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उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026: पृष्ठभूमि, महत्व और संसदीय गतिरोध

सामान्य अध्ययन पेपर – II:  शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।


संदर्भ

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(1) के अंतर्गत संसद को कानून बनाकर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या निर्धारित करने का अधिकार प्राप्त है। संविधान के मूल अनुच्छेद में भारत के मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त अधिकतम 7 न्यायाधीशों का प्रावधान था। बढ़ते कार्यभार को देखते हुए संसद ने उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 के माध्यम से यह संख्या बढ़ाकर 10 कर दी। इसके बाद समय-समय पर न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि की गई। इसी क्रम में, बढ़ते न्यायिक कार्यभार और लंबित मामलों को देखते हुए मई 2026 में एक अध्यादेश के माध्यम से न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या में वृद्धि की गई, जिसे विधायी रूप देने के लिए उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 प्रस्तुत किया गया।

उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 क्या है?

यह विधेयक 'उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956' की धारा 2 में संशोधन का प्रस्ताव करता है।

  • अधिनियम का मुख्य उद्देश्य: यह विधेयक 'उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026 (2026 का अध्यादेश 1)' को प्रतिस्थापित करता है।
  • संख्यात्मक परिवर्तन: इसके माध्यम से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को छोड़कर, उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या को 33 से बढ़ाकर 37 करने का प्रावधान है।
  • कुल क्षमता: मुख्य न्यायाधीश (1) सहित उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की कुल स्वीकृत क्षमता अब 34 से बढ़कर 38 हो जाएगी।
  • कार्यान्वयन तिथि: विधेयक के प्रावधान 16 मई, 2026 से प्रभावी माने जाएंगे।

हालिया चर्चा के कारण

  • बिना चर्चा के पारित होना: विपक्षी सदस्यों के इस तीव्र विरोध और हंगामे के बीच लोक सभा ने सोमवार को बिना किसी विस्तृत चर्चा के इस संशोधन विधेयक को पारित कर दिया।

  • अध्यादेश का स्थान लेना: यह विधेयक पूर्व में जारी उस अध्यादेश को प्रतिस्थापित करता है, जिसके द्वारा उच्चतम न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या को बढ़ा दिया गया था।
  • न्यायाधीशों की संख्या में बदलाव: इसके माध्यम से भारत के मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त न्यायाधीशों की संख्या को 33 से बढ़ाकर 37 (मुख्य न्यायाधीश सहित कुल स्वीकृत क्षमता 38) करने के विधायी प्रावधान को स्वीकृति दी गई।

विधेयक का महत्व एवं प्रभाव

  • लंबित मामलों का तेजी से निपटारा: 1 जनवरी, 2026 तक उच्चतम न्यायालय में लंबित मामलों की संख्या घटकर या बढ़कर 92,101 हो गई थी। 2025 में 75,410 नए मामले दर्ज हुए, जबकि केवल 65,615 मामलों का निपटारा हो सका। न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने से इस 'पेंडेंसी गैप' को कम किया जा सकेगा।

  • संविधान पीठों का नियमित गठन: न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के लिए गंभीर संवैधानिक व्याख्या और विधि के सारवान प्रश्नों वाले जटिल मामलों की सुनवाई हेतु नियमित संविधान पीठों का गठन करना आसान हो जाएगा।
  • अपीलीय बनाम संवैधानिक कार्यप्रणाली में संतुलन: न्यायालय को अपीलीय मामलों के साथ-साथ महत्वपूर्ण जनहित याचिकाओं और संवैधानिक मुद्दों पर समानांतर रूप से कार्य करने की क्षमता मिलेगी।

विश्लेषण

न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या बढ़ाना लंबित मुकदमों के बोझ से दब रही न्यायपालिका के लिए एक अति-आवश्यक संरचनात्मक कदम है। हालाँकि, केवल न्यायाधीशों की संख्या बढ़ा देना ही काफी नहीं है; जब तक न्यायिक प्रक्रियाओं का सरलीकरण और अधोसंरचना का आधुनिकीकरण नहीं होता, तब तक वास्तविक त्वरित न्याय की अवधारणा अधूरी रहेगी।

