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सुधार 3.0: भारत की विकास दर को नई गति, एआई (AI) का युग

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।

संदर्भ

भारत ने स्वतंत्रता के बाद के दशकों में अपनी आर्थिक नीतियों में कई महत्वपूर्ण बदलाव देखे हैं। आज, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) उसी प्रकार कापरिवर्तनकारी उत्प्रेरकप्रदान कर रही है, जैसा 1991 के उदारीकरण ने प्रदान किया था। एआई के युग में, सवाल यह नहीं है कि क्या भारत इसमें निवेश कर सकता है, बल्कि यह है कि क्या भारत इसमें निवेश करने का जोखिम उठा सकता है।

'हिंदू विकास दर' से आगे की यात्रा

स्वतंत्रता के 45 वर्षों तक भारत की विकास दर लगभग 3% के आसपास सिमटी रही, जिसे व्यंग्यात्मक रूप से "हिंदू विकास दर" कहा जाता था। 991 के भुगतान संतुलन संकट के बाद भारत ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के मार्ग को अपनाया, जिसके परिणामस्वरूप आर्थिक विकास दर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। यह इतिहास का सबक है कि संकट सुधारों को जन्म देते हैं और सुधार घातीय परिणाम लाते हैं। पिछले एक दशक से अधिक के नीतिगत सुधारों और प्रशासनिक निरंतरता के बाद, भारत सुधारों के एक नएमहत्वपूर्ण मोड़पर खड़ा है, जहाँ लक्ष्य 8% से अधिक की 'भारत विकास दर' हासिल करना है।

चर्चा के कारण: वर्तमान परिदृश्य

वर्तमान में एआई क्रांति के दौरान भारत के लिए अवसर का मुख्य कारण डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचा (DPI) है:

  • आधार: 1.38 बिलियन लोगों को बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली से जोड़ना.
  • यूपीआई (UPI): 3.4 ट्रिलियन डॉलर के वार्षिक लेनदेन के साथ दुनिया का 50% रीयल-टाइम डिजिटल भुगतान संभालना।
  • ब्रॉडबैंड एवं इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियाँ: मोबाइल इंटरनेट को अत्यंत सुलभ एवं किफायती बनाकर डेटा उपयोग में अभूतपूर्व वृद्धि करना, जिसने एआई के लिए आधार तैयार किया है।

टोकन को मुफ्त बनाने का मामला

भारत आरएंडडी (R&D) पर जीडीपी का मात्र 0.65% खर्च करता है, जो चीन (2.4%) और अमेरिका (3.5%) से काफी कम है। वैज्ञानिकों और छात्रों के लिए एआई को सुलभ बनाने हेतु 'एआई टोकन' को मुफ्त करना आवश्यक है।

  • भारत सालाना सब्सिडी (कैलोरी, रसायन, कार्बन) पर 49 बिलियन डॉलर खर्च करता है।
  • एआई टोकन सब्सिडी के लिए मात्र 2 बिलियन डॉलर (जीडीपी का 0.06%) की आवश्यकता होगी, जो खाद्य या उर्वरक सब्सिडी के अनुपात में बहुत कम है। यह कोई 'मूनशॉट' बजट नहीं है, बल्कि एक राउंडिंग एरर है जो भविष्य में परिवर्तनकारी रिटर्न दे सकता है।

होस्टिंग मॉडल

भारत को केवल एआई का उपभोक्ता नहीं, बल्कि निर्माता बनना होगा।

  • संप्रभु बुनियादी ढांचा: भारत को सर्वम (Sarvam) जैसे मॉडलों के साथ स्वदेशी बुनियादी ढांचे पर क्वेन (Qwen), लामा (Llama) जैसे मॉडलों को होस्ट करना चाहिए।
  • हाइब्रिड रणनीति: संप्रभु और ओपन-सोर्स मॉडलों का मिश्रण अपनाना ताकि किसी एक इकोसिस्टम पर निर्भरता रहे। ओपन-सोर्स मॉडल से संप्रभुता, कम लागत और इंडिक भाषाओं का अनुकूलन संभव होगा।

