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सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
प्रस्तावना
भारतीय अर्थव्यवस्था के आख्यान में "दुनिया का बैक ऑफिस" कहे जाने वाला अध्याय अब आधिकारिक रूप से समाप्त हो चुका है। वर्ष 2026 के आगमन तक एक व्यापक रूपांतरण दृष्टिगोचर हुआ है, जहाँ भारत वैश्विक कॉर्पोरेट जगत के लिए एक 'रणनीतिक तंत्रिका-केंद्र' बन गया है। जिन्हें कभी 'कैप्टिव सेंटर' के रूप में जाना जाता था, वे अब ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCCs) में परिवर्तित हो चुके हैं। ये ऐसे परिष्कृत केंद्र हैं जो न केवल अपनी मूल कंपनियों को सहयोग प्रदान करते हैं, बल्कि उनके भविष्य की दिशा भी निर्धारित करते हैं।
चर्चा में क्यों?
- हालिया आंकड़ों और आर्थिक समीक्षाओं के अनुसार, भारतीय ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर GCCs ने 'GCC 4.0' युग में प्रवेश कर लिया है।
- वैश्विक स्तर पर 'एजेंटिक एआई' की ओर बढ़ते रुझान और भारत में स्थित इन केंद्रों द्वारा वैश्विक रणनीति नेतृत्व को संभालने के कारण यह विषय वर्तमान में नीति-निर्धारकों और आर्थिक विशेषज्ञों के मध्य चर्चा का मुख्य केंद्र बना हुआ है।
रणनीतिक विकास: लागत केंद्र से विकास इंजन तक
लागत कटौती केंद्रों से विकास के इंजनों तक का यह संक्रमण भारत के आर्थिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। भारतीय ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCCs) का क्रमिक विकास चार चरणों से होकर गुजरा है:
- प्रारंभिक चरण: इनका गठन मुख्य रूप से 'श्रम मध्यस्थता' का लाभ उठाने और नियमित आईटी कार्यों के निष्पादन हेतु किया गया था।
- वर्तमान युग (GCC 4.0): वर्तमान में लगभग 58% भारतीय GCCs 'एजेंटिक एआई' में भारी निवेश कर रहे हैं। ये ऐसी स्वायत्त प्रणालियाँ हैं जो तर्क करने और जटिल कार्यों को स्वतंत्र रूप से निष्पादित करने में सक्षम हैं। अब ये केंद्र वैश्विक रणनीति नेतृत्व, उच्च-स्तरीय अनुसंधान एवं विकास (R&D) और स्वामित्व वाली बौद्धिक संपदा (IP) के सृजन का दायित्व संभाल रहे हैं।
कंपनियों और राष्ट्र के लिए लाभ
- प्रतिस्पर्धात्मक लाभ: बहुराष्ट्रीय निगमों (MNCs) के लिए भारत एक अद्वितीय प्रतिभा पूल प्रदान करता है। 1,800 से अधिक ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCCs) और लगभग 20 लाख पेशेवरों के साथ, कंपनियां 'फॉलो-द-सन' मॉडल के माध्यम से निरंतर नवाचार कर रही हैं।
- उत्कृष्टता केंद्र (CoEs): ये केंद्र अब वित्त, विधिक और मानव संसाधन जैसे क्षेत्रों में वैश्विक 'उत्कृष्टता केंद्र' बन गए हैं, जिससे मूल कंपनियों को महत्वपूर्ण कार्यों का केंद्रीकरण करने में सहायता मिलती है।
- क्षेत्रीय विकास का विकेंद्रीकरण: यह विकास अब बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे महानगरों से निकलकर कोयंबटूर, इंदौर और कोच्चि जैसे टियर-II और टियर-III शहरों तक पहुँच गया है, जिससे क्षेत्रीय असमानता में कमी आ रही है।
