचाने के लिए 'इनफ्रेंस गैप' (तकनीकी निष्कर्षों की समझ और पहुंच का अंतर) को समाप्त करना अनिवार्य है। तकनीक का लोकतंत्रीकरण ही यह सुनिश्चित करेगा कि एआई केवल एक 'एलिट' (विशिष्ट वर्ग) उपकरण बनकर रह जाए।

निष्कर्ष एवं नीतिगत सुझाव

भारत एआई के क्षेत्र में एक 'ऑप्टिमिस्टिक' (आशावादी) लेकिन 'प्रूडेंट' (विवेकपूर्ण) मार्ग अपनाकर विश्व को नई दिशा दे सकता है। हमें 'एआई फॉर ऑल' के नारे को यथार्थ में बदलने के लिए स्वदेशी चिप निर्माण, डेटा संप्रभुता और कठोर विनियामक ढांचे आवश्यकता है। शिखर सम्मेलन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत में वैश्विक विकास को आकार देने की क्षमता है, बशर्ते वह अपने रणनीतिक हितों के साथ समझौता करे।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।

संदर्भ

हाल के वर्षों में भारत में किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति एक जटिल जन-स्वास्थ्य चुनौती के रूप में उभरी है। गाजियाबाद जैसी दुखद घटनाएँ और आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के चिंताजनक आँकड़े स्पष्ट करते हैं कि हमारे पारंपरिक सुरक्षा तंत्र आधुनिक डिजिटल और शैक्षणिक दबावों का सामना करने में विफल रहे हैं। पुरानी समस्याओं के समाधान और भविष्य की पीढ़ी को बचाने के लिए अब केवल क्लिनिकल उपचार नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक-नीतिगत प्रहार की अनिवार्य आवश्यकता है।

किशोर मानसिक स्वास्थ्य:

किशोर मानसिक स्वास्थ्य से तात्पर्य 10 से 19 वर्ष की आयु के बीच के व्यक्तियों के मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक और सामाजिक कल्याण से है। यह वह संक्रांति काल है जहाँ मस्तिष्क में अत्यधिक 'न्यूरोप्लास्टिसिटी' (परिवर्तनशीलता) होती है। वर्तमान में यह स्वास्थ्य केवल व्यक्तिगत विकार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सह-रुग्णता जैसे  ध्यान अभाव अतिसक्रियता विकार (ADHD), इंटरनेट एडिक्शन और अवसाद का एक घातक मिश्रण देखा जा रहा है।

चर्चा के प्रमुख कारण

  • गाजियाबाद त्रासदी: हाल ही में उत्तर प्रदेश में तीन किशोरियों की मृत्यु ने किशोरों की भावनात्मक संवेदनशीलता पर राष्ट्रीय बहस छेड़ दी है।
  • आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26: भारत सरकार के इस आधिकारिक दस्तावेज़ में पहली बार युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को आर्थिक उत्पादकता से जोड़ते हुए एक 'प्रमुख जोखिम' माना गया है।
  • विनियामक कदम: ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया की तर्ज पर भारत के कई राज्यों द्वारा किशोरों के लिए 'सोशल मीडिया आयु सीमा' निर्धारित करने पर विचार करना।
  • डिजिटल पैठ: भारत में 80 करोड़ इंटरनेट उपयोगकर्ताओं में से बच्चों की बढ़ती संख्या और उनके द्वारा 'अनियंत्रित कंटेंट' का उपभोग।

समस्या का बदलता स्वरूप और सह-रुग्णता

मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियाँ अब केवल वयस्कों तक सीमित नहीं हैं। नैदानिक साक्ष्यों के अनुसार:

  • प्रारंभिक लक्षण: भावनात्मक और व्यवहार संबंधी विकार अब 4 से 5 वर्ष की अल्पायु में भी देखे जा रहे हैं।
  • जटिलता: वर्तमान में 'सह-रुग्णता' की प्रवृत्ति बढ़ी है। उदाहरण के तौर पर, ADHD (ध्यान अभाव अतिसक्रियता विकार) के साथ चिंता, और अवसाद, के साथ 'बाध्यकारी डिजिटल उपयोग' का एक साथ पाया जाना।
  • दीर्घकालिक प्रभाव: बचपन का अनसुलझा आघात या दीर्घकालिक तनाव किशोरावस्था में अधिक तीव्रता के साथ पुनः उभरता है, जो व्यक्ति के संज्ञानात्मक विकास को बाधित करता है।

संकट की व्यापकता: आँकड़े और चुनौतियाँ

  • सांख्यिकीय विश्लेषण: राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, भारत के 7% से 10% किशोर निदान योग्य मानसिक स्थितियों से ग्रसित हैं। वहीं, 5% से 7% स्कूली बच्चों में ADHD के लक्षण मौजूद हैं।
  • संसाधनों का अभाव: 1.4 अरब की आबादी वाले देश में 10,000 से भी कम मनोचिकित्सक हैं। बाल मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की संख्या तो और भी कम है।
  • डिजिटल अतिरेक: भारत में 80 करोड़ से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं। COVID-19 के पश्चात शिक्षा और मनोरंजन के बीच की सीमाएँ धुंधली होने से 'इंटरनेट की लतएक सामान्य नैदानिक समस्या बन गई है।