आगे की राह

  • समयबद्ध नियुक्तियाँ: केवल स्वीकृत क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं है; कॉलेजियम और कार्यपालिका द्वारा रिक्तियों को बिना किसी विलंब के समय पर भरा जाना सुनिश्चित होना चाहिए।

  • प्रौद्योगिकी का एकीकरण: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और केस मैनेजमेंट सिस्टम के माध्यम से मामलों की लिस्टिंग और केस-मैपिंग प्रक्रिया को अधिक कुशल बनाया जाए।
  • राष्ट्रीय न्यायिक अवसंरचना: उच्चतम न्यायालय के साथ-साथ देश की निचली अदालतों में भी बुनियादी ढांचे और सहायक कर्मचारियों का सुदृढ़ीकरण किया जाए ताकि मामले अंतिम चरण तक तेजी से पहुँच सकें।

निष्कर्ष

उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 भारतीय न्यायिक प्रणाली में सुधार की दिशा में एक सामयिक और व्यावहारिक कदम है। यद्यपि संसदीय हंगामे के बीच बिना व्यापक बहस के इसे पारित होना चर्चा का विषय रहा, किंतु न्यायिक दृष्टिकोण से यह कदम मामलों के त्वरित निस्तारण, संविधान पीठों के नियमित संचालन और आम नागरिकों को न्याय तक सुलभ पहुँच प्रदान करने में मील का पत्थर साबित होगा।




भारत की मुक्त व्यापार समझौता (FTA) रणनीति: बढ़ता व्यापार घाटा, आर्थिक चुनौतियाँ एवं भविष्य की राह

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।


संदर्भ

हाल ही में ब्रसेल्स में भारत-यूरोपीय संघ (EU) मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की उच्चस्तरीय बैठक संपन्न हुई, जिसमें भारत के केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार अजय कुमार सूद ने भाग लिया। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अपने आर्थिक और सामरिक हितों को साधने तथा बाजार तक पहुँच बढ़ाने के लिए द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौतों का तेजी से विस्तार किया है। हालाँकि, इन समझौतों से निर्यात में वृद्धि होने के पारंपरिक आख्यानों के बीच बढ़ता व्यापार घाटा एक गंभीर विश्लेषणात्मक प्रश्न खड़ा करता है।

भारत का एफटीए (FTA) परिदृश्य: हालिया समझौते एवं जारी वार्ताएँ

भारत ने वैश्विक मूल्य श्रृंखला (GVC) में एकीकरण और औद्योगिक गतिशीलता के उद्देश्य से द्विपक्षीयता की ओर निर्णायक कदम बढ़ाया है:

  • हाल ही में संपन्न समझौते: संयुक्त अरब अमीरात (UAE), ऑस्ट्रेलिया, ओमान, यूनाइटेड किंगडम (UK), यूरोपीय संघ (EU) और न्यूजीलैंड के साथ एफटीए।
  • जारी व्यापार वार्ताएँ: संयुक्त राज्य अमेरिका (US), खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) देश और कनाडा के साथ जारी द्विपक्षीय वार्ताएँ।
  • रणनीतिक उद्देश्य: अधिक बाजार पहुँच प्राप्त करना, विदेशी निवेश आकर्षित करना और वैश्विक कूटनीति में भारत के प्रभाव को मजबूत करना।

हालिया चर्चा में क्यों?

  • भारत-ईयू एफटीए बैठक: ब्रसेल्स में आयोजित उच्चस्तरीय वार्ता और नए मुक्त व्यापार समझौतों के प्रति भारत का बढ़ता रुझान।

  • एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के साथ बढ़ता व्यापार घाटा: आसियान (ASEAN), दक्षिण कोरिया, जापान और सिंगापुर के साथ समझौतों के बावजूद भारत के आयात में निर्यात की तुलना में अत्यधिक वृद्धि।
  • पारंपरिक व्यापार अवधारणाओं पर सवाल: यह धारणा कि "एफटीए हमेशा निर्यात और प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ावा देते हैं", अब आंकड़ों के धरातल पर संदेह के घेरे में है।

एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के साथ भारत का अनुभव:

भारत की 'ईस्ट एक्ट' नीति और एशियाई देशों के साथ हुए एफटीए का परिणाम भारत के पक्ष में अपेक्षा के अनुकूल नहीं रहा है। व्यापार का रुझान पूरी तरह से आयात-संचालित हो गया है:

  • आसियान (ASEAN) के साथ व्यापार घाटा: वर्ष 2012 में आसियान के साथ भारत का व्यापार घाटा 10.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर था, जो वर्ष 2025 में तेजी से बढ़कर 51.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया।
  • जापान और दक्षिण कोरिया: दोनों प्रमुख देशों के साथ व्यापार समझौते के बाद भारत के निर्यात की तुलना में आयात की दर बहुत तेज रही है।
  • सिंगापुर का मामला: सिंगापुर के साथ समझौता करने के बाद भारत का पूर्ववर्ती 'व्यापार अधिशेष' अब 'व्यापार घाटे' में बदल चुका है, जो भारत की कमजोर होती निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को दर्शाता है।

एफटीए रणनीति से जुड़े मुख्य मुद्दे एवं विश्लेषणात्मक चुनौतियाँ

  • विश्लेषणात्मक चुप्पी: यह मान लेना कि एफटीए स्वतः ही वैश्विक मूल्य श्रृंखला (GVC) में एकीकरण और निर्यात वृद्धि लाएगा, एक भ्रामक तर्क साबित हो रहा है।

  • गैर-टैरिफ बाधाएं (NTBs): भारतीय निर्यातकों को साथी देशों में कड़े गुणवत्ता मानकों और गैर-टैरिफ बाधाओं का सामना करना पड़ता है, जबकि भारतीय बाजार आसानी से उनके आयात के लिए खुल जाते हैं।
  • घरेलू विनिर्माण की कमजोरी: भारतीय विनिर्माण क्षेत्र की उच्च लागत (लॉजिस्टिक्स, बिजली, और भूमि) के कारण भारतीय उत्पाद विदेशी प्रतिस्पर्धियों की तुलना में महंगे साबित होते हैं।
  • कच्चे माल का आयात बनाम मूल्य वर्धन: एफटीए के तहत भारत मुख्यतः सस्ते निर्मित उत्पादों का आयात कर रहा है, जबकि उच्च मूल्य-वर्धित वस्तुओं का निर्यात कम हो पा रहा है।

नीति निर्माताओं और भू-राजनीतिक विश्लेषकों का दृष्टिकोण

पारंपरिक आख्यान / धारणा

वर्तमान वास्तविक स्थिति

बाजार पहुँच में वृद्धि: एफटीए से भारतीय वस्तुओं को विदेशी बाजारों में निर्बाध पहुँच मिलती है।

आयात में तीव्र उछाल: भारतीय वस्तुओं के निर्यात की तुलना में विदेशी वस्तुओं का भारत में आयात अधिक बढ़ा है।

GVC एकीकरण: एफटीए से देश वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का प्रमुख हिस्सा बनता है।

असमान एकीकरण: भारत केवल असेंबली या कच्चे माल की आपूर्ति तक सीमित रह जाता है, जबकि उच्च मूल्य-वर्धन अन्य देशों में होता है।

प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार: विदेशी प्रतिस्पर्धा से घरेलू उद्योग मजबूत होते हैं।

व्यापार घाटे में तब्दील: सिंगापुर जैसे देशों के साथ अधिशेष का घाटे में बदलना घरेलू निर्यात की घटती प्रतिस्पर्धात्मकता को उजागर करता है।


आगे की राह

  • एफटीए का पुनर्मूल्यांकन और समीक्षा: आसियान, जापान और कोरिया के साथ मौजूदा एफटीए के 'रूल्स ऑफ ओरिजिन' और गैर-टैरिफ बाधाओं की कठोर समीक्षा की जानी चाहिए।

  • घरेलू विनिर्माण को मजबूती: 'मेक इन इंडिया' और पीएलआई (PLI) योजनाओं के माध्यम से घरेलू लागत को कम करना और लॉजिस्टिक्स बुनियादी ढांचे में सुधार करना।
  • अग्रिम मूल्य-वर्धित निर्यात पर ध्यान: केवल कच्चे माल या प्राथमिक वस्तुओं के बजाय उच्च-प्रौद्योगिकी और मूल्य-वर्धित उत्पादों के निर्यात को प्रोत्साहन देना।
  • सेवा क्षेत्र का समावेश: भारत को वस्तुओं के व्यापार के साथ-साथ अपने मजबूत 'सेवा क्षेत्र' और कुशल श्रम की आवाजाही को एफटीए वार्ताओं के केंद्र में रखना चाहिए।