विद्यमान चुनौतियाँ एवं जोखिम
- कौशल अंतराल: साइबर सुरक्षा और क्वांटम-प्रतिरोधी क्रिप्टोग्राफी जैसे विशिष्ट क्षेत्रों में मांग की तुलना में कुशल पेशेवरों की भारी कमी है, जिससे वेतन मुद्रास्फीति का जोखिम उत्पन्न हो गया है।
- साइबर सुरक्षा एवं नियामक दबाव: भारत-आधारित केंद्र अब राज्य-प्रायोजित साइबर हमलों के प्रमुख लक्ष्य हैं। साथ ही, 'डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम' का अनुपालन एक अनिवार्य और महंगा परिचालन उत्तरदायित्व बन गया है।
- राजकोषीय परिवर्तन: OECD के 'ग्लोबल मिनिमम टैक्स' (Pillar Two) की शुरुआत ने कर लाभ की संभावनाओं को सीमित कर दिया है।
- भू-राजनीतिक अस्थिरता: पश्चिमी देशों में 'डिजिटल संप्रभुता' और 'रिशोरिंग'नीतियों के प्रति झुकाव नए निवेश प्रवाह को बाधित कर सकता है।
सक्रिय नीति-निर्माण की आवश्यकता
भारत की स्थिति को अक्षुण्ण रखने हेतु नीति-निर्धारकों को अब 'नियामक' के स्थान पर 'सक्रिय सुविधाप्रदाता' की भूमिका निभानी होगी:
- एकल खिड़की निकासी: GCCs की स्थापना को सुव्यवस्थित करने के लिए एक समर्पित प्रणाली की आवश्यकता है।
- राजकोषीय निश्चितता: ट्रांसफर प्राइसिंग मानदंडों को तर्कसंगत बनाना और R&D गहन केंद्रों के लिए 'टैक्स सेफ हार्बर' प्रदान करना अनिवार्य है।
- उद्योग-अकादमिक सहयोग: कार्यबल को भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप कुशल बनाने हेतु शिक्षण संस्थानों और उद्योगों के बीच समन्वय स्थापित करना होगा।
निष्कर्ष
भारतीय ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCC) क्रांति केवल रोजगार सृजन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह वैश्विक नवाचार के मानचित्र पर भारत के बढ़ते प्रभुत्व का परिचायक है। यदि भारत अपनी नीतिगत बाधाओं को दूर कर एक सुदृढ़ पारिस्थितिकी तंत्र प्रदान करता है, तो यह 'वैश्विक बौद्धिक संपदा केंद्र' के रूप में अपनी स्थिति को और अधिक सशक्त कर सकेगा।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' (128वाँ संविधान संशोधन विधेयक) पितृसत्तात्मक विधायी संरचनाओं को तोड़ने की दिशा में एक युगांतरकारी कदम है। यह न केवल आधी आबादी को नीति-निर्धारण के केंद्र में लाने का वैधानिक प्रयास है, बल्कि समावेशी शासन की दिशा में एक नैतिक उद्घोष भी है।
महिला आरक्षण अधिनियम-2023
इसे 106वाँ संविधान संशोधन अधिनियम के रूप में जाना जाता है। इसके मुख्य प्रावधान निम्नलिखित हैं:
- आरक्षण: लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए 33% (एक-तिहाई) सीटें आरक्षित करना।
- उपरक्षण: आरक्षित सीटों के भीतर ही अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) की महिलाओं के लिए कोटा सुनिश्चित करना।
- अवधि: यह आरक्षण प्रारंभिक रूप से 15 वर्षों के लिए होगा, जिसे संसद आगे बढ़ा सकती है।
- रोटेशन: आरक्षित सीटों का आवंटन प्रत्येक परिसीमन अभ्यास के बाद रोटेशन के आधार पर किया जाएगा।
चर्चा में क्यों?
