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नाटो का अंकारा शिखर सम्मेलन: वैश्विक रक्षा परिदृश्य और भारत के लिए चेतावनी के संकेत
सामान्य अध्ययन पेपर – II: शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।
संदर्भ
उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) का अंकारा शिखर सम्मेलन (7-8 जुलाई, 2026) वैश्विक रक्षा परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण मोड़ बनकर उभरा है। शीत युद्ध के दौर से लेकर वर्तमान तक, यूरोप और उत्तरी अमेरिका के बीच का यह सैन्य संगठन अपनी भूमिका को लगातार बदलता रहा है। 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध और हालिया वैश्विक सैन्य अभियानों के बाद, यूरोपीय सुरक्षा और वैश्विक हथियारों के बाजार में एक बड़ा संरचनात्मक बदलाव आया है, जो सीधे तौर पर भारत जैसी उभरती शक्तियों के रक्षा आयात को प्रभावित कर रहा है।
नाटो (NATO) क्या है?
परिचय: नाटो (नार्थ अटलांटिक ट्रीटी आर्गेनाइजेशन) उत्तरी अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच 4 अप्रैल, 1949 को वाशिंगटन संधि के तहत स्थापित एक राजनीतिक और सैन्य गठबंधन है।
- उद्देश्य:
- सामूहिक रक्षा: राजनीतिक और सैन्य साधनों के माध्यम से अपने सदस्य देशों की स्वतंत्रता और सुरक्षा की गारंटी देना।
- सामूहिक रक्षा का सिद्धांत (अनुच्छेद 5): किसी भी एक या अधिक सदस्य देश पर हमला सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाएगा।
- लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा: विवादों के शांतिपूर्ण समाधान और सैन्य क्षमताओं के सुदृढ़ीकरण हेतु सहयोग प्रदान करना।
- सदस्य संख्या: वर्तमान में नाटो में कुल 32 सदस्य देश शामिल हैं (फ़िनलैंड 31वें और स्वीडन 32वें सदस्य के रूप में शामिल हुए हैं)।
चर्चा के कारण -
अंकारा शिखर सम्मेलन (7-8 जुलाई, 2026): तुर्किये के अंकारा में 32 नाटो देशों के प्रमुखों की बैठक हुई, जिसका मुख्य उद्देश्य 2025 के हेग शिखर सम्मेलन के बाद हुई प्रगति की समीक्षा करना था।
- डोनाल्ड ट्रम्प की उपस्थिति: सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की कर्कश उपस्थिति और अमेरिकी हथियार प्रणालियों की श्रेष्ठता व रणनीतियों की सफलता पर जोर देना चर्चा का केंद्र रहा।
- वैश्विक हथियारों की कमी (ऑपरेशन एपिक फ्यूरी): ईरान के खिलाफ अमेरिकी-इजरायल अभियान ('ऑपरेशन एपिक फ्यूरी') के दौरान 850 से अधिक टोमाहॉक क्रूज मिसाइलों के इस्तेमाल से हथियारों का संकट पैदा हो गया है, क्योंकि इनकी वर्तमान उत्पादन दर केवल 85 प्रति वर्ष है।
- एशियाई और यूरोपीय मांगों में प्रतिस्पर्धा: अमेरिकी हथियारों के लिए एशियाई सहयोगियों की मांग और यूरोप की अपनी जरूरतों के बीच प्रतिस्पर्धा तेज हो गई है।
- भारतीय आपूर्ति में देरी: अमेरिकी फर्म 'जनरल इलेक्ट्रिक एयरोस्पेस' द्वारा भारतीय वायु सेना के 'तेजस' (LCA) विमानों के लिए आवश्यक F-404 इंजनों की आपूर्ति में देरी होना।
सम्मेलन में लिए गए ठोस निर्णय
अंकारा शिखर सम्मेलन से चार मुख्य प्रतिबद्धताएं सामने आईं:
- अनुच्छेद 5 के प्रति अटूट प्रतिबद्धता: 32 सदस्य देशों ने वाशिंगटन संधि के अनुच्छेद 5 (सामूहिक रक्षा) और ट्रांसअटलांटिक संबंधों के प्रति अपनी पूर्ण निष्ठा व्यक्त की।
- रक्षा बजट में ऐतिहासिक वृद्धि (5% GDP): "द हेग रक्षा प्रतिबद्धता" को सर्वसम्मति से स्वीकार करते हुए सभी सदस्यों ने 2035 तक अपनी-अपनी जीडीपी का कम से कम 5 प्रतिशत रक्षा पर खर्च करने का अभूतपूर्व संकल्प लिया (जो पहले 2% था)।
- यूक्रेन को निरंतर समर्थन: यूक्रेन की स्वतंत्रता, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए नाटो ने अपने "अटूट समर्थन" की घोषणा की।
- यूरोप-व्यापी रक्षा औद्योगिक आधार (DIB) का निर्माण: गठबंधन ने पूरे यूरोप में उच्च तकनीक और उच्च क्षमता वाले 'डिफेंस इंडस्ट्रियल बेस' (DIB) को विकसित करने का संकल्प लिया।
कार्यान्वयन पर ध्यान
अंकारा में मुख्य जोर राजनीतिक वादों को वास्तविक सैन्य क्षमता में बदलने पर था:
- निवेश और नवाचार: रक्षा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश, औद्योगिक क्षमता में वृद्धि और नई सैन्य तकनीकों के नवाचार पर ध्यान केंद्रित किया गया।
- उत्पादन बढ़ाने की चुनौती: यूरोप की प्रमुख रक्षा कंपनियां (जैसे MBDA और राइनमेटाल) गोला-बारूद और मिसाइल उत्पादन की कमी से जूझ रही हैं, जिन्हें दूर करना प्राथमिक लक्ष्य रखा गया है।
रूस के आरोप
अनियंत्रित विस्तारवाद का आरोप: रूस अमेरिका और यूरोपीय देशों पर नाटो के माध्यम से पूर्वी और मध्य यूरोप में अनियंत्रित विस्तार का आरोप लगाता है।
- प्रभाव क्षेत्र में हस्तक्षेप: पोलैंड, रोमानिया, बाल्टिक राज्यों और पूर्व सोवियत गणराज्यों के नाटो में शामिल होने को मास्को अपने ऐतिहासिक 'प्रभाव क्षेत्र' में सीधा अतिक्रमण मानता है।
- यूक्रेन पर आक्रमण का कारण: मास्को का तर्क है कि 2022 में यूक्रेन पर आक्रमण का मुख्य कारण कीव को नाटो में शामिल होने से रोकना था, हालांकि इसके कारण उल्टे फ़िनलैंड और स्वीडन नाटो में शामिल हो गए।
नाटो का रूपांतरण
नाटो ने बदलते रणनीतिक परिवेश के अनुसार खुद को बार-बार ढाला है:
- शीत युद्ध के बाद (1990-91): वारसॉ संधि के विघटन के बाद नाटो ने बाल्कन जैसे 'आउट-ऑफ-एरिया' (क्षेत्र से बाहर) ऑपरेशन्स पर ध्यान केंद्रित किया।