निष्कर्ष

मुक्त व्यापार समझौते निश्चित रूप से आर्थिक कूटनीति और वैश्विक एकीकरण के शक्तिशाली साधन हैं। हालाँकि, बिना किसी ठोस घरेलू औद्योगिक रणनीति और व्यापार समीक्षा के केवल समझौतों का विस्तार करना व्यापार घाटे को और गहरा कर सकता है। भारत को अपनी एफटीए रणनीति में अधिक सूक्ष्म, व्यावहारिक और रक्षात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए अपने राष्ट्रीय आर्थिक हितों तथा व्यापार संतुलन को सर्वोपरि रखना होगा।

ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम (GCP): भारत में पर्यावरण संरक्षण को प्रोत्साहन, क्रियान्वयन एवं चुनौतियाँ

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।

संदर्भ

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने हाल ही में संसद को 'ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम' (GCP) की कार्यान्वयन स्थिति के संबंध में सूचित किया है। पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत 'ग्रीन क्रेडिट नियम, 2023' द्वारा अधिसूचित यह कार्यक्रम भारत सरकार की एक स्वैच्छिक और बाजार-आधारित पहल है। इसका मुख्य उद्देश्य 'मिशन लाइफ' को बढ़ावा देते हुए व्यक्तियों, समुदायों, उद्योगों और संस्थाओं को मापने योग्य पर्यावरणीय कार्यों (जैसे वनीकरण, जल संरक्षण, मृदा सुधार) के लिए प्रोत्साहित करना और कार्बन पृथक्करण को गति देना है।

ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम (GCP) क्या है?

ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम (GCP) केवल कार्बन उत्सर्जन में कमी से परे सकारात्मक पारिस्थितिक योगदानों को पुरस्कृत करने की एक अभिनव प्रोत्साहन प्रणाली है।

  • प्रशासक: भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE), देहरादून।
  • मूल ढांचा: यह कार्यक्रम केवल नियमन-संचालित संरक्षण के बजाय प्रोत्साहन-आधारित  पर्यावरणीय प्रबंधन की ओर एक रणनीतिक बदलाव है।
  • डिजिटल तंत्र: पंजीकरण, निगरानी और ग्रीन क्रेडिट जारी करने की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने हेतु एक समर्पित 'ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम पोर्टल' विकसित किया गया है।

हालिया चर्चा में क्यों?

  • संसदीय अद्यतन: पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा संसद में ग्रीन क्रेडिट जारी करने, क्षरित वन भूमि की बहाली और निगरानी तंत्र की प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करना।

  • संशोधित कार्यप्रणाली: वृक्षारोपण और पारिस्थितिकी-बहाली  की पद्धति को 22 फरवरी 2024 को अधिसूचित किया गया और 29 अगस्त 2025 को संशोधित किया गया।
  • मिशन लाइफ का सुदृढ़ीकरण: समुदाय-स्तरीय व्यवहार परिवर्तन के माध्यम से टिकाऊ जीवन शैली को प्रोत्साहित करना।

मुख्य फोकस क्षेत्र, पात्रता एवं संस्थागत ढांचा

यह कार्यक्रम पर्यावरण संरक्षण के आठ प्रमुख क्षेत्रों (वृक्षारोपण, जल प्रबंधन, टिकाऊ कृषि, अपशिष्ट प्रबंधन, वायु प्रदूषण नियंत्रण, मैंग्रोव पुनर्प्राप्ति आदि) पर केंद्रित है:

पात्रता एवं क्रेडिट जारी करने की शर्तें (वृक्षारोपण हेतु)