- कार्यान्वयन में विलंब: अधिनियम के पारित होने के बावजूद, इसके लागू होने की तिथि को आगामी जनगणना और परिसीमन से जोड़ दिया गया है।
- 2029 का चुनाव: नवीनतम आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2029 के आम चुनाव से पूर्व परिसीमन प्रक्रिया पूर्ण होना कठिन है, जिससे यह 2034 तक टल सकता है।
- संवैधानिक स्पष्टता की मांग: नागरिक समाज और विपक्षी दलों द्वारा जनगणना और परिसीमन की शर्त को हटाकर इसे तत्काल लागू करने की मांग की जा रही है।
संवैधानिक एवं तार्किक बाधाएँ
- अनुच्छेद 82 और परिसीमन: अधिनियम की धारा के अनुसार, आरक्षण केवल तभी प्रभावी होगा जब 2026 के बाद की पहली जनगणना के आंकड़े प्रकाशित हो जाएंगे और उसके आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण (परिसीमन) होगा।
- प्रक्रियात्मक जटिलता: जनगणना (संभावित 2027) और उसके बाद परिसीमन आयोग की रिपोर्ट में कम से कम 4-5 वर्ष का समय लगता है।
- सीटों का असंतुलन: उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों के बीच जनसंख्या के आधार पर सीटों के आवंटन को लेकर राजनीतिक विवाद परिसीमन की प्रक्रिया को और जटिल बना सकता है।
अधिनियम का महत्व एवं प्रभाव
- राजनीतिक सशक्तिकरण: यह 'प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व' से 'सक्रिय भागीदारी' की ओर संक्रमण सुनिश्चित करेगा।
- नीतिगत बदलाव: शोध बताते हैं कि महिला प्रतिनिधि स्वास्थ्य, शिक्षा और पेयजल जैसे जमीनी मुद्दों पर अधिक संवेदनशील निर्णय लेती हैं।
- लैंगिक अंतराल में कमी: ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स में भारत की रैंकिंग में सुधार होगा।
- नेतृत्व का लोकतंत्रीकरण: यह ग्रामीण स्तर (पंचायतों) के सफल महिला नेतृत्व को राष्ट्रीय स्तर पर मंच प्रदान करेगा।
प्रतीक्षा का लंबा इतिहास
- 1996: एचडी देवेगौड़ा सरकार द्वारा पहली बार 81वें संशोधन विधेयक के रूप में पेश किया गया।
- 1998-2003: वाजपेयी सरकार के दौरान कई बार प्रयास हुए लेकिन आम सहमति के अभाव में विफल रहे।
- 2010: मनमोहन सिंह सरकार के दौरान राज्यसभा में पारित हुआ, परंतु लोकसभा में लंबित रहने के कारण लैप्स हो गया।
- 2023: लगभग 27 वर्षों के विधायी संघर्ष के बाद यह कानून बना।
प्रमुख चिंताएँ
- 'प्रधान-पति' संस्कृति: पंचायतों की भांति राष्ट्रीय स्तर पर भी महिला प्रतिनिधियों के पीछे पुरुष रिश्तेदारों का नियंत्रण होने की आशंका।
- ओबीसी कोटा का अभाव: अधिनियम में अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण का प्रावधान नहीं है, जो समावेशिता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
- विलंब की राजनीति: आलोचकों का तर्क है कि इसे जनगणना से जोड़ना केवल राजनीतिक लाभ के लिए कार्यान्वयन को टालना है।
विश्लेषण
यह अधिनियम केवल सीटों का अंकगणित नहीं है, बल्कि भारतीय राजनीति के सामाजिक चरित्र का पुनर्गठन है। जहाँ एक ओर यह महिलाओं के 'एजेंसी' (निर्णय लेने की शक्ति) को स्वीकार करता है, वहीं दूसरी ओर परिसीमन की शर्त इसे एक 'भविष्योन्मुखी वादे' तक सीमित कर देती है। बिना तत्काल समयसीमा के, यह कानून अपनी नैतिक ऊर्जा खो सकता है।
आगे की राह
- शर्तों में संशोधन: सरकार को 'जनगणना और परिसीमन' की अनिवार्यता को हटाने के लिए एक पूरक संशोधन पर विचार करना चाहिए ताकि 2029 में ही इसका लाभ मिले।
- अस्थायी विस्तार: परिसीमन होने तक लोकसभा में कुल सीटों की संख्या बढ़ाकर अतिरिक्त महिला सीटें सृजित की जा सकती हैं।