एआई टोकन नीति और कार्यान्वयन समयरेखा

भारत को अगले 24 महीनों में 'राष्ट्रीय एआई टोकन नीति' लागू करनी चाहिए:

  • चरण 1: एडब्ल्यूएस (AWS), गूगल और माइक्रोसॉफ्ट के साथ सार्वजनिक-निजी साझेदारी (PPP) के माध्यम से संप्रभु कंप्यूट ढांचा।
  • चरण 2: आईआईटी और आईआईएससी के लिए अनलिमिटेड टोकन, स्टार्टअप्स के लिए एपीआई सैंडबॉक्स, और 500 स्कूलों में एआई साक्षरता पायलट।
  • चरण 3: स्वास्थ्य, कृषि और शिक्षा में फाइन-ट्यून मॉडल की तैनाती और 5,000 स्कूलों में पूर्ण कार्यान्वयन।

अन्य महत्वपूर्ण बिंदु

  • हार्डवेयर मिक्स: भारत को केवल एनवीआईडीआईए (NVIDIA) पर निर्भर रहकर 40:30:30 का हार्डवेयर अनुपात अपनाना चाहिए (40% एडब्ल्यूएस/एएमडी, 30% गूगल टीपीयू, 30% एनवीआईडीआईए)

  • अनुपालन और सुरक्षा: एआई मॉडल होस्टिंग के लिए उच्च उपलब्धता, लेटेंसी (200 मिलीसेकंड से कम), डेटा स्थानीयकरण (रेज़िडेंसी) अनुपालन, ऑडिट ट्रेल तथा साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में गहन तकनीकी विशेषज्ञता विकसित करना अनिवार्य होगा।

विश्लेषण

भारत का एआई मॉडल वित्तीय रूप से व्यवहार्य है क्योंकि यह मौजूदा सब्सिडी के पुनर्गठन से वित्तपोषित हो सकता है। यह 'डेटा को मुफ्त बनाने' की रणनीति का ही अगला चरण है, जहाँ बाजार को सही दिशा देने से प्रचुरता स्वतः उत्पन्न होगी। भारत के पास नीतियां, प्रतिभा और ढांचा मौजूद है, बस इसे एक 'रणनीतिक राष्ट्रीय क्षमता' के रूप में देखने की आवश्यकता है।

आगे की राह

  • नीतिगत नेतृत्व: भारत को निर्णायक और दूरदर्शी नेतृत्व के साथ 24 महीने का एक रोडमैप लागू करना चाहिए।

  • निजी क्षेत्र का एकीकरण: हाइपरस्केलर्स के साथ डेटा सेंटर, बिजली सब्सिडी और डेटा संप्रभुता पर आधारित तकनीक-व्यावसायिक बातचीत करनी चाहिए।
  • स्वदेशी बेंचमार्क: देश के पहले संप्रभु 'इंडिक एआई मॉडल बेंचमार्क' का प्रकाशन करना।
  • कौशल विकास: 22 अनुसूचित भाषाओं में एआई मॉडल विकसित करते हुए 5,000 से अधिक विद्यालयों में एआई साक्षरता का विस्तार तथा एआई-नेटिव स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन देना।


निष्कर्ष

भारत की एआई छलांग राष्ट्रीय परिवर्तन के लिए एक 'अनिवार्य शर्त' है। एक दशक की दूरदर्शी रणनीति तथा तीन प्रमुख सुधार एआई टोकनों की व्यापक उपलब्धता, संप्रभु एआई अवसंरचना का निर्माण और हार्डवेयर विविधीकरण भारत को कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित वैश्विक अग्रणी राष्ट्र के रूप में स्थापित कर सकते हैं।