  • भूमि चयन: न्यूनतम 5 हेक्टेयर आकार वाले पात्र क्षरित वन भूमि के टुकड़ों का चयन।
  • कैनोपी घनत्व: 5 वर्ष की स्थापना अवधि के बाद जब न्यूनतम 40% कैनोपी घनत्व प्राप्त हो जाता है, तब क्रेडिट दिए जाते हैं।
  • गणना दर: प्रत्येक जीवित वृक्ष पर 1 ग्रीन क्रेडिट जारी किया जाता है।
  • गैर-व्यापारिक स्थिति: वृक्ष-आधारित ग्रीन क्रेडिट गैर-हस्तांतरणीय हैं, जिनका उपयोग केवल विशिष्ट पर्यावरणीय व सामाजिक अनुपालन दायित्वों को पूरा करने हेतु किया जा सकता है।

संस्थागत ढांचा

संस्था

प्रमुख भूमिका एवं जिम्मेदारी

ICFRE, देहरादून (प्रशासक)

कार्यक्रम का कार्यान्वयन, पोर्टल का संचालन, रिकॉर्ड रखरखाव एवं सत्यापन पश्चात क्रेडिट जारी करना।

राज्य वन विभाग

पात्र क्षरित वन भूखंडों की पहचान, सत्यापन, पंजीकरण एवं पुनर्प्राप्ति कार्यों को सुगम बनाना।

नामित निगरानी एजेंसियाँ

स्थल पर पुनर्प्राप्ति कार्यों का निष्पक्ष सत्यापन करना और प्रशासक को रिपोर्ट प्रस्तुत करना।


कार्यक्रम के लाभ

  • पर्यावरणीय लाभ:

    • क्षतिग्रस्त वन क्षेत्रों और प्राकृतिक आवासों का पुनरुद्धार।
    • वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड (CO2​) का कुशल अवशोषण ।
    • भूजल पुनर्भरण और मृदा अपरदन पर रोक।
    • वैश्विक तापमान वृद्धि एवं जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने में सहायक।
  • सामाजिक-आर्थिक लाभ:
    • इमारती लकड़ी और गैर-इमारती वन उपज (NTFPs) की उपलब्धता में वृद्धि।
    • स्थानीय पशुधन हेतु चारे और जल की सुलभता।
    • प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं (जैसे परागण और जल शोधन) का सुदृढ़ीकरण।
    • वन-आश्रित स्थानीय समुदायों के लिए रोजगार और आजीविका के अवसरों का सृजन।

कार्यान्वयन से जुड़ी चुनौतियाँ

मुख्य चुनौतियाँ

व्यावहारिक प्रभाव / चिंताएँ

दीर्घकालिक उत्तरजीविता:

नए रोपे गए पौधों की 5-वर्षीय अवधि के दौरान उत्तरजीविता सुनिश्चित करना कठिन कार्य है।

एकल-संस्कृति का खतरा:

जैव-विविध वनों की पुनर्प्राप्ति के स्थान पर तेजी से बढ़ने वाली एकल प्रजाति के रोपण का जोखिम।

पारदर्शिता एवं सत्यापन:

बड़े पैमाने पर ग्रीन क्रेडिट की ट्रैकिंग और सत्यापन हेतु पर्याप्त संस्थागत क्षमता की कमी।

व्यावसायिक हितों का टकराव:

कॉर्पोरेट लालच और अनुपालन के दबाव में वास्तविक पारिस्थितिक स्वास्थ्य की उपेक्षा।


आगे की राह

  • जैव-विविधतापूर्ण वनीकरण: केवल वृक्षों की संख्या बढ़ाने के बजाय स्थानीय प्रजातियों के रोपण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

  • तकनीकी एकीकरण: उपग्रह इमेजरी, ड्रोन और जीआईएस (GIS) मैपिंग के माध्यम से कैनोपी घनत्व और उत्तरजीविता दर की रीयल-टाइम निगरानी।
  • स्थानीय समुदायों की भागीदारी: ग्राम पंचायत और ग्राम वन समितियों को प्रोत्साहन राशि का सीधा लाभ देकर संरक्षण प्रक्रिया में शामिल करना।
  • क्षमता निर्माण: राज्य वन विभागों और नामित सत्यापन एजेंसियों की संस्थागत क्षमताओं का विस्तार करना।