- क्षमता निर्माण: निर्वाचित होने वाली महिलाओं के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए ताकि वे स्वतंत्र निर्णय ले सकें।
- दलों के भीतर कोटा: राजनीतिक दलों को स्वेच्छा से टिकट वितरण में 33% भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए।
निष्कर्ष
महिला आरक्षण अधिनियम भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का प्रतीक है। हालाँकि, इसकी सफलता केवल कानून पारित होने में नहीं, बल्कि इसके वास्तविक धरातल पर उतरने में निहित है। यदि इस 'ऐतिहासिक न्याय' को प्रक्रियागत बाधाओं के कारण एक दशक और टाला जाता है, तो यह देश की आधी आबादी के साथ किया गया एक अधूरा वादा ही कहलाएगा। समय की मांग है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाते हुए इसे अविलंब प्रभावी बनाया जाए।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
सन्दर्भ
वर्तमान वैश्विक भू-राजनीति में 'पैक्स सिलिका' गठबंधन का उदय एक नए तकनीकी-युग के सूत्रपात का संकेत है। यह गठबंधन न केवल अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों के आदान-प्रदान का माध्यम है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय संबंधों के शक्ति संतुलन को भी पुनर्परिभाषित कर रहा है। भारत के लिए इस गठबंधन में सम्मिलित होना जहाँ एक ओर अभूतपूर्व रणनीतिक अवसरों के द्वार खोलता है, वहीं दूसरी ओर यह देश की दीर्घकालिक स्वायत्तता और नीतिगत स्वतंत्रता पर गंभीर प्रश्नचिह्न भी अंकित करता है।
पैक्स सिलिका क्या है?
यह अमेरिका के नेतृत्व में उभरती एक तकनीकी-रणनीतिक व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य सेमीकंडक्टर चिप्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और महत्वपूर्ण खनिजों की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर लोकतांत्रिक देशों का नियंत्रण स्थापित करना है।
इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- चीन को संतुलित करना: इस गठबंधन का मुख्य उद्देश्य उच्च-तकनीक के क्षेत्र में चीन के बढ़ते वर्चस्व को रोकना है।
- आपूर्ति श्रृंखला की सुरक्षा: चिप्स बनाने के लिए आवश्यक खनिजों और तकनीक की सप्लाई केवल मित्र देशों के बीच ही सीमित रखना, ताकि युद्ध या तनाव की स्थिति में तकनीक का संकट न आए।
- महत्वपूर्ण खनिजों पर नियंत्रण: इसमें वे देश शामिल हैं जिनके पास या तो तकनीक है (जैसे अमेरिका, ताइवान, जापान) या जिनके पास इंजीनियरिंग टैलेंट और बड़ा बाजार है (जैसे भारत)।
- वैश्विक मानकों का निर्धारण: AI और डेटा सुरक्षा के नियम कैसे होंगे, यह इसी गठबंधन के देश तय करना चाहते हैं।
रणनीतिक अवसर और लाभ
अमेरिका के नेतृत्व वाले इस गठबंधन में भारत की सहभागिता के दूरगामी सकारात्मक परिणाम हो सकते हैं:
- तकनीकी अभिसरण: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित करने के उद्देश्य से बना यह गठबंधन भारत को उन्नत प्रौद्योगिकियों और वैश्विक निवेश तक सुलभ पहुँच प्रदान करेगा।
- राष्ट्रीय मिशनों को गति: यह सदस्यता भारत के 'इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन' (ISM) जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं को वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र के साथ एकीकृत कर सुदृढ़ता प्रदान करेगी।
- आपूर्ति श्रृंखला का विविधीकरण: चीन पर वैश्विक निर्भरता को कम करने के उद्देश्य से, भारत अपनी अभियांत्रिकी प्रतिभा और विशाल घरेलू बाजार के बल पर एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में उभर सकता है।
चुनौतियाँ एवं चिंताएँ