- 9/11 हमलों के बाद (2001): अमेरिका पर हुए हमलों के बाद नाटो ने वैश्विक आतंकवाद विरोधी अभियानों का रुख किया।
- वर्तमान युग: रूस और चीन की बढ़ती रणनीतिक साझेदारी और महाशक्ति टकराव के नए युग में नाटो एक बार फिर पारंपरिक राज्य-स्तरीय रक्षा और रक्षा औद्योगिक पुनरुद्धार की ओर लौट रहा है।
नाटो की आर्थिक-रणनीतिक भूमिका
अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता: 2022-2024 के बीच यूरोप के रक्षा खर्च का 50% हिस्सा अमेरिका से आया (जो 2019-2021 में मात्र 28% था)।
- विदेशी सैन्य बिक्री में उछाल: अमेरिकी कांग्रेस को यूरोपीय देशों द्वारा दिए गए सैन्य खरीद के ऑर्डर 2008 के बाद से चार गुना बढ़कर 2024 में 76 अरब डॉलर तक पहुंच गए हैं।
- उत्पादन का पुनर्गठन: यूक्रेन को लाइसेंस के तहत पैट्रियट वायु रक्षा प्रणालियों के निर्माण की अनुमति देना यह दर्शाता है कि नाटो अब केवल हथियारों का खरीदार नहीं, बल्कि उत्पादन का रणनीतिक नेटवर्क बन रहा है।
भारत के लिए चुनौतियाँ
खरीदारों के बाजार से विक्रेताओं के बाजार में बदलाव: यूरोपीय देशों द्वारा रक्षा बजट बढ़ाने से वैश्विक हथियारों का बाजार " सेलर्स ' मार्किट " में बदल गया है, जहाँ आपूर्तिकर्ता (विशेषकर अमेरिकी और यूरोपीय कंपनियां) मनमाने मूल्य और शर्तें तय कर रहे हैं।
- आपूर्ति में प्राथमिकता का संकट: पश्चिमी रक्षा निर्माता कंपनियां अब यूरोपीय और नाटो देशों के ऑर्डर्स को भारत जैसे गैर-नाटो सहयोगियों की तुलना में प्राथमिकता दे रही हैं।
- महत्वपूर्ण घटकों की आपूर्ति में देरी: अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (GE) द्वारा भारतीय LCA तेजस के लिए F-404 इंजनों की आपूर्ति में देरी इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है, जिससे भारत की परिचालन तैयारियों पर असर पड़ रहा है।
यह भारत के लिए चेतावनी क्यों है?
अत्यधिक व्यस्त आपूर्तिकर्ता: पश्चिमी देश और उनके रक्षा उद्योग अब अपने स्वयं के युद्धों और नाटो की प्राथमिकताओं को पूरा करने में व्यस्त हैं। संकट के समय भारत को तुरंत हथियार या स्पेयर पार्ट्स मिलने की संभावना घट गई है।
- क्रिटिकल टेक्नोलॉजी में एकाधिकार का जोखिम: एयर डिफेंस, प्रिसिजन-गाइडेड म्यूनिशन्स और इंटरसेप्टर मिसाइलों की वैश्विक कमी के कारण भारत को उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकियों से वंचित रखा जा सकता है।
- भू-राजनीतिक दबाव: नाटो के आर्थिक और रणनीतिक पुनरुत्थान के बीच भारत पर रूस के साथ अपने पारंपरिक रक्षा संबंधों को सीमित करने का दोहरा पश्चिमी दबाव बढ़ सकता है।
विश्लेषण
नाटो का रक्षा पर जीडीपी का 5% खर्च करने का निर्णय वैश्विक हथियारों की आपूर्ति श्रृंखला में भारी व्यवधान पैदा कर रहा है। पश्चिमी देशों की प्राथमिकताएं अब नाटो की अपनी आवश्यकताओं की ओर स्थानांतरित हो गई हैं, जिससे भारत जैसे बड़े रक्षा आयातकों के लिए सैन्य आपूर्ति में देरी और लागत में वृद्धि होना तय है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर अत्यधिक निर्भरता भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा जोखिम बन चुकी है।
आगे की राह
रक्षा क्षेत्र में पूर्ण आत्मनिर्भरता: भारत को 'आत्मनिर्भर भारत' पहल के तहत महत्वपूर्ण सैन्य प्रौद्योगिकियों—जैसे एआई (AI), ड्रोन, साइबर व इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों और जेट इंजन तकनीक में स्वदेशी विनिर्माण को अभूतपूर्व गति देनी होगी।
- सप्लाई चेन का विविधीकरण: किसी एक देश या ब्लॉक (जैसे केवल अमेरिका या केवल रूस) पर निर्भर रहने के बजाय भारत को इजरायल, फ्रांस और घरेलू निजी रक्षा क्षेत्र के साथ साझेदारी को और गहरा करना चाहिए।
- घरेलू आरएंडडी (R&D) में निवेश बढ़ाना: रक्षा अनुसंधान एवं विकास में निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहन देना चाहिए ताकि भविष्य के युद्धों के लिए स्वदेशी आपूर्ति श्रृंखला तैयार की जा सके।
निष्कर्ष
नाटो का अंकारा सम्मेलन भारत के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि बदलती वैश्विक भू-राजनीति में कोई भी विदेशी आपूर्तिकर्ता हमेशा विश्वसनीय नहीं रह सकता। अपने रक्षा बजट को बढ़ा रहे नाटो देशों के बीच भारत को अपनी सैन्य तैयारियों को बनाए रखने के लिए आयात-निर्भरता को समाप्त करना होगा। अत्याधुनिक रक्षा प्रौद्योगिकियों में त्वरित आत्मनिर्भरता और स्वदेशी औद्योगिक क्षमता का विकास ही भारत की राष्ट्रीय संप्रभुता को सुरक्षित रखने का एकमात्र मार्ग है।
पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन: वैश्विक जलमार्गों की सुरक्षा और क्षेत्रीय कूटनीति
सामान्य अध्ययन पेपर – II: शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।
संदर्भ
हाल ही में फिलिपिन्स की राजधानी मनीला में आयोजित 21वें पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन (EAS) में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वैश्विक समुद्री मार्गों की सुरक्षा, स्वतंत्रता और अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुपालन पर बल दिया। इस सम्मेलन में भारत ने अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों को अबाधित रखने, म्यांमार व पश्चिम एशिया संकट के शांतिपूर्ण समाधान तथा आतंकवाद पर कड़े रुख की वकालत की।
पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन (EAS) क्या है?