निष्कर्ष

ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम (GCP) केवल नियामक आदेशों से हटकर प्रोत्साहन-आधारित पर्यावरणीय प्रबंधन की दिशा में भारत का एक ऐतिहासिक कदम है। यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण, पारदर्शी सत्यापन और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाए, तो यह कार्यक्रम न केवल भारत के क्षरित वनों का कायाकल्प करेगा बल्कि 'मिशन लाइफ' के सपनों को साकार करते हुए सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की प्राप्ति में मील का पत्थर साबित होगा।

एआई और साइबर: राष्ट्रीय एवं वैश्विक सुरक्षा की नई चुनौतियाँ

सामान्य अध्ययन पेपर – III:  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।


संदर्भ

पारंपरिक सुरक्षा ढांचा मुख्य रूप से भौतिक सीमाओं तक सीमित था, किन्तु डिजिटल क्रांति ने 'साइबर स्पेस' को सुरक्षा का पाँचवाँ आयाम बना दिया है। वर्तमान में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के अभूतपूर्व विकास और साइबर खतरों के समाकलन ने वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य को अत्यधिक जटिल एवं जोखिमपूर्ण बना दिया है।

एआई और साइबर अवधारणा

  • साइबर स्पेस: यह कंप्यूटर, नेटवर्क, डेटा और इंटरनेट से बना एक डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र है।

  • एआई का समावेश: एआई एल्गोरिदम साइबर सुरक्षा में स्वचालित खतरे की पहचान  और जटिल मालवेयर के विकास दोनों को गतिशील और तीव्र बनाते हैं।

चर्चा में क्यों?

  • 'मिथोस' जैसी प्रणालियाँ: हाल ही में अमेरिकी फर्म द्वारा विकसित एआई मॉडल 'जीरो-डे' कमजोरियों को उजागर करने में सक्षम पाए गए हैं।

  • सैन्य अनुप्रयोग: रूस-यूक्रेन और पश्चिम एशिया संघर्षों में एआई-संचालित स्वायत्त हथियारों तथा ड्रोन हमलों का व्यापक प्रयोग।
  • बौद्धिक संपदा विवाद: अमेरिका द्वारा चीन पर आरोप कि उसकी 'मूनशॉट' एआई ने अमेरिकी कंपनी एंथ्रॉपिक के 'फेबल' मॉडल से डेटा/तकनीक चुराई है।

एआई मॉडल और ‘जीरो-डे’ क्या है?

‘जीरो-डे’ का अर्थ:

  • अवधारणा: ‘जीरो-डे’ किसी सॉफ्टवेयर, ऑपरेटिंग सिस्टम या डिजिटल प्रणाली में मौजूद ऐसी सुरक्षा खामी है, जो विक्रेता/डेवलपर के लिए अज्ञात हो सकती है अथवा जिसके लिए अभी सुरक्षा पैच उपलब्ध नहीं है।
  • नामकरण: इसे ‘जीरो-डे’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि खामी के सामने आने पर डेवलपर के पास उसके दुरुपयोग को रोकने के लिए प्रभावी सुरक्षा पैच तैयार करने हेतु ‘शून्य दिन’ की पूर्व तैयारी होती है।

एआई मॉडल का ‘जीरो-डे’ में योगदान:

  • स्वचालित पहचान: उन्नत एआई मॉडल एवं एजेंटिक एआई प्रणालियाँ बड़े और जटिल कोड का स्वचालित विश्लेषण कर संभावित अज्ञात सुरक्षा कमजोरियों की खोज एवं परीक्षण की प्रक्रिया को तेज कर सकती हैं।
  • दोहरा उपयोग जोखिम:
  • सकारात्मक (रक्षात्मक): साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ कमजोरियों की शीघ्र पहचान कर उनका पैच तैयार कर सकते हैं, जिससे हमले की संभावना कम की जा सकती है।
  • नकारात्मक (आक्रामक): यही क्षमता साइबर अपराधियों या शत्रुतापूर्ण समूहों के हाथ लगने पर कमजोरियों की पहचान और उनके दुरुपयोग को अधिक तीव्र एवं स्वचालित बना सकती है।

समय के साथ बदलाव: युद्ध प्रणाली में एआई एवं साइबर का प्रयोग

  • असममित युद्ध: छोटे गुट या 'रोग स्टेट्स' भी एआई-संचालित साइबर हथियारों से बड़े राष्ट्रों के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को ठप्प कर सकते हैं।