सकारात्मक संभावनाओं के मध्य इस गठबंधन के कुछ पक्ष भारत के लिए चिंता का विषय भी हैं:
- कनिष्ठ भागीदार की स्थिति: इस पारिस्थितिकी तंत्र में भारत की स्थिति एक 'कनिष्ठ भागीदार' के रूप में रह सकती है। तकनीकी मानकों और निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाओं पर भारत का प्रभाव सीमित है, जिससे उसे विकसित राष्ट्रों द्वारा निर्धारित नियमों का अनुगामी बनना पड़ सकता है।
- खनिज संसाधनों की उपलब्धता: भारत के पास इस तकनीकी तंत्र के लिए अनिवार्य 'दुर्लभ मृदा खनिजों' के विशाल भंडार या निष्कर्षण क्षमता का अभाव है, जिसके कारण गठबंधन के लाभों का वितरण भारत के पक्ष में असमान हो सकता है।
- रणनीतिक लचीलेपन में कमी: परंपरागत रूप से भारत 'मुद्दा-आधारित संरेखण' पक्षधर रहा है। इस ब्लॉक में पूर्ण भागीदारी नई दिल्ली की अन्य महाशक्तियों के साथ संबंधों में लचीलेपन को सीमित कर सकती है।
- घरेलू नवाचार पर वित्तीय भार: यदि भारत के घरेलू एआई नियम वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं के दबाव में अमेरिकी मानकों के अनुरूप ढलते हैं, तो यह स्थानीय नवाचार के लिए वित्तीय बोझ और समय-सीमा में विलंब का कारण बन सकता है।
विश्लेषण
'पैक्स सिलिका' की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या गठबंधन के सदस्य केवल संवाद तक सीमित न रहकर एक ऐसा वास्तविक तंत्र विकसित कर पाते हैं जहाँ खनिजों के खनन से लेकर चिप निर्माण और एआई प्रणालियों के परिनियोजन तक की संपूर्ण प्रक्रिया सुचारू हो। भारत के लिए अनिवार्य है कि वह इस नेटवर्क के माध्यम से अपनी आर्थिक संवृद्धि को गति दे, साथ ही स्वयं को किसी भी संभावित व्यवधान से सुरक्षित रखे।
आगे की राह
- खनिज कूटनीति: भारत को 'खनिज सुरक्षा साझेदारी' (MSP) जैसे मंचों का सक्रिय उपयोग कर अपनी कच्ची सामग्री की आपूर्ति सुनिश्चित करनी चाहिए।
- स्वदेशी मानक: भारत को वैश्विक मानकों का केवल पालन करने के बजाय, अपनी विशाल जनसंख्या और डेटा की उपलब्धता का लाभ उठाते हुए मानक-निर्धारण में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
- निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन: घरेलू कंपनियों को वैश्विक मूल्य श्रृंखला में जोड़ने के लिए वित्तीय बोझ कम करने हेतु नीतिगत सुधार आवश्यक हैं।
निष्कर्ष
'पैक्स सिलिका' भारत के लिए मात्र एक तकनीकी समझौता नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण राजनीतिक निर्णय है। यह भारत को वैश्विक विनिर्माण के केंद्र में लाने की क्षमता रखता है, किंतु इसके सफल क्रियान्वयन के लिए भारत को अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' और 'वैश्विक गठबंधन की प्रतिबद्धताओं' के मध्य एक सूक्ष्म संतुलन साधने की आवश्यकता होगी। यदि यह गठबंधन केवल कागजी प्रतिबद्धताओं से आगे बढ़कर एक पारदर्शी और सहभागी तंत्र का रूप लेता है, तभी यह भारत की 'आधी आबादी' के समान ही भारत के 'पूर्ण विकास' के स्वप्न को साकार करने में सहायक होगा।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
ऐतिहासिक रूप से नेहरूवादी 'सहिष्णुता' से वर्तमान 'गतिरोध' तक भारतीय संसद ने तीखी आलोचनाओं को आत्मसात किया है, किंतु हालिया वर्षों में चर्चाओं का सीमित होना और विलोपन की बढ़ती घटनाएं संसदीय लोकतंत्र की नींव को चुनौती दे रही हैं। संसद मात्र एक विधायी निकाय नहीं, बल्कि राष्ट्र की सामूहिक चेतना का वह मंच है जहाँ विपक्ष की आवाज़ शासन की निरंकुशता पर अंकुश लगाती है।
'शब्दों का विलोपन' क्या है?