परिचय एवं स्थापना: पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन (EAS) हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक, राजनीतिक और आर्थिक संवाद का एक प्रमुख नेतृत्व-स्तरीय मंच है। इसकी स्थापना वर्ष 2005 में कुआलालंपुर (मलेशिया) में आयोजित प्रथम शिखर सम्मेलन के साथ हुई थी। भारत इसका एक संस्थापक सदस्य है।
- सदस्य देश: वर्तमान में इसके 19 सदस्य हैं। इसमें आसियान (ASEAN) के 11 देश (ब्रूनेई, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, फिलिपिन्स, सिंगापुर, थाईलैंड, वियतनाम और तिमोर-लेस्ते) तथा 8 संवाद साझेदार (ऑस्ट्रेलिया, चीन, भारत, जापान, न्यूजीलैंड, दक्षिण कोरिया, रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका) शामिल हैं।
- उद्देश्य:
- हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति, सुरक्षा, स्थिरता और आर्थिक समृद्धि को बढ़ावा देना।
- रणनीतिक और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों पर खुले एवं पारदर्शी संवाद को प्रोत्साहित करना।
- क्षेत्रीय एकीकरण, व्यापार, कनेक्टिविटी और सतत विकास को गति देना।
- कार्य प्रणाली:
- आसियान की केंद्रीयता: यह मंच आसियान के नेतृत्व में कार्य करता है। इसकी अध्यक्षता प्रतिवर्ष आसियान की अध्यक्षता करने वाले देश द्वारा ही की जाती है।
- सहयोग के 6 प्राथमिकता वाले क्षेत्र: पर्यावरण एवं ऊर्जा, शिक्षा, वित्त, वैश्विक स्वास्थ्य एवं महामारी, प्राकृतिक आपदा प्रबंधन, तथा आसियान कनेक्टिविटी।
- वार्षिक शिखर सम्मेलन के अतिरिक्त प्रतिवर्ष विदेश मंत्रियों एवं आर्थिक मंत्रियों की बैठकें और वरिष्ठ अधिकारियों की नियमित वार्ता आयोजित की जाती है।
चर्चा के कारण
21वां पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन: मनीला (फिलिपिन्स) में 21वें EAS का आयोजन, जिसमें भारत का प्रतिनिधित्व विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने किया।
- समुद्री जलमार्गों की सुरक्षा पर ध्यान: वैश्विक समुद्री गलियारों में बढ़ते तनाव और व्यापारिक जहाजों पर हमलों की पृष्ठभूमि में सुरक्षा का मुद्दा शीर्ष प्राथमिकता रहा।
- पश्चिम एशिया और म्यांमार संकट: फारस की खाड़ी/पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष तथा म्यांमार के गृहयुद्ध पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई।
- पाक दावों का करारा जवाब: 33वें आसियान क्षेत्रीय मंच (ARF) के दौरान पाकिस्तान के उप-प्रधानमंत्री इशाक डार द्वारा कश्मीर और सिंधु जल संधि पर दिए गए बयानों का भारत द्वारा कड़ा खंडन।
विदेश मंत्री द्वारा प्रस्तुत मुख्य विचार: "वैश्विक व्यवस्था की अनिश्चितता और समुद्री सुरक्षा"
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य और भारत के दृष्टिकोण को स्पष्ट शब्दों में रेखांकित किया:
"अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों को अंतरराष्ट्रीय कानून के पूर्ण अनुपालन में सुरक्षित और अबाधित रखा जाना चाहिए। किसी भी परिस्थिति में नाविकों, नागरिक नौवहन या बुनियादी ढांचे पर हमलों को स्वीकार नहीं किया जा सकता।"
- वैश्विक व्यवस्था की स्थिति: उन्होंने वर्तमान वैश्विक व्यवस्था की उभरती प्रकृति को "अनिश्चित और अस्थिर" करार दिया।
- कूटनीति और संवाद का आह्वान: फारस की खाड़ी और पश्चिम एशिया संकट को समाप्त करने के लिए भारत ने सैन्य साधनों के बजाय केवल कूटनीति और वार्ता के रास्ते को ही एकमात्र व्यावहारिक विकल्प बताया।
दक्षिण चीन सागर पर भारत का रुख
अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन: भारत ने दक्षिण चीन सागर पर अपनी सुसंगत स्थिति दोहराते हुए UNCLOS 1982 (संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि) के प्रति पूर्ण निष्ठा व्यक्त की।
- कानूनी रूप से बाध्यकारी आचार संहिता (CoC): भारत ने दक्षिण चीन सागर के लिए एक ऐसी ठोस, प्रभावी और कानूनी रूप से बाध्यकारी 'आचार संहिता' के शीघ्र निष्कर्ष का समर्थन किया, जो सभी उपयोगकर्ताओं के वैध अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव न डाले।
- आसियान केंद्रीयता: भारत ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र को "मुक्त, खुला और समृद्ध" बनाने के लिए 'आसियान केंद्रीयता' और क्षेत्रीय स्थिरता को अत्यंत आवश्यक बताया।
सिंधु जल समझौता और पाकिस्तान को भारत का प्रत्युत्तर
पाकिस्तान का गैर-जिम्मेदाराना रवैया: 33वें आसियान क्षेत्रीय मंच (ARF) में पाकिस्तान के उप-प्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री इशाक डार ने जम्मू-कश्मीर विवाद और सिंधु जल संधि का मुद्दा उठाकर इसका राजनीतिकरण करने का प्रयास किया।
- विदेश मंत्रालय (MEA) का पलटवार: भारत के विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने पाकिस्तान के बयानों को सिरे से खारिज करते हुए कहा:
"यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि एक बहुपक्षीय मंच का उपयोग पाकिस्तान द्वारा एक बार फिर झूठ फैलाने, राज्य-प्रायोजित दुष्प्रचार करने और सीमा पार आतंकवाद के अपने सुप्रलेखित रिकॉर्ड से ध्यान भटकाने के लिए किया गया है।"
- भारत का स्पष्ट संदेश: भारत ने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान जब तक आतंकवाद को संरक्षण देना बंद नहीं करता, तब तक बहुपक्षीय मंचों पर उसकी ऐसी बयानबाजी केवल उसकी अपनी विफलताओं को छिपाने का प्रयास है।
अन्य महत्वपूर्ण बिंदु
म्यांमार संकट: म्यांमार में फरवरी 2021 के सैन्य तख्तापलट और जातीय सशस्त्र संगठनों (EAOs) के संघर्ष पर भारत ने आसियान के प्रयासों का समर्थन करते हुए राजनीतिक समाधान खोजने की आवश्यकता पर बल दिया।
- आतंकवाद पर जीरो टॉलरेंस: भारत ने "आतंकवाद के प्रति शून्य सहिष्णुता" की अपनी नीति दोहराई और चेतावनी दी कि आतंकी कृत्यों के गंभीर परिणाम होंगे।
- साइबर सुरक्षा: वैश्विक साइबर-घोटाला केंद्रों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठित और सामूहिक कार्रवाई को प्राथमिकता देने का आह्वान किया गया।
- इजरायल-फिलिस्तीन मुद्दा: मध्य पूर्व में स्थायी शांति के लिए भारत ने पुनः 'द्वि-राष्ट्र समाधान' के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की।