विनियामक परिदृश्य और वैश्विक प्रेरणा

भारत के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में युवाओं के बीच बढ़ती मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियों को आधिकारिक रूप से स्वीकार किया गया है।

  • वैश्विक उदाहरण: ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस और दक्षिण कोरिया जैसे देशों की तर्ज पर भारत के कई राज्य किशोरों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग को सीमित करने हेतु विनियामक ढांचा तैयार करने पर विचार कर रहे हैं।
  • WHO के दिशा-निर्देश: वर्ष 2019 में ही विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अत्यधिक 'स्क्रीन एक्सपोजर' के विरुद्ध चेतावनी दी थी, क्योंकि यह नींद, ध्यान और भावनात्मक नियमन को सीधे प्रभावित करता है।

स्कूल एवं परिवार: सुरक्षा कवच या कमजोर कड़ी?

  • स्कूल: वर्तमान में शैक्षणिक संस्थान 'कमजोर कड़ी' सिद्ध हो रहे हैं। यहाँ 'रैंकिंग और प्रतिस्पर्धा' की संस्कृति भावनात्मक कल्याण पर हावी है। मानसिक स्वास्थ्य को शिक्षा की नींव के रूप में नहीं, बल्कि एक अतिरिक्त विषय के रूप में देखा जाता है।
  • परिवार: माता-पिता बच्चे के लिए 'प्रथम मनोवैज्ञानिक सुरक्षा कवच' होते हैं। 'ट्रॉमा-सेंसिटिव पैरेंटिंग' के माध्यम से शुरुआती व्यवहार परिवर्तनों को पहचानना अनिवार्य है।

विश्लेषण

किशोर मानसिक स्वास्थ्य का संकट भारत की 'जनसांख्यिकीय लाभांश' के लिए सबसे बड़ा खतरा है। यदि कार्यबल में प्रवेश करने वाली युवा पीढ़ी मानसिक रूप से अस्वस्थ होगी, तो देश की उत्पादकता और सामाजिक स्थिरता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। विश्लेषण दर्शाता है कि यह समस्या केवल 'जैविक' नहीं है, बल्कि 'सामाजिक-तकनीकी' है। तकनीक ने जहाँ अवसर दिए हैं, वहीं मानवीय संपर्क को विस्थापित कर दिया है, जो स्वस्थ मस्तिष्क विकास के लिए अनिवार्य है।

भविष्य की राह: रणनीतिक सिफारिशें

इस संकट के समाधान हेतु निम्नलिखित बहु-आयामी दृष्टिकोण आवश्यक हैं:

  • नीतिगत एकीकरण: आयुष्मान भारत और राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत स्कूलों में अनिवार्य 'मेंटल हेल्थ स्क्रीनिंग' और शिक्षकों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम लागू करना।
  • डिजिटल हाइजीन गाइडलाइन्स: स्कूलों और घरों के लिए डिजिटल उपयोग के स्पष्ट और वैज्ञानिक दिशा-निर्देश जारी करना।
  • सामुदायिक दृष्टिकोण: व्यक्तिगत उपचार के स्थान पर 'कम्युनिटी-आधारित काउंसलिंग' को बढ़ावा देना, जो क्लिनिक-केंद्रित हस्तक्षेपों से अधिक प्रभावी है।
  • ट्रॉमा-इंफॉर्म्ड पैरेंटिंग: अभिभावकों को केवल देखभालकर्ता नहीं, बल्कि 'मानसिक सुरक्षा कवच' के रूप में प्रशिक्षित करना।
  • सामुदायिक सहायता समूह: 'पीयर-सपोर्ट' और 'पेरेंट-सपोर्ट' समूहों को बढ़ावा देना ताकि अलगाव को कम किया जा सके।

निष्कर्ष

किशोर मानसिक स्वास्थ्य पर निवेश करना केवल एक स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकता नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का अनिवार्य तत्व है। हमें सफलता के पैमानों को 'प्रतिस्पर्धा' से बदलकर 'लचीलापन और कल्याण' की ओर ले जाना होगा। गाजियाबाद जैसी घटनाएँ एक चेतावनी हैं कि यदि हमने अभी अपने बच्चों के 'मौन संकट' को नहीं सुना, तो इसके सामाजिक और आर्थिक परिणाम भविष्य में कहीं अधिक विनाशकारी होंगे।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।

संदर्भ

हाल ही में ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला डा सिल्वा की भारत यात्रा ने केवल द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊर्जा दी है, बल्कि 'ग्लोबल साउथ' की एकजुटता का एक सशक्त संदेश भी प्रसारित किया है। नई दिल्ली में आयोजित 'एआई इम्पैक्ट समिट' में उनकी भागीदारी और उसके पश्चात आधिकारिक राजकीय यात्रा, वैश्विक शासन में भारत और ब्राजील की बढ़ती भूमिका को रेखांकित करती है।

चर्चा में क्यों?