भारतीय औद्योगिक प्रदर्शन: मंदी से सुधार की ओर एक विश्लेषणात्मक यात्रा

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।

संदर्भ

बीती कुछ तिमाहियों में भारतीय औद्योगिक क्षेत्र ने उतार-चढ़ाव भरी स्थिति का सामना किया है। वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितताओं, उच्च मुद्रास्फीति के दबाव और आपूर्ति-श्रृंखला में आई बाधाओं ने विकास की गति को प्रभावित किया था। विशेष रूप से विनिर्माण क्षेत्र में सुस्ती और निवेश चक्र में रही देरी ने औद्योगिक उत्पादन पर दबाव बनाए रखा। हालांकि, अब सांख्यिकी संकेतकों में सुधार के साथ यह स्पष्ट हो रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था अपनी आंतरिक मांग और बिजली जैसे प्रमुख क्षेत्रों की मजबूती के सहारे पुनरुद्धार की दिशा में अग्रसर है।

समाचार बिंदु

  • वृद्धि का स्तर: मई 2026 में औद्योगिक गतिविधियों में वृद्धि पांच महीने के उच्चतम स्तर 5.1% पर दर्ज की गई है।

  • आंकड़े जारीकर्ता: ये आधिकारिक आंकड़े 'सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय' (MoSPI) द्वारा जारी किए गए हैं।
  • आधार वर्ष में परिवर्तन: सरकार ने IIP की नई श्रृंखला में संशोधन किया है, जिसे पहली बार 1 जून 2026 को जारी किया गया था।
  • अद्यतन: नई श्रृंखला का आधार वर्ष अब 2022-23 है और इसमें नए डेटा स्रोतों को समाहित किया गया है।
  • नीतिगत बदलाव: सरकार ने IIP मापन में 'थोक मूल्य सूचकांक' (WPI) के स्थान पर 'उत्पादक मूल्य सूचकांक' (PPI) को अपनाने का निर्णय लिया है।
  • आदेश: 1 जून 2026 को जारी PPI-आधारित IIP श्रृंखला को ही अब विश्लेषणात्मक और नीतिगत उद्देश्यों के लिए उपयोग करने की सलाह दी गई है।

क्षेत्रवार प्रदर्शन

मई 2026 के आंकड़ों के अनुसार, विभिन्न क्षेत्रों में वृद्धि और गिरावट का विवरण निम्नवत है:

  • वृद्धि दर्ज करने वाले क्षेत्र:
    • बिजली और गैस आपूर्ति: 9.9% की वृद्धि (दो वर्षों का उच्चतम स्तर)
    • उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुएं: 7.2% की वृद्धि।
    • विनिर्माण: 5.5% की वृद्धि।
    • उपभोक्ता गैर-टिकाऊ वस्तुएं: 3.6% की वृद्धि।
  • गिरावट दर्ज करने वाले क्षेत्र:
    • खनन और उत्खनन: 1.6% की गिरावट (लगातार पांचवें महीने संकुचन)

प्रासंगिकता एवं महत्व

  • आर्थिक नीति निर्धारण: यह औद्योगिक लचीलेपन और मांग की स्थिति को समझने में मदद करता है।

  • डेटा सटीकता: WPI के स्थान पर PPI को अपनाने से मूल्य-आधारित आउटपुट का अधिक सटीक मापन संभव होगा।
  • निवेशक विश्वास: टिकाऊ वस्तुओं में मांग का सुधार विदेशी और घरेलू निवेशकों के लिए सकारात्मक संकेत है।

विश्लेषण

मई 2026 के आंकड़े भारतीय औद्योगिक क्षेत्र की मजबूती को दर्शाते हैं, जहाँ बिजली और उपभोक्ता मांग में वृद्धि देखी गई है। हालांकि, विनिर्माण क्षेत्र में अप्रैल (6.1%) की तुलना में मई (5.5%) में वृद्धि की गति धीमी हुई है, जो चिंता का विषय है। इसके अतिरिक्त, खनन क्षेत्र में लगातार पांच महीनों का संकुचन आपूर्ति-श्रृंखला और संरचनात्मक चुनौतियों की ओर इशारा करता है।