- भारत द्वारा आयोजित होने वाले आगामी EAS कार्यक्रम:
- कोच्चि में समुद्री सुरक्षा सहयोग पर 7वां EAS सम्मेलन।
- लोथल (गुजरात) के प्राचीन बंदरगाह शहर में EAS समुद्री विरासत महोत्सव।
विश्लेषण
सामरिक महत्व: 21वां EAS यह दर्शाता है कि वैश्विक व्यापार का मुख्य केंद्र अब हिंद-प्रशांत और दक्षिण चीन सागर है। इन जलमार्गों में किसी भी प्रकार का व्यवधान वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और ऊर्जा सुरक्षा को सीधे प्रभावित करता है।
- संतुलित विदेश नीति: भारत ने स्वयं को एक तटस्थ लेकिन नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के प्रबल समर्थक के रूप में स्थापित किया है। UNCLOS 1982 के तहत नौवहन की स्वतंत्रता का समर्थन करना चीन के एकतरफा दावों का कूटनीतिक जवाब है।
- क्षेत्रीय मंचों का उपयोग: भारत ने बहुपक्षीय मंचों पर पाकिस्तान के भारत-विरोधी एजेंडे को प्रभावी ढंग से विफल करते हुए आतंकवाद और वैश्विक सुरक्षा जैसे मुख्य मुद्दों पर ध्यान केंद्रित रखा।
आगे की राह
समुद्री डोमेन जागरूकता (MDA): भारत को हिंद महासागर और आस-पास के जलमार्गों में अपनी निगरानी क्षमताओं और इनफॉरमेशन फ्यूजन सेंटर-हिंद महासागर क्षेत्र (IFC-IOR) जैसे तंत्रों को और अधिक मजबूत करना होगा।
- आसियान के साथ रणनीतिक सहयोग: समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और आपदा प्रबंधन में आसियान देशों के साथ सैन्य और कूटनीतिक सहयोग को गहरा करना आवश्यक है।
- अंतरराष्ट्रीय कानून का प्रवर्तन: दक्षिण चीन सागर और वैश्विक जलमार्गों में शांति बनाए रखने के लिए सभी पक्षों द्वारा सर्वसम्मति से अंतरराष्ट्रीय कानूनों (UNCLOS) का पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
- गहन आर्थिक एकीकरण: व्यापारिक अवरोधों को दूर कर और लोथल जैसे स्थलों के माध्यम से ऐतिहासिक व सांस्कृतिक संबंधों को पुनर्जीवित कर क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को बढ़ाना चाहिए।
निष्कर्ष
21वां पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन वर्तमान की बहुध्रुवीय और अस्थिर वैश्विक व्यवस्था में बहुपक्षीय वार्ता की महत्ता को रेखांकित करता है। भारत द्वारा अंतर्राष्ट्रीय जलमार्गों की सुरक्षा, आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख और नियम-आधारित व्यवस्था का समर्थन यह सिद्ध करता है कि भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में केवल एक दर्शक नहीं, बल्कि शांति, सुरक्षा और स्थिरता का एक जिम्मेदार एवं प्रमुख स्तंभ है।
मिडिल ईस्ट संकट: होर्मुज से बाब-अल-मंदेब तक तनाव का जाल और भारत पर प्रभाव
सामान्य अध्ययन पेपर – II: शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।
संदर्भ
पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) लंबे समय से भू-राजनीतिक अस्थिरता का केंद्र रहा है। मुख्य रूप से ईरान के नेतृत्व वाला "एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस" (जिसमें हिजबुल्लाह, हमास और यमन के हूथी शामिल हैं) तथा अमेरिका-इजरायल गठबंधन एवं खाड़ी देश आमने-सामने रहे हैं। हाल ही में 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच प्रत्यक्ष सैन्य संघर्ष की शुरुआत हुई। इसके बाद ईरान द्वारा रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया गया। इस नाकाबंदी से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बाधित हुई, जिसके जवाब में खाड़ी देशों (विशेषकर सऊदी अरब) ने अपने तेल निर्यात के लिए लाल सागर के वैकल्पिक मार्गों का उपयोग करना शुरू किया।
हूथी कौन हैं?
मूल और पहचान: हूथी, जिन्हें आधिकारिक तौर पर 'अंसार अल्लाह' कहा जाता है, यमन के ज़ैदी शिया समुदाय से ताल्लुक रखने वाला एक सशस्त्र राजनीतिक और धार्मिक आंदोलन है।
- सत्ता में उभार: वर्ष 2014-15 में यमन गृहयुद्ध के दौरान हूथियों ने राजधानी सना (Sana'a) सहित यमन के प्रमुख आबादी वाले हिस्सों और लाल सागर से सटे तटीय इलाकों पर कब्जा कर लिया।
- क्षेत्रीय गठजोड़: हूथियों को ईरान का प्रत्यक्ष सैन्य, वित्तीय और वैचारिक समर्थन प्राप्त है। वे यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार (जो सऊदी अरब समर्थित है) के खिलाफ मुख्य सैन्य और राजनीतिक शक्ति हैं।
चर्चा का कारण -
युद्धविराम का टूटना (13 जुलाई): सऊदी अरब और हूथियों के बीच बना एक नाजुक लेकिन कार्यात्मक युद्धविराम 13 जुलाई को तब टूट गया, जब यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार के बलों ने सना हवाई अड्डे पर हमला किया।
- सऊदी अरब पर आरोप: हूथियों ने इस हमले का जिम्मेदार सऊदी अरब (रियाद) को ठहराया।
- लाल सागर पर नाकाबंदी की घोषणा (20 जुलाई): प्रतिशोध के रूप में 20 जुलाई को हूथियों ने घोषणा की कि वे लाल सागर में स्थित सऊदी बंदरगाहों (विशेषकर यानबू) का उपयोग करने वाले सभी जहाजों पर समुद्री नाकाबंदी लागू करेंगे।
- कुवैत और जॉर्डन पर हमले: अमेरिकी हमलों के जवाब में ईरान ने कुवैत के विलवणीकरण (डीसेलिनेशन) संयंत्रों और पावर ग्रिड को निशाना बनाया। इसके साथ ही संघर्ष का विस्तार जॉर्डन तक हो गया, जहाँ दो बड़े अमेरिकी सैन्य अड्डे स्थित हैं।
युद्ध की वर्तमान स्थिति - वार्ता एवं एस्केलेशन ट्रैप
वार्ता की विफलता: 17 जून को अमेरिका और ईरान के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर हुए थे, जिससे कूटनीतिक समाधान की उम्मीद जगी थी।
- होर्मुज विवाद और युद्ध में वापसी: होर्मुज जलडमरूमध्य के नियंत्रण को लेकर उभरे मतभेदों के बाद वार्ता बाधित हो गई और अमेरिकी प्रशासन पुनः सैन्य कार्रवाइयों में शामिल हो गया।
- तनाव का जाल: वर्तमान स्थिति एक ऐसे 'ट्रैप' में बदल चुकी है जहाँ बार-बार पुरानी सैन्य रणनीतियों को दोहराया जा रहा है, किंतु भिन्न (सकारात्मक) परिणामों की उम्मीद की जा रही है। इससे अमेरिका के एक और लंबे, असाध्य तथा कभी न खत्म होने वाले क्षेत्रीय युद्ध में फंसने का खतरा बढ़ गया है।
हूथियों की एंट्री के मायने
युद्ध का बहु-क्षेत्रीय विस्तार: हूथियों के सीधे शामिल होने से यह संघर्ष केवल ईरान और अमेरिका-इजरायल तक सीमित न रहकर पूरे लाल सागर और अरब सागर के जलक्षेत्र में फैल गया है।