  • स्वायत्त मारक क्षमता: "गोलकीपर" और "व्हिपलाश" जैसी हथियार प्रणालियाँ बिना मानवीय हस्तक्षेप के स्वतंत्र रूप से लक्ष्य पहचान कर हमला करने में सक्षम हैं।

सत्ता एवं शक्ति संतुलन में बदलाव

  • कॉर्पोरेट प्रभुत्व: बिग-टेक कंपनियाँ (जैसे- एंथ्रॉपिक, पैलंटीर) अपनी तकनीकी बढ़त के कारण संप्रभु राष्ट्रों से अधिक शक्तिशाली बनकर उभर रही हैं।

  • 'जीरो ट्रस्ट' का विघटन: एआई एजेंट आंतरिक साइबर सुरक्षा प्रोटोकॉल को आसानी से मात दे रहे हैं, जिससे हार्ड पावर का केंद्र बदल रहा है।

आवश्यक नियम, विशेषज्ञ राय एवं संभावित प्रभाव

  • आवश्यकता: 'एजेंटिक ऑटोनॉमस ऑपरेशंस' को नियंत्रित करने हेतु वैश्विक नियमों का पुनर्गठन।

  • विशेषज्ञ मत: एआई की भ्रामक प्रतिक्रियाओं और एल्गोरिदमिक पूर्वाग्रहों से बचने के लिए "मानवीय नियंत्रण" अनिवार्य है।
  • प्रभाव: अनियंत्रित एआई साइबर-अपोकैलिप्स और वैश्विक तकनीकी-अस्थिरता को जन्म दे सकता है।

सरकारी पहल एवं कानूनी प्रावधान

  • भारत: डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP Act 2023), राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति, तथा CERT-In का सुदृढ़ीकरण।

  • यूरोपीय संघ (EU): दुनिया का पहला व्यापक जोखिम-आधारित "EU AI Act" लागू किया।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका: एआई सुरक्षा और उत्तरदायी उपयोग पर कार्यकारी आदेश।

वैश्विक परिदृश्य

  • अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा: दोनों महाशक्तियों के बीच एआई वर्चस्व की होड़ ने तकनीकी-शीतयुद्ध की स्थिति उत्पन्न कर दी है।

  • वैश्विक पहलों की कमी: परमाणु अप्रसार (NPT) की तर्ज पर एआई और साइबर हथियारों के लिए अभी तक कोई सार्वभौमिक बाध्यकारी संधि नहीं बन सकी है।

विश्लेषण

एआई और साइबर का संयोजन सुरक्षा खतरों की एक 'दोहरी कुंडली' है, जो पारंपरिक सैन्य संतुलन को ध्वस्त कर रही है। जब तक एआई की गति और मानव के विवेक का संतुलन नहीं बनता, तब तक तकनीक विकास का साधन न बनकर विनाश का उत्प्रेरक बनी रहेगी।

आगे की राह

  • वैश्विक बहुपक्षीय संधि: परमाणु हथियारों की तर्ज पर स्वायत्त एआई-हथियारों के सीमांकन हेतु अंतर्राष्ट्रीय रूप से बाध्यकारी ढांचा बने।

  • पारदर्शिता एवं ऑडिटबिलिटी: एआई प्रणालियों के एल्गोरिदम का नियमित सुरक्षा और पूर्वाग्रह ऑडिट अनिवार्य हो।
  • रणनीतिक यथार्थवाद: देशों को बिना सोचे-समझे तकनीक अपनाने के बजाय "पत्थरों को टटोलकर नदी पार करने" (संतुलित दृष्टिकोण) की रणनीति अपनानी चाहिए।

निष्कर्ष

एआई और साइबर सुरक्षा का संगम मानव सभ्यता को एक महत्वपूर्ण चौराहे पर ले आया है। तकनीकी नवाचार की रक्षा करते हुए इसके विनाशकारी पहलुओं पर वैश्विक नियंत्रण स्थापित करना ही 21वीं सदी की सबसे बड़ी कूटनीतिक और रणनीतिक परीक्षा है।