आगे की राह

  • खनन सुधार: खनन और उत्खनन में संकुचन को समाप्त करने हेतु नीतिगत बाधाओं को दूर करना आवश्यक है।

  • विनिर्माण प्रोत्साहन: विनिर्माण क्षेत्र में 'ऑटो' और 'इलेक्ट्रॉनिक्स' की गति को बनाए रखने के लिए निवेश को बढ़ावा देना चाहिए।
  • ऊर्जा दक्षता: मानसून की देरी और उच्च तापमान के कारण बिजली की मांग में वृद्धि हुई है; अतः प्रभावी ऊर्जा प्रबंधन अनिवार्य है।
  • तकनीकी अनुकूलन: PPI आधारित नई श्रृंखला के लिए उद्योग जगत को अधिक पारदर्शिता और प्रशिक्षण प्रदान किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

मई 2026 के औद्योगिक आंकड़े भारतीय अर्थव्यवस्था की लचीली विकास गाथा को उजागर करते हैं। सरकार द्वारा IIP श्रृंखला में किया गया आधुनिकीकरण डेटा की गुणवत्ता को वैश्विक मानकों के अनुरूप लाने की दिशा में एक निर्णायक कदम है। यदि खनन क्षेत्र की सुस्ती को दूर किया जा सके और उपभोक्ता मांग की इस गति को बरकरार रखा जाए, तो भारतीय अर्थव्यवस्था आने वाली तिमाहियों में एक संतुलित और समावेशी विकास पथ पर बनी रहेगी।


सफेद-पृष्ठ गिद्धों का संरक्षण: एक अनिश्चित भविष्य और चुनौतियां

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।

संदर्भ

सफेद-पृष्ठ गिद्ध कभी भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे अधिक पाए जाने वाले बड़े पक्षी थे, लेकिन 1990 के दशक के बाद 'डाइक्लोफेनाक' जैसी दर्द निवारक दवाओं के पशु-चिकित्सा में उपयोग से इनकी आबादी में 99% से अधिक की गिरावट आई है। यद्यपि भारत में संरक्षण प्रयासों के तहत 'कैप्टिव-ब्रीडिंग' (कैद में प्रजनन) के माध्यम से इन्हें पुनर्जीवित करने का प्रयास किया गया है, लेकिन हालिया घटनाओं ने इन प्रयासों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। हाल ही में मुदुमलाई टाइगर रिजर्व (MTR) में छोड़े गए एक रेडियो-टैग किए गए गिद्ध की बिजली के तार से टकराव से मृत्यु, इन लुप्तप्राय प्रजातियों के पुनरुद्धार की राह में रही बुनियादी बाधाओं को उजागर करती है।

सफेद-पृष्ठ गिद्ध:

  • प्रकृति: यह 'ओल्ड वर्ल्ड' गिद्धों की प्रजाति है जो पारिस्थितिकी तंत्र के 'स्वच्छता प्रहरी' के रूप में मृत शवों का निपटान कर रोगों के प्रसार को रोकती है।

  • संरक्षण स्थिति:
    • IUCN रेड लिस्ट: गंभीर रूप से लुप्तप्राय (Critically Endangered)
    • वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972: अनुसूची-I
    • CITES: परिशिष्ट-II (Appendix II)
  • आवास: भारत में इनकी आबादी अत्यंत सीमित रह गई है और यह मुख्यतः कुछ संरक्षित क्षेत्रों एवं 'गिद्ध सुरक्षित परिदृश्यों' में पाई जाती है।

हालिया घटना:

  • यह गिद्ध दिसंबर 2025 में ताडोबा-अंधारी टाइगर रिजर्व में छोड़ा गया था, बाद में कर्नाटक में बीमार मिलने पर उपचार किया गया।