- सऊदी अरब की वैकल्पिक रणनीति पर चोट: सऊदी अरब, जो होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकाबंदी के प्रभाव से बचने के लिए अपनी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के जरिए लाल सागर के 'यानबू' बंदरगाह से तेल निर्यात कर रहा था, अब हूथियों के निशाने पर आ गया है।
- वैश्विक आर्थिक झटके: हूथियों के प्रवेश ने आर्थिक मोर्चे को अधिक संवेदनशील और घातक बना दिया है।
लाल सागर - बाब-अल-मंदेब और उनका वर्तमान में महत्व
भौगोलिक स्थिति: बाब-अल-मंदेब एक संकीर्ण जलडमरूमध्य है, जो लाल सागर को अदन की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है।
- यमन का नियंत्रण: हूथियों का नियंत्रण यमन की उस पूरी तटीय रेखा पर है जो बाब-अल-मंदेब के ठीक सामने स्थित है।
- वर्तमान रणनीतिक महत्व: होर्मुज के बंद होने के बाद, एशिया और यूरोप के बीच कच्चा तेल, एलएनजी (LNG) और वाणिज्यिक सामान ले जाने वाले जहाजों के लिए बाब-अल-मंदेब ही एकमात्र क्रियाशील और अत्यंत महत्वपूर्ण जलमार्ग बचा था।
यदि लाल सागर और बाब-अल-मंदेब में आवागमन बंद हुआ तो परिणाम?
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का ठप होना: स्वेज नहर के माध्यम से होने वाला एशिया-यूरोप व्यापार पूरी तरह रुक जाएगा।
- मालभाड़ा और बीमा दरों में भारी वृद्धि: जहाजों को अफ्रीका के 'केप ऑफ गुड होप' का चक्कर लगाकर जाना पड़ेगा, जिससे यात्रा समय में 10 से 14 दिन की देरी होगी और शिपिंग लागत व ईंधन खर्च में भारी बढ़ोतरी होगी।
- ऊर्जा व खाद्यान्न संकट: वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और दैनिक उपभोग की वस्तुओं के दाम आसमान छूने लगेंगे, जिससे दुनिया भर में मुद्रास्फीति बढ़ेगी।
भारत के लिए स्थिति
ऊर्जा सुरक्षा पर संकट: भारत अपनी तेल आवश्यकता का 80% से अधिक आयात करता है। मिडिल ईस्ट के दोनों प्रमुख चोकपॉइंट्स (होर्मुज और बाब-अल-मंदेब) के प्रभावित होने से तेल आपूर्ति बाधित होगी और आयात बिल अत्यधिक बढ़ जाएगा।
- व्यापारिक निर्यात प्रभावित: यूरोप, उत्तर अफ्रीका और अमेरिका को भेजे जाने वाले भारतीय कृषि उत्पादों, टेक्सटाइल तथा इंजीनियरिंग सामानों के निर्यात में लागत वृद्धि और देरी होगी।
- प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा: खाड़ी देशों में करोड़ों भारतीय कार्यरत हैं। युद्ध का विस्तार कुवैत और जॉर्डन तक होने से प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और प्रेषित धन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
विश्लेषण
सैन्य दबाव के जरिए कूटनीतिक समाधान खोजने की अमेरिकी नीति विरोधाभासी साबित हो रही है। होर्मुज के बाद बाब-अल-मंदेब का संकट में पड़ना यह दर्शाता है कि पारंपरिक युद्ध की जगह अब 'आर्थिक और लॉजिस्टिक नाकाबंदी' को हथियार बनाया जा चुका है। यदि इस गतिरोध को तुरंत नहीं रोका गया, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था एक दीर्घकालिक मंदी की चपेट में आ जाएगी।
आगे की राह -
तत्काल युद्धविराम और बहुपक्षीय कूटनीति: अमेरिका और क्षेत्रीय शक्तियों को सैन्य रणनीतियों को छोड़कर तत्काल प्रभाव से कूटनीतिक मेज पर लौटना होगा। 17 जून के समझौता ज्ञापन को आधार बनाकर पुनः वार्ता शुरू की जानी चाहिए।
- समुद्री सुरक्षा का संयुक्त तंत्र: संयुक्त राष्ट्र (UN) और अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) के तत्वावधान में बाब-अल-मंदेब और लाल सागर में तटस्थ अंतर्राष्ट्रीय नौसैनिक गश्त स्थापित की जानी चाहिए।
- भारत के लिए रणनीतिक सुझाव:
- ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण: भारत को पश्चिम एशिया पर निर्भरता कम करते हुए रूस, पश्चिम अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से कच्चे तेल का आयात बढ़ाना चाहिए।
- रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) का सुदृढ़ीकरण: घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत को अपने रणनीतिक तेल भंडारों का त्वरित और पूर्ण उपयोग सुनिश्चित करना चाहिए।
- स्वदेशी नवीकरणीय ऊर्जा: भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं से सुरक्षित भविष्य के लिए भारत को कच्चे तेल पर निर्भरता घटाकर स्वदेशी नवीकरणीय ऊर्जा (सौर, पवन एवं ग्रीन हाइड्रोजन) को तेजी से अपनाकर 'ऊर्जा-आत्मनिर्भरता' की ओर बढ़ना होगा।
- सामरिक कूटनीति: भारत को अपने ईरान, सऊदी अरब, अमेरिका और इजरायल के साथ संतुलित संबंधों का लाभ उठाकर शांति मध्यस्थ के रूप में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
- नौसेना सुरक्षा उपस्थिति: अरब सागर और अदन की खाड़ी में भारतीय मर्चेंट जहाजों की सुरक्षा के लिए 'ऑपरेशन संकल्प' के तहत भारतीय नौसेना की उपस्थिति को और मजबूत किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
पश्चिम एशिया का वर्तमान संकट अब केवल एक क्षेत्रीय विवाद न रहकर वैश्विक व्यवस्था और आपूर्ति श्रृंखला के लिए अस्तित्व का खतरा बन चुका है। सैन्य बल के बजाय त्वरित कूटनीति ही इस 'एस्केलेशन ट्रैप' से बाहर निकलने का एकमात्र व्यावहारिक मार्ग है। भारत को अपनी आर्थिक स्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने के लिए रणनीतिक स्वायत्तता, आपूर्ति विविधीकरण और सक्रिय समुद्री कूटनीति का संतुलन अपनाना होगा।
भारतीय अर्थव्यवस्था का 'कोर अपग्रेड': आठ प्रमुख उद्योगों के नए आंकड़े और उनके मायने
सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
संदर्भ
भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रमुख आंकड़ों को अधिक सटीक, अद्यतन और प्रासंगिक बनाने के लिए सांख्यिकीय तंत्र में व्यापक बदलाव किए जा रहे हैं। इसी क्रम में राष्ट्रीय खातों, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI), थोक मूल्य सूचकांक (WPI) और औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) के संशोधन के बाद, अब जून 2026 में कोर इंडस्ट्रीज सूचकांक (ICI) की नई श्रृंखला जारी की गई है। नए आधार वर्ष, नए क्षेत्रों के समावेश और संशोधित कार्यप्रणाली के साथ यह अद्यतन अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति को दर्शाने वाला एक महत्वपूर्ण कदम है।
कोर इंडस्ट्रीज सूचकांक (ICI) क्या है?