  • व्यापारिक लक्ष्य: दोनों देशों ने वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना कर 30 अरब डॉलर करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है।
  • रणनीतिक समझौते: चीन पर निर्भर आपूर्ति श्रृंखलाओं को विविधता प्रदान करने हेतु क्रिटिकल मिनरल्स (महत्वपूर्ण खनिज), स्टील माइनिंग और डिजिटल सहयोग पर महत्वपूर्ण हस्ताक्षर किए गए हैं।
  • राजनैतिक संदर्भ: राष्ट्रपति लूला की यह यात्रा ऐसे समय में हुई है जब वे इस वर्ष के अंत में घरेलू चुनावों का सामना करेंगे, जो आगामी ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में उनकी उपस्थिति को अनिश्चित बना सकता है।

अमेरिकी टैरिफ और न्यायिक मोड़: एक वैश्विक परिप्रेक्ष्य

भारत और ब्राजील दोनों ही वर्तमान में अमेरिका की कठोर व्यापार नीतियों के केंद्र में हैं:

  • पारस्परिक शुल्क: डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा दोनों देशों पर 50% तक के भारी टैरिफ लगाए गए थे।
  • न्यायिक हस्तक्षेप: अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति ट्रंप के इन शुल्कों के तर्कों को अमान्य कर देना एक महत्वपूर्ण मोड़ है। इसने दोनों देशों को अपनी व्यापार वार्ताओं को पुनर्गठित करने का एक सुनहरा अवसर प्रदान किया है।
  • दबाव के बिंदु: दोनों देशों को रूस से तेल आयात, ईरान के साथ व्यापार और ब्रिक्स (BRICS) के साथ बढ़ती निकटता के कारण अतिरिक्त अमेरिकी प्रतिबंधों और शुल्कों की निरंतर धमकियों का सामना करना पड़ रहा है।

रणनीतिक समूहों में सहभागिता और चुनौतियां

भारत और ब्राजील केवल द्विपक्षीय भागीदार नहीं, बल्कि कई वैश्विक मंचों पर एक साथ खड़े हैं:

  • BRICS एवं IBSA: विकासशील देशों की आवाज को बुलंद करने वाले इन समूहों में दोनों की भूमिका निर्णायक है।
  • G-4 (UNSC सुधार): जर्मनी और दक्षिण अफ्रीका के साथ मिलकर दोनों देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए प्रयासरत हैं।
  • जैव ईंधन गठबंधन: वैकल्पिक ऊर्जा के क्षेत्र में दोनों देश सह-संस्थापक हैं।
  • साझा चुनौतियां: व्यापार, क्षेत्रीय संप्रभुता और बहुपक्षवाद पर अमेरिका की 'जीवाश्म ईंधन' और 'एकतरफावाद' (बहुपक्षवाद बनाम अमेरिका फर्स्ट) की नीतियों ने इन सभी समूहों के लिए बाधाएं उत्पन्न की हैं।

विश्लेषण: "छड़ियों का गट्ठर" और संघीकरण

राष्ट्रपति लूला, जो स्वयं एक पूर्व ट्रेड यूनियन नेता रहे हैं, ने भू-राजनीतिक अनिश्चितता से निपटने के लिए एक अत्यंत प्रभावशाली रूपक प्रस्तुत किया है:

"एक अकेली छड़ी को तोड़ना आसान है, लेकिन यदि उन्हें कसकर एक साथ बांध दिया जाए, तो उन्हें तोड़ना कठिन हो जाता है।"

उनका तर्क है कि वाशिंगटन (अमेरिका) के साथ व्यक्तिगत रूप से अलग-अलग सौदे करने के बजाय, विकासशील देशों को "संघबद्ध" होकर सामूहिक रूप से मोलभाव करना चाहिए। अलग-अलग बातचीत करने से छोटे और विकासशील राष्ट्र अक्सर नुकसानदेह स्थिति में रह जाते हैं।

आगे की राह

  • समन्वित कूटनीति: भारत और ब्राजील को अमेरिकी अदालत के फैसले का लाभ उठाते हुए अपने अगले कदमों का समन्वय करना चाहिए।
  • बैठकों का पुनर्गठन: भारत द्वारा इस सप्ताह व्यापार वार्ताकारों की बैठक स्थगित करना एक रणनीतिक कदम है, ताकि नए न्यायिक परिदृश्य का गहन आकलन किया जा सके।
  • आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण: चीन और अमेरिका दोनों पर निर्भरता कम करने के लिए आपसी व्यापारिक सहयोग को और अधिक ठोस बनाना होगा।

निष्कर्ष

भारत और ब्राजील का साझा भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि वे वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच कितने 'एकजुट' रहते हैं। राष्ट्रपति लूला की यात्रा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि 'ग्लोबल साउथ' की ये दो शक्तियां अब केवल प्रतिक्रियाशील नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था को सक्रिय रूप से आकार देने वाली भूमिका में हैं। बहुपक्षीय व्यवस्था की रक्षा के लिए उनका 'एक साथ बंधे रहना' अनिवार्य है।