  • तदुपरांत, BNHS और वन विभागों के सहयोग से इसे MTR में पुनर्स्थापित किया गया।
  • पक्षी क्षेत्र के अनुकूल ढलने में असमर्थ रहा और 'खोजपूर्ण उड़ानों' के दौरान एब्बनाड के पास बिजली के तारों के संपर्क में आने से इसकी मृत्यु हो गई।

पर्यावरणीय महत्व

  • गिद्ध मृत पशुओं के शवों को खाकर प्राकृतिक रूप से 'एंथ्रेक्स' और 'रेबीज' जैसे संक्रामक रोगों के संचरण को रोकते हैं। पारिस्थितिकी तंत्र में इनकी उपस्थिति स्वच्छता और जैविक नियंत्रण के लिए अनिवार्य है।

कानूनी ढांचा और संरक्षण नीतियां

विद्युत अवसंरचना के लिए कोई विशिष्ट राष्ट्रीय कानून होने के बावजूद, न्यायालयों के निर्देशों एवं तकनीकी दिशानिर्देशों के तहत लाइनों को 'पक्षी-अनुकूल'बनाना अनिवार्य है। हालांकि, इनका प्रभावी क्रियान्वयन अभी भी एक चुनौती है।

गिद्ध संरक्षण: विधिक एवं नीतिगत ढांचा

  • राष्ट्रीय विधिक ढांचा

  • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972: सभी गिद्ध प्रजातियाँ अनुसूची-I के अंतर्गत संरक्षित हैं, जो इनके शिकार या नुकसान पहुँचाने पर कठोर कारावास एवं जुर्माने का प्रावधान करती है।
  • गिद्ध संरक्षण कार्य योजना (2020–2025): इसका उद्देश्य गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र (Vulture Safe Zones) विकसित करना, गिद्ध-विषैले NSAIDs (जैसे डाइक्लोफेनाक) के उपयोग को न्यूनतम करना तथा सुरक्षित विकल्पों को बढ़ावा देना है।
  • विद्युत अवसंरचना दिशानिर्देश: MoEFCC एवं CEA द्वारा जारी तकनीकी दिशानिर्देशों के अनुसार, गिद्धों के संचरण वाले संवेदनशील क्षेत्रों में बिजली लाइनों को पक्षी-अनुकूल बनाने, 'बर्ड फ्लाइट डाइवर्टर' लगाने तथा विद्युत जोखिम को कम करने की अनुशंसा की गई है।
  • दवा नियामक निर्देश: भारतीय औषध महानियंत्रक (DCGI) ने पशु-चिकित्सा में डाइक्लोफेनाक पर प्रतिबंध लगा दिया है और मेलोक्सिकैम (Meloxicam) जैसे सुरक्षित विकल्पों को प्राथमिकता दी है।
  • अंतर्राष्ट्रीय विधिक ढांचा
  • CITES: परिशिष्ट-II (Appendix II) में सूचीबद्ध, जो इनके अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को कड़ाई से नियंत्रित करता है।
  • CMS (बॉन कन्वेंशन): यह बहुपक्षीय सहयोग तथा गिद्ध बहु-प्रजाति कार्ययोजना (MsAP) के माध्यम से गिद्धों के संरक्षण हेतु समन्वित प्रयासों को बढ़ावा देता है।
  • IUCN: इस प्रजाति को 'गंभीर रूप से लुप्तप्राय' के रूप में वर्गीकृत कर वैश्विक संरक्षण प्राथमिकताओं में शामिल करता है।
  • विशेष सुरक्षा उपाय
  • गिद्ध सुरक्षित परिदृश्य: गिद्धों के आवासीय परिदृश्य में डाइक्लोफेनाक-मुक्त एवं सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करना।
  • प्रवर्तन: वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (WCCB) द्वारा अवैध वन्यजीव व्यापार एवं संबंधित अपराधों के विरुद्ध प्रवर्तन में सहयोग प्रदान करना।