परिचय: कोर इंडस्ट्रीज सूचकांक देश के प्रमुख बुनियादी ढांचे और औद्योगिक उत्पादन की गति को मापने वाला एक महत्वपूर्ण आर्थिक संकेतक है।
- उद्देश्य: यह अर्थव्यवस्था के बुनियादी क्षेत्रों के प्रदर्शन को समय-समय पर ट्रैक करता है, जो समग्र औद्योगिक उत्पादन (IIP) की दिशा तय करते हैं।
- मंत्रालय: वर्तमान में यह सूचकांक वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के तहत आर्थिक सलाहकार कार्यालय द्वारा जारी किया जाता है।
चर्चा के कारण -
अद्यतन आधार वर्ष और नई श्रृंखला: जून 2026 के आंकड़ों को नए बेस ईयर और आधुनिक कार्यप्रणाली के आधार पर जारी किया गया है।
- क्षेत्रों की संख्या में वृद्धि (8 से 9): पुरानी श्रृंखला के 8 क्षेत्रों को बढ़ाकर अब 9 कर दिया गया है। इसमें लौह अयस्क क्षेत्र को नव-शामिल किया गया है।
- दोहरी गणना की समाप्ति: इस्पात और कोयला क्षेत्रों के मापन के तरीकों में सुधार किया गया है ताकि पहले होने वाली ओवरलैपिंग या दोहरी गणना को दूर किया जा सके।
- भार का पुनर्गठन:
- कोयला और प्राकृतिक गैस: इन दोनों क्षेत्रों का भार घटकर लगभग आधा रह गया है (कोयला: ~5.6%, प्राकृतिक गैस: ~3.8%)।
- बिजली क्षेत्र: बिजली का भार पिछली श्रृंखला के 20% से कम से बढ़कर अब 30% से अधिक हो गया है।
जून 2026 के प्रदर्शन का विश्लेषण
5% की उच्च वृद्धि: जून 2026 में सूचकांक ने 5 महीने के उच्चतम स्तर 5% की वृद्धि दर्ज की, जो दर्शाता है कि भारतीय उद्योग पश्चिम एशिया के संकट से उत्पन्न मंदी के प्रभाव को पीछे छोड़ रहा है।
- सांख्यिकीय 'बेस इफेक्ट':
- लौह अयस्क में 43.9% और बिजली क्षेत्र में 9.8% की मजबूत वृद्धि दर्ज की गई।
- हालांकि, यह तेज वृद्धि काफी हद तक पिछले वर्ष की समान अवधि में दर्ज किए गए संकुचन के कारण सांख्यिकीय 'बेस इफेक्ट' का परिणाम है।
दीर्घकालिक व्यवस्थागत चुनौतियाँ
कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस में निरंतर संकुचन: नई श्रृंखला ने पुरानी श्रृंखला की भांति देश के ऊर्जा क्षेत्र की व्यवस्थागत कमियों को उजागर किया है।
- लगातार गिरावट: कच्चा तेल पिछले 18 महीनों से और प्राकृतिक गैस पिछले 24 महीनों से लगातार संकुचित (घट) रहे हैं।
- गंभीर कमी: यदि देश के पास संसाधन मौजूद हैं और फिर भी हम उनका आर्थिक व व्यावसायिक रूप से दोहन नहीं कर पा रहे हैं, तो यह एक गंभीर नीतिगत और ढांचागत कमी को दर्शाता है।
नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बदलाव
बिजली क्षेत्र के भार में 30% से अधिक की वृद्धि यह दर्शाती है कि देश में बिजली की कुल मांग में अत्यधिक उछाल आया है।
- इसके साथ ही, यह बदलाव भारत के बिजली उत्पादन बास्केट में नवीकरणीय ऊर्जा (सौर, पवन आदि) की तेजी से बढ़ती हिस्सेदारी को भी रेखांकित करता है।
सांख्यिकीय पुनर्गठन की आवश्यकता
वर्तमान विभाजन: वर्तमान में CPI और IIP का प्रबंधन सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) करता है, जबकि WPI और ICI का प्रबंधन वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा किया जाता है।
- सुझाव: ICI और WPI के हालिया अपग्रेड को देखते हुए, यह सही समय है कि इन सभी आर्थिक सूचकांकों को एक ही छत के नीचे MoSPI में स्थानांतरित कर दिया जाए ताकि सांख्यिकीय समन्वय और सटीकता बेहतर हो सके।
विश्लेषण
कोर इंडस्ट्रीज सूचकांक की नई श्रृंखला भारतीय अर्थव्यवस्था में आ रहे संरचनात्मक बदलावों विशेष रूप से ऊर्जा क्षेत्र में बिजली और नवीकरणीय स्रोतों के बढ़ते दबदबे को सटीक रूप से दर्शाती है। हालांकि, बेस इफेक्ट से मिली 5% की वृद्धि उत्साहजनक है, लेकिन कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस उत्पादन में लगातार हो रही गिरावट हमारी घरेलू ऊर्जा सुरक्षा पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करती है।
आगे की राह
घरेलू अन्वेषण और उत्पादन (E&P) को बढ़ावा: लगातार घट रहे कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के उत्पादन को उबारने के लिए आधुनिक तकनीक, निजी निवेश और नीतिगत सुधारों के जरिए घरेलू निष्कर्षण को सुगम बनाना होगा।
- संस्थागत एकीकरण: आर्थिक आंकड़ों में एकरूपता लाने के लिए WPI और ICI को भी 'सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI)' के अंतर्गत लाया जाना चाहिए।
- ग्रिड सुधार और नवीकरणीय ऊर्जा विकास: बिजली के 30% से अधिक भार को देखते हुए ऊर्जा ग्रिड को मजबूत करना और ग्रीन एनर्जी में निवेश बढ़ाना प्राथमिकता होनी चाहिए।
- स्वदेशी नवीकरणीय ऊर्जा: भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं और आयात निर्भरता को घटाकर भारत को सौर, पवन एवं ग्रीन हाइड्रोजन के जरिए 'ऊर्जा-आत्मनिर्भरता' की ओर तेजी से बढ़ना होगा।
निष्कर्ष
ICI की नई श्रृंखला का अद्यतन भारत के आर्थिक आंकड़ों को अधिक प्रामाणिक और पारदर्शी बनाने की दिशा में एक प्रगतिशील कदम है। जहां यह अर्थव्यवस्था के मंदी से बाहर निकलने का संकेत देता है, वहीं कच्चे तेल में निरंतर गिरावट जैसे ढांचागत मुद्दों को हल करना आवश्यक है। सांख्यिकीय सुधारों के साथ-साथ यदि घरेलू संसाधनों के निष्कर्षण पर ध्यान केंद्रित किया जाए, तो भारत अपनी दीर्घकालिक औद्योगिक और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती से सुनिश्चित कर सकता है।