- संसदीय शब्दावली में 'विलोपन' का अर्थ है सदन की कार्यवाही के आधिकारिक रिकॉर्ड से कुछ विशिष्ट शब्दों, वाक्यांशों या अंशों को हटाना।
- जब पीठासीन अधिकारी किसी संबोधन को 'असंसदीय' या 'अमर्यादित' घोषित करते हैं, तो उसे रिकॉर्ड से निकाल दिया जाता है और वह मीडिया रिपोर्टिंग या भविष्य के संदर्भ के लिए अमान्य हो जाता है।
चर्चा में क्यों?
- विपक्षी भाषणों के विलोपन को लेकर विवाद: हालिया बजट सत्रों में विपक्ष के वरिष्ठ नेताओं (जैसे मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी) के भाषणों के बड़े हिस्सों को 'असंसदीय' बताकर रिकॉर्ड से हटाया गया।
- अयोग्यता का मुद्दा: सांसदों द्वारा सदन में दिए गए बयानों के आधार पर उन्हें अयोग्य ठहराने के लिए विशेषाधिकार हनन के नोटिस और प्रस्तावों का बढ़ता चलन।
- अधिकारों का हनन: सदस्यों द्वारा यह आरोप लगाया जाना कि विलोपन के कारण उनके तर्कों का मूल अर्थ और संदर्भ ही समाप्त हो गया है।
संवैधानिक प्रावधान एवं संसदीय नियम
- अनुच्छेद 105: सांसदों को सदन के भीतर बोलने की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान करता है और उन्हें उनके द्वारा कही गई किसी भी बात के लिए न्यायालय के प्रति उत्तरदायी होने से सुरक्षा देता है।
- अनुच्छेद 121: न्यायपालिका के आचरण पर चर्चा को प्रतिबंधित करता है (हटाने के प्रस्ताव के बिना)।
- नियम 380 (लोकसभा): अध्यक्ष को यह विवेकाधीन शक्ति देता है कि यदि कोई शब्द 'अपमानजनक, मानहानिकारक या अभद्र' है, तो उसे विलोपित किया जा सकता है।
- नियम 381: यह स्पष्ट करता है कि रिकॉर्ड से हटाए गए अंशों को तारांकित किया जाएगा और एक पाद-टिप्पणी दी जाएगी कि इन्हें 'अध्यक्ष के आदेश पर' हटाया गया है।
सरोकार एवं चुनौतियाँ
- नियमों का शस्त्रीकरण: विलोपन की शक्ति का प्रयोग आलोचना को दबाने के लिए एक राजनीतिक हथियार के रूप में होना।
- संवैधानिक विरोधाभास: क्या 'प्रक्रियात्मक नियम' (Rule 380) संविधान द्वारा प्रदत्त 'मौलिक विशेषाधिकार' (Art. 105) को निष्प्रभावी कर सकते हैं?