विश्लेषण

सफेद-पृष्ठ गिद्ध की मृत्यु वैज्ञानिक प्रयासों की सीमाओं को दर्शाती है। पुनर्परिचय के लिए केवल प्रजनन पर्याप्त नहीं है; जीवों का 'अनुकूलन' और उस क्षेत्र के जोखिमों (जैसे बिजली लाइन) का मानचित्रण करना अनिवार्य है। यह घटना संरक्षण नीतियों में 'निगरानी और तकनीकी हस्तक्षेप' की कमी को उजागर करती है।

आगे की राह

  • तकनीकी हस्तक्षेप: जोखिम वाले क्षेत्रों में 'बर्ड फ्लाइट डाइवर्टर' लगाना, पावर लाइनों का इंसुलेशन करना और जहाँ संभव हो, भूमिगत केबलिंग करना।

  • जोखिम मानचित्रण: गिद्धों के आवागमन वाले क्षेत्रों का वैज्ञानिक मानचित्रण करना।
  • समुदाय सहभागिता: स्थानीय समुदायों को 'प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली' का हिस्सा बनाना।


निष्कर्ष

सफेद-पृष्ठ गिद्ध का खोना संरक्षण प्रयासों के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यदि हमें इन 'पारिस्थितिकी तंत्र के स्वच्छता प्रहरियों' को विलुप्त होने से बचाना है, तो प्रजनन से आगे बढ़कर उनके प्राकृतिक आवासों को घातक बुनियादी ढांचे से मुक्त करना होगा। भविष्य की संरक्षण नीतियों को अधिक सतर्क, तकनीक-संचालित और सहयोगात्मक होने की आवश्यकता है ताकि ऐसी दुखद पुनरावृत्ति को रोका जा सके।

चीन की मिसाइल चुनौती: भारत की रणनीतिक तैयारी और भविष्य की दिशा

सामान्य अध्ययन पेपरIII:  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।


संदर्भ

आधुनिक युद्ध का स्वरूप तीव्र गति से परिवर्तित हो रहा है। परंपरागत युद्धों की तुलना में आज मिसाइलें कम समय में अधिक विनाशकारी प्रभाव उत्पन्न करने, राजनीतिक दबाव बनाने तथा विरोधी देश की सैन्य एवं आर्थिक क्षमता को बाधित करने का प्रभावी साधन बन चुकी हैं। सीमित स्तर का पारंपरिक मिसाइल हमला भी किसी देश के सैन्य अड्डों, संचार नेटवर्क, ऊर्जा अवसंरचना तथा निर्णय-निर्माण प्रणाली को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। ऐसे परिदृश्य में चीन की निरंतर विकसित होती मिसाइल क्षमता भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण सामरिक चुनौती बनकर उभरी है।

चीन की मिसाइल क्षमता और उसकी रणनीति

विभिन्न सामरिक अध्ययनों एवं रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, चीन ने अपने पश्चिमी थिएटर कमांड के अंतर्गत भारत की दिशा में पर्याप्त पारंपरिक मिसाइल क्षमताएँ विकसित की हैं। चीन की रणनीति केवल परमाणु प्रतिरोध तक सीमित नहीं है, बल्कि वह पारंपरिक मिसाइलों को राजनीतिक दबाव, सैन्य प्रतिरोध तथा सीमित युद्ध के प्रभावी साधन के रूप में देखता है।

    चीन के मिसाइल शस्त्रागार में DF-15B, DF-16, DF-21C तथा DF-26 जैसी बैलिस्टिक मिसाइलें शामिल हैं। इनमें कम दूरी की मिसाइलें सीमावर्ती सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने में सक्षम हैं, जबकि DF-26 जैसी मध्यम दूरी की मिसाइलें भारत के भीतर स्थित रणनीतिक एवं उच्च-मूल्य वाले लक्ष्यों तक पहुँच सकती हैं। इसके अतिरिक्त, चीन उच्च गति एवं हाइपरसोनिक प्रक्षेपास्त्र प्रौद्योगिकी के विकास पर भी तेजी से कार्य कर रहा है, जिससे भविष्य के युद्धों में उसकी आक्रामक क्षमता और अधिक बढ़ सकती है।