भारत में दुर्लभ जड़ी-बूटियों का संरक्षण : न्यूट्रास्युटिकल और पारंपरिक चिकित्सा में कुटकी का महत्व, चुनौतियाँ एवं भावी राह
सामान्य अध्ययन पेपर – III: प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
संदर्भ
भारत की प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों, विशेषकर आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी में जड़ी-बूटियों का केंद्रीय योगदान रहा है। वैश्विक स्तर पर प्राकृतिक एवं पारंपरिक दवाओं की बढ़ती मांग के कारण दुर्लभ औषधीय वनस्पतियों का संरक्षण एवं टिकाऊ दोहन एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय बन गया है। हाल ही में उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पाई जाने वाली एक अत्यंत दुर्लभ और बहुमूल्य जड़ी-बूटी कुटकी (पिक्रोरहिज़ा कुरोआ ) की टिकाऊ खेती को लेकर किए गए सफल प्रयासों ने पर्यावरणविदों, शोधकर्ताओं और नीति-निर्माताओं का ध्यान आकर्षित किया है।
पिक्रोरहिज़ा कुरोआ क्या है?
पिक्रोरहिज़ा कुरोआ, जिसे सामान्य भाषा में कुटकी कहा जाता है, प्लांटाजिनेसी कुल से संबंधित एक बारहमासी औषधीय जड़ी-बूटी है।
- प्राकृतिक आवास: यह मुख्य रूप से हिमालय के अल्पाइन और उप-अल्पाइन क्षेत्रों में 2,700 से 4,500 मीटर की ऊंचाई पर पाई जाती है।
- वानस्पतिक संरचना: यह पौधा जमीन पर रेंगने वाली पार्श्व शाखाओं के रूप में बढ़ता है, जिन्हें वैज्ञानिक भाषा में 'स्टोलन' कहा जाता है। इसमें मुख्य औषधीय गुण इसके स्टोलन (तने का एक रूप) में होते हैं, जबकि इसकी जड़ें रेशेदार होती हैं।
- स्वाद एवं प्रकृति: आयुर्वेद के अनुसार कुटकी का स्वाद तीखा (कटु) और कड़वा (तिक्त) होता है तथा यह ठंडी तासीर (शीत वीर्य) की होती है।
हालिया चर्चा के कारण
विनाशकारी कटाई पर रोक एवं टिकाऊ खेती: हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में 'हिमालयन रिसर्च ग्रुप' (HRG) के मार्गदर्शन में किसानों ने कुटकी की वैज्ञानिक व टिकाऊ खेती का सफल मॉडल विकसित किया है।
- स्टोलन तकनीक: पारंपरिक रूप से पूरे पौधे को उखाड़ने की जगह अब किसान केवल इसके पार्श्व स्टोलन को काटते हैं, जिससे मातृ पौधा जमीन में सुरक्षित रहता है और कई वर्षों तक पुनः उत्पादन देता रहता है।
- हिमालयन बायोरिसर्च मिशन: जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) के 'हिमालयन बायोरिसर्च मिशन' के तहत वर्ष 2022 से शुरू हुई इस पहल ने मंडी में 180 से अधिक किसानों को जोड़कर निजी भूमि पर इसका सबसे बड़ा कृषि क्लस्टर तैयार किया है।
- आजीविका में सुधार: वैज्ञानिक खेती के माध्यम से स्थानीय किसान प्रति वर्ष 5-6 किग्रा सूखी कुटकी बेचकर ₹15,000 से ₹16,000 की अतिरिक्त वार्षिक आय अर्जित कर रहे हैं।
भारत में जड़ी-बूटियों का महत्व
स्वास्थ्य सुरक्षा और पारंपरिक ज्ञान: भारत की 70% से अधिक ग्रामीण आबादी प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के लिए पारंपरिक जड़ी-बूटियों पर निर्भर है।
- आर्थिक एवं निर्यात क्षमता: वैश्विक हर्बल बाजार तेजी से बढ़ रहा है। भारत AYUSH (आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध, होम्योपैथी) उत्पादों के बड़े निर्यातकों में से एक है।
- जैव विविधता एवं पारिस्थितिकी संतुलन: औषधीय पौधे उच्च पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र को स्थिर रखने और मृदा अपरदन को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- न्यूट्रास्युटिकल उद्योग: आधुनिक फार्मास्यूटिकल और न्यूट्रास्युटिकल उद्योगों में पौधों से प्राप्त सक्रिय जैव-घटकों का उपयोग बढ़ रहा है।
भारत में कुटकी की स्थिति
संरक्षण स्थिति:
- आईयूसीएन रेड लिस्ट: इसे संकटग्रस्त श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है।
- कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल ट्रेड इन एंडेंजर्ड स्पीशीज (CITES): इसे परिशिष्ट II में शामिल किया गया है, जिसके तहत इसके अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए विशेष निर्यात परमिट और नियमन अनिवार्य है।
- भौगोलिक वितरण: भारत में यह जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और सिक्किम के उच्च हिमालयी भागों में प्राकृतिक रूप से उगती है।
- मुख्य ख़तरे:
- अत्यधिक और अवैज्ञानिक दोहन ।
- निवास स्थान का विनाश एवं जलवायु परिवर्तन।
- यह भ्रांति कि इसकी जड़ में औषधीय गुण होते हैं, जिसके कारण पूरा पौधा उखाड़ दिया जाता था।
कुटकी के संरक्षण एवं बचाव हेतु प्रयास
वैज्ञानिक संस्थाओं की भूमिका: DST (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग) के कोर सपोर्ट ग्रुप 'हिमालयन रिसर्च ग्रुप' (HRG) द्वारा किसानों को गैर-विनाशकारी कटाई तकनीक का प्रशिक्षण दिया गया।
- सरकारी योजनाएं: 'राष्ट्रीय औषधीय पौधा बोर्ड' (NMPB) और 'जैव प्रौद्योगिकी विभाग' (DBT) द्वारा दुर्लभ औषधीय पौधों के संरक्षण एवं इन-सिटू व एक्स-सिटू संरक्षण को बढ़ावा।