- इतिहास का विरूपण: संसद के रिकॉर्ड भविष्य के लिए संदर्भ होते हैं; इनके विलोपन से संसदीय इतिहास का एक अधूरा और एकतरफा पक्ष संरक्षित होगा।
- प्रतिभा का पलायन: डर और पाबंदियों के कारण सदस्य गंभीर और निर्भीक चर्चा से कतराने लगेंगे।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
स्वतंत्रता के बाद, नेहरू काल में संसद 'सहमति और असहमति' का एक पवित्र स्थल थी। नेहरू स्वयं विपक्ष के प्रहारों को सुनते थे और उनका मानना था कि वास्तविक भारत की तस्वीर फाइलों में नहीं, बल्कि विपक्ष के भाषणों में झलकती है। पूर्व महासचिव पी.डी.टी. आचारी के अनुसार, उस समय विलोपन का प्रयोग केवल तकनीकी 'गाली-गलौज' या 'अमर्यादित' अपशब्दों तक सीमित था, न कि राजनीतिक विचारों को मिटाने के लिए।
लोकतंत्र और गरिमा पर प्रभाव
- विपक्ष का अस्तित्व: लोकतंत्र में विपक्ष का कर्तव्य ही 'विरोध' करना है; यदि आलोचना को ही 'अमर्यादित' मान लिया जाए, तो लोकतांत्रिक विमर्श की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है"
- सदन की गरिमा: गरिमा केवल शांत रहने से नहीं, बल्कि तर्कसंगत और निर्भीक बहस से बढ़ती है। जब सदस्य को बोलने से रोका जाता है, तो जनता का संसद पर से विश्वास कम होता है।
- पारस्परिक सहनशीलता का ह्रास: बहुमत और अल्पमत के बीच सम्मान का रिश्ता टूटने से संसदीय शालीनता की मर्यादा खंडित होती है।
विश्लेषण
संसदीय कार्यवाही के आधिकारिक अभिलेखों का प्रबंधन केवल प्रक्रियात्मक औपचारिकता नहीं, बल्कि संवैधानिक सुचिता का विषय है। यहाँ चुनौती नियमों की विद्यमानता नहीं, बल्कि उनके व्याख्यात्मक अनुप्रयोग में है। जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' के संदर्भ में 'आनुपातिकता के सिद्धांत' को रेखांकित किया है कि प्रतिबंध केवल 'तार्किक' होने चाहिए न कि 'दमनकारी' यही सिद्धांत विधायी विमर्श पर भी समान रूप से लागू होता है। चूँकि संसद राष्ट्र की नीति-निर्धारण का सर्वोच्च मंच है, अतः पीठासीन अधिकारियों द्वारा विलोपन की शक्ति का प्रयोग इस प्रकार होना चाहिए कि वह 'सदन की गरिमा' और 'निर्भीक आलोचना' के मध्य एक न्यायसंगत संतुलन स्थापित कर सके।"
आगे की राह
- विलोपन मानकों का स्पष्टीकरण: 'असंसदीय' की परिभाषा को स्पष्ट और वस्तुनिष्ठ बनाना चाहिए ताकि पीठासीन अधिकारी अपनी व्यक्तिगत धारणा के आधार पर निर्णय न लें।
- न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा: हालांकि सदन का आंतरिक मामला न्यायालय के बाहर है, किंतु 'संवैधानिक प्रक्रिया' के उल्लंघन पर संवैधानिक पीठ द्वारा व्याख्या की आवश्यकता है।
- संसदीय सदाचार: पीठासीन अधिकारियों को अपनी पार्टीगत निष्ठा से ऊपर उठकर 'सदन के संरक्षक' की भूमिका निभानी चाहिए।
- विपक्ष को स्थान: सरकार को यह समझना होगा कि तीखी आलोचना शासन में सुधार का अवसर प्रदान करती है।
निष्कर्ष
संसद की आत्मा 'संवाद' में निहित है, 'चुप्पी' में नहीं। अनुच्छेद 105 के तहत दी गई स्वतंत्रता कोई पूर्ण अधिकार नहीं है, किंतु इसे संसदीय नियमों की बेड़ियों में इस तरह नहीं जकड़ा जाना चाहिए कि इसका दम घुट जाए। यदि भारत को अपनी लोकतांत्रिक साख बचाए रखनी है, तो संसद को केवल 'संख्याबल' का केंद्र नहीं, बल्कि 'तर्क' और 'सहिष्णुता' का मंदिर बने रहना होगा।