भारत के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ

  • भौगोलिक चुनौती: हिमालय लंबे समय तक भारत की प्राकृतिक सुरक्षा ढाल माना जाता रहा है, किन्तु तिब्बती पठार पर चीन की सैन्य अवसंरचना के विस्तार ने उसे महत्वपूर्ण सामरिक लाभ प्रदान किया है। इससे चीन अपेक्षाकृत कम समय में मिसाइल संचालन करने की स्थिति में है, जबकि भारत के लिए प्रतिक्रिया का समय सीमित हो सकता है।

  • तकनीकी चुनौतियाँ: भारत ने अग्नि श्रृंखला, ब्रह्मोस, प्रलय, निर्भय तथा अन्य स्वदेशी मिसाइल प्रणालियों के विकास में उल्लेखनीय प्रगति की है, फिर भी लंबी दूरी की पारंपरिक स्ट्राइक क्षमता, रीयल-टाइम लक्ष्यीकरण तथा नेटवर्क-केंद्रित मिसाइल संचालन को और अधिक सुदृढ़ करने की आवश्यकता बनी हुई है। हाइपरसोनिक प्रौद्योगिकी भी अभी विकास के चरण में है।
  • संस्थागत चुनौती: भारत के पास स्ट्रैटेजिक फोर्सेज़ कमांड जैसी संस्थागत व्यवस्था है, किन्तु चीन की PLA रॉकेट फोर्स के समान पारंपरिक मिसाइल संचालन हेतु समर्पित रॉकेट फोर्स अभी विकसित नहीं हुई है। इससे विभिन्न मिसाइल प्रणालियों के समन्वित संचालन की चुनौती बनी रहती है।

क्या भारत को समर्पित रॉकेट फोर्स की आवश्यकता है?

कई रक्षा विशेषज्ञों का मत है कि बदलते सुरक्षा परिवेश में भारत को एक समर्पित पारंपरिक रॉकेट फोर्स स्थापित करने पर विचार करना चाहिए। इसका उद्देश्य युद्ध के दौरान एकीकृत कमान के अंतर्गत लंबी दूरी के सटीक प्रहार की क्षमता विकसित करना होगा।

ऐसी रॉकेट फोर्स के प्रमुख उद्देश्य हो सकते हैं

  • पश्चिमी थिएटर कमांड के महत्वपूर्ण सैन्य एवं रसद प्रतिष्ठानों को विश्वसनीय जोखिम में डालना।
  • सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़कों, रेलमार्गों, एयरबेस तथा रसद नेटवर्क जैसी सैन्य अवसंरचना को आवश्यकता पड़ने पर निष्क्रिय करने की क्षमता विकसित करना।
  • युद्ध क्षेत्र में दुश्मन के कमांड सेंटर, गोला-बारूद भंडार तथा सैन्य ठिकानों पर सटीक प्रहार करना।

भारत की रणनीतिक तैयारी:

  • सैद्धांतिक स्तर: भारत को बदलते सुरक्षा वातावरण के अनुरूप अपने पारंपरिक मिसाइल सिद्धांत का समय-समय पर पुनर्मूल्यांकन करना चाहिए। उच्च-मूल्य वाले सैन्य एवं सामरिक लक्ष्यों के विरुद्ध सटीक प्रहार की क्षमता विकसित करने के साथ-साथ एकीकृत लक्ष्य सूची, त्वरित निर्णय प्रणाली तथा संयुक्त परिचालन सिद्धांत विकसित किए जाने चाहिए।