- समुदाय-आधारित कृषि: जंगली संसाधनों पर दबाव कम करने के लिए निजी कृषि भूमि पर किसानों द्वारा कुटकी का व्यावसायिक उत्पादन शुरू करना।
कुटकी के मुख्य उपयोग
यकृत संबंधी रोगों में: इसमें पाया जाने वाला मुख्य सक्रिय घटक 'पिक्रोसाइड' (पिक्रोसाइड I & II) और 'कुटकोसाइड' लिवर की सुरक्षा करता है और पीलिया तथा हेपेटाइटिस में अत्यंत प्रभावी है।
- पाचन तंत्र सुधार: यह पित्त के स्राव को बढ़ाती है, भूख में सुधार करती है और कब्ज व अपच को दूर करती है।
- बुखार और प्रतिरक्षा: पारंपरिक रूप से इसे लंबे समय से चले आ रहे बुखार (जीर्ण ज्वर) को ठीक करने और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए प्रयोग किया जाता है।
- त्वचा एवं श्वसन रोग: यह एटोपिक डर्मेटाइटिस, सोरायसिस, सोरायटिक आर्थराइटिस और दमा के उपचार में सहायक है।
भारत में जड़ी-बूटियों की खेती एवं व्यापार हेतु नियम व विनियमन
भारत में औषधीय पौधों की खेती, संग्रह और विपणन को नियंत्रित करने वाले प्रमुख कानूनी ढाँचे:
- जैविक विविधता अधिनियम, 2002:
- 'राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण' (NBA) और 'राज्य जैव विविधता बोर्ड' (SBB) के माध्यम से जैविक संसाधनों तक पहुँच और लाभ-साझाकरण (ABS) का विनियमन किया जाता है।
- राष्ट्रीय औषधीय पौधा बोर्ड (NMPB):
- आयुष मंत्रालय के तहत NMPB 'गुड एग्रीकल्चरल एंड कलेक्शन प्रैक्टिसेज' (GACP) के मानदंड निर्धारित करता है और जड़ी-बूटियों की खेती पर सब्सिडी प्रदान करता है।
- CITES एवं विदेश व्यापार नीति (EXIM Policy):
- CITES परिशिष्ट II के तहत सूचीबद्ध कुटकी जैसी वनस्पतियों के निर्यात के लिए वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (WCCB) और DGFT से कानूनी खरीद प्रमाण पत्र प्राप्त करना अनिवार्य है।
- भारतीय वन अधिनियम, 1927 एवं राज्य वन कानून:
- आरक्षित वन क्षेत्रों से दुर्लभ जड़ी-बूटियों को बिना अनुमति उखाड़ना या एकत्र करना दंडनीय अपराध है।
ऐतिहासिक संदर्भ
वैदिक एवं आयुर्वेदिक काल: चरक संहिता और सुश्रुत संहिता जैसे प्राचीन ग्रन्थों में कुटकी का उल्लेख 'तिक्त वर्ग' की प्रमुख औषधियों में किया गया है।
- पारंपरिक उपभोग: हिमालयी क्षेत्रों के स्थानीय निवासी शताब्दियों से पेट दर्द, बुखार और संक्रमण के इलाज के लिए जंगली कुटकी का संचयन और उपयोग करते आ रहे हैं।
- व्यावसायिक दोहन का दौर: 20वीं सदी के उत्तरार्ध में आधुनिक हर्बल और एलोपैथिक उद्योगों द्वारा इसकी भारी मांग के कारण इसका अनियंत्रित दोहन हुआ, जिससे यह विलुप्ति की कगार पर पहुंच गई।
विश्लेषण
- सकारात्मक पक्ष:
- प्राकृतिक जंगलों से निर्भरता हटकर निजी भूमि पर खेती होने से जंगली प्रजाति के संरक्षण को बल मिलता है।
- 'स्टोलन विधि' ने पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक लाभ के बीच संतुलन स्थापित किया है।
- चुनौतियाँ:
- लंबे समय का चक्र: कुटकी को परिपक्व होने में 3 से 4 वर्ष का समय लगता है, जिससे छोटे किसानों के लिए तत्काल आय का साधन बनना कठिन होता है।
- गुणवत्ता नियंत्रण एवं मूल्य संवर्धन: किसानों को सीधे बाजार या फार्मा कंपनियों से उचित मूल्य न मिलना और बिचौलियों का प्रभाव।
- जलवायु परिवर्तन: ग्लोबल वार्मिंग के कारण उच्च हिमालयी क्षेत्रों के तापमान में बदलाव इसकी प्राकृतिक वृद्धि को प्रभावित कर रहा है।
भावी राह
जी-ए-सी-पी (GACP) का विस्तार: किसानों को 'अच्छी कृषि और संग्रह प्रथाओं' के बारे में जागरूक किया जाए ताकि औषधि की गुणवत्ता अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनी रहे।
- बाज़ार लिंक और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP): जड़ी-बूटियों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य या पारदर्शी बायबैक तंत्र की स्थापना की जाए, जिससे किसानों को निश्चित आय की गारंटी मिले।
- टिश्यू कल्चर और अनुसंधान: उच्च गुणवत्ता वाले बीजों और रोपण सामग्री की आपूर्ति हेतु बायोटेक्नोलॉजी का अधिक उपयोग किया जाए।
- क्लस्टर आधारित खेती: उच्च हिमालयी राज्यों (हिमाचल, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर) में कुटकी के लिए विशेष 'औषधीय पौधा क्लस्टर' विकसित किए जाने चाहिए।
निष्कर्ष
कुटकी की वैज्ञानिक एवं टिकाऊ खेती केवल एक लुप्तप्राय वनस्पति को बचाने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह पारिस्थितिक संरक्षण और ग्रामीण आजीविका के बीच एक आदर्श संतुलन का उत्कृष्ट उदाहरण है। 'स्टोलन विधि' जैसी पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों और समुदाय-आधारित भागीदारी के माध्यम से यह सिद्ध हो गया है कि बिना प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहुँचाए भी आर्थिक समृद्धि प्राप्त की जा सकती है। यदि इस मॉडल को अन्य संकटग्रस्त औषधीय पौधों पर भी लागू किया जाए और किसानों को बेहतर बाज़ार संपर्क तथा नीतिगत संरक्षण प्रदान किया जाए, तो भारत अपनी पारंपरिक ज्ञान संपदा को सुरक्षित रखते हुए वैश्विक हर्बल एवं न्यूट्रास्युटिकल क्षेत्र में एक अग्रणी वैश्विक शक्ति के रूप में उभर सकता है।