  • संरचनात्मक स्तर: यदि भविष्य में समर्पित रॉकेट फोर्स का गठन किया जाता है, तो उसे चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) के समन्वित नेतृत्व में संचालित किया जा सकता है, जिससे तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल स्थापित हो सके। साथ ही मध्यम एवं लंबी दूरी की पारंपरिक मिसाइलों की संख्या और विविधता में भी वृद्धि आवश्यक होगी।
  • तकनीकी स्तर: रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) तथा निजी रक्षा उद्योग के सहयोग से निम्न क्षेत्रों में निवेश बढ़ाना आवश्यक है
  • हाइपरसोनिक प्रौद्योगिकी
  • उन्नत प्रणोदन प्रणाली
  • सेमीकंडक्टर निर्माण
  • उच्च-ग्रेड सामरिक सामग्री
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित लक्ष्यीकरण
  • स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक एवं सेंसर प्रणालियाँ

इससे विदेशी निर्भरता कम होगी तथा रक्षा आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा।

अंतरिम रणनीतिक उपाय

जब तक भारत अपनी दीर्घकालिक मिसाइल क्षमता को पूर्ण रूप से विकसित नहीं कर लेता, तब तक कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं

  • भारतीय वायुसेना के एयरबेसों का विकेंद्रीकरण एवं सुरक्षा सुदृढ़ करना।
  • बहुस्तरीय वायु एवं मिसाइल रक्षा प्रणाली का विस्तार।
  • लंबी दूरी की पारंपरिक स्ट्राइक क्षमता में वृद्धि।
  • उपग्रह आधारित निगरानी तथा रीयल-टाइम खुफिया तंत्र को मजबूत करना।
  • साइबर एवं इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं का विस्तार।
  • अंतरिक्ष आधारित प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली विकसित करना।

विश्लेषण

  • भारत और चीन के बीच सैन्य प्रतिस्पर्धा केवल सैनिक संख्या या सीमा विवाद तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह अब दीर्घ दूरी की प्रहार क्षमता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष निगरानी, साइबर युद्ध तथा मिसाइल प्रतिरोध जैसे नए आयामों तक पहुँच चुकी है।
  • भारत ने पिछले वर्षों में ब्रह्मोस, अग्नि श्रृंखला, प्रलय, आकाश, एस-400, बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस कार्यक्रम तथा डिफेंस स्पेस एजेंसी जैसी पहलों के माध्यम से अपनी सामरिक क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि की है। फिर भी भविष्य के युद्धों की प्रकृति को देखते हुए मिसाइल बलों के बेहतर एकीकरण, त्वरित लक्ष्यीकरण, नेटवर्क-केंद्रित युद्ध प्रणाली तथा स्वदेशी रक्षा प्रौद्योगिकी में और अधिक निवेश की आवश्यकता बनी हुई है।
  • साथ ही यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि केवल सैन्य शक्ति ही पर्याप्त नहीं होती। प्रभावी कूटनीति, आर्थिक क्षमता, तकनीकी नवाचार, बहुपक्षीय साझेदारियाँ तथा आत्मनिर्भर रक्षा उद्योग भी राष्ट्रीय सुरक्षा के समान रूप से महत्वपूर्ण स्तंभ हैं।

निष्कर्ष

चीन की बढ़ती मिसाइल क्षमता भारत के समक्ष एक जटिल एवं बहुआयामी सामरिक चुनौती प्रस्तुत करती है। बदलते वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य में केवल पारंपरिक सैन्य शक्ति पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। भारत को एक समन्वित रक्षा रणनीति अपनाते हुए मिसाइल क्षमता, वायु एवं मिसाइल रक्षा, अंतरिक्ष निगरानी, साइबर सुरक्षा, स्वदेशी रक्षा विनिर्माण तथा संयुक्त सैन्य कमान को समानांतर रूप से सुदृढ़ करना होगा। विश्वसनीय प्रतिरोध रणनीतिक स्वायत्तता और क्षेत्रीय स्थिरता के संतुलन पर आधारित यही व्यापक दृष्टिकोण भारत की दीर्घकालिक राष्ट्रीय सुरक्षा को अधिक सुदृढ़ बना सकता है।