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सामान्य अध्ययन पेपर–III: प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
संदर्भ
भारत अपनी नेविगेशन प्रणाली NavIC (भारतीय नक्षत्र आधारित नौवहन प्रणाली) को वैश्विक मानकों के अनुरूप उन्नत करने के लिए 'NVS' श्रृंखला के उपग्रहों का प्रक्षेपण कर रहा है। NVS-02 इस श्रृंखला का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मिशन था, जो भारत की सामरिक और नागरिक नेविगेशन क्षमताओं को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए डिज़ाइन किया गया था।
NVS-02 मिशन: NVS-02 दूसरी पीढ़ी का पहला प्रमुख नेविगेशन उपग्रह था।
- प्रक्षेपण तिथि: 29 जनवरी, 2025।
- प्रक्षेपण यान: GSLV (भू-समकालिक उपग्रह प्रक्षेपण यान)।
- भार: लगभग 2,232 किलोग्राम।
- कक्षा (ऑर्बिट): इसे 'जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट' (GTO) में स्थापित किया जाना था, जहाँ से इसे अपनी अंतिम भू-स्थैतिक कक्षा में पहुँचना था।
NVS-02 की तकनीकी विशेषताएँ: इस मिशन में कई ऐसी तकनीकें थीं जो इसे पहली पीढ़ी से अलग बनाती थीं:
- स्वदेशी रूबिडियम परमाणु घड़ी: इसमें भारत में विकसित परमाणु घड़ी का उपयोग किया गया था, जो सटीक समय की गणना के लिए अनिवार्य है।
- L1 बैंड सिग्नल: पहली बार इसमें L1 बैंड सिग्नल शामिल किया गया था, जो नागरिक उपयोग और स्मार्टफोन में नेविगेशन को आसान बनाने के लिए वैश्विक स्तर पर मानक है।
- दीर्घायु: इस उपग्रह का जीवनकाल 12 वर्ष से अधिक निर्धारित किया गया था।
चर्चा में क्यों:
- यह विषय वर्तमान में चर्चा का केंद्र इसलिए है क्योंकि इसरो ने मिशन की विफलता के लगभग एक वर्ष पश्चात इस पर अपनी चुप्पी तोड़ी है।
- संस्थान ने एक तकनीकी समिति की रिपोर्ट और प्रेस वक्तव्य जारी किया है, जो NVS-02 के अपनी निर्धारित कक्षा प्राप्त न कर पाने के कारणों का विश्लेषण करता है।
- यह विलंबित प्रकटीकरण संस्थान की 'अपारदर्शिता' पर उठ रहे सवालों के बीच 'सार्वजनिक विश्वास' को पुनः प्राप्त करने का एक प्रयास माना जा रहा है।
NVS-02 मिशन की विफलता के सूक्ष्म कारण: तकनीकी समिति ने विफलता के लिए 'इंजन कंट्रोल सिस्टम' में खराबी को उत्तरदायी ठहराया है:
- सिग्नल का अवरोध: इंजन की 'ऑक्सीडाइज़र लाइन' में स्थित एक महत्वपूर्ण वाल्व को सक्रिय करने के लिए भेजा गया विद्युत संकेत अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच सका। सिग्नल न मिलने के कारण इंजन 'बर्न' नहीं कर पाया। जिससे उपग्रह अपनी इच्छित ऊँचाई प्राप्त नहीं कर सका और अंततः मिशन विफल रहा।
- कनेक्शन विसंगति: प्राथमिक और बैकअप दोनों विद्युत प्रणालियों में कम से कम एक कनेक्शन के ढीले होने या विफल होने के कारण यह तकनीकी गतिरोध उत्पन्न हुआ।
- इंजन प्रज्वलन में विफलता: इस वाल्व के सक्रिय न होने के कारण इंजन 'फायरिंग' नहीं कर सका, जो अंतरिक्ष यान की कक्षा को ऊपर उठाने के लिए अनिवार्य था।
- ऑक्सीडाइज़र लाइन वाल्व: रॉकेट के ऊपरी चरण में इंजन को प्रज्वलित करने के लिए ऑक्सीडाइज़र की आपूर्ति करने वाला वाल्व नहीं खुल सका।
- प्रणालीगत विफलता: सिग्नल न मिलने के कारण इंजन 'बर्न' (Burn) नहीं कर पाया, जिससे उपग्रह अपनी इच्छित ऊँचाई प्राप्त नहीं कर सका और अंततः मिशन विफल रहा।
चिंता का विषय: पारदर्शिता बनाम अपारदर्शिता:
- सूचना का अभाव: इसरो ने यह स्पष्ट नहीं किया कि कनेक्शन ढीला होने का कारण खराब गुणवत्ता थी या डिज़ाइन में कोई मूलभूत कमी।
- वैज्ञानिक जवाबदेही: विफलता विश्लेषण को सार्वजनिक न करना भविष्य के अनुसंधान और निजी क्षेत्र की भागीदारी के लिए बाधक बन सकता है।
सार्वजनिक विश्वास पर प्रभाव:
- इसरो की विश्वसनीयता इसकी पारदर्शिता पर निर्भर करती है। जनता और करदाताओं को यह जानने का अधिकार है कि उच्च-बजट वाले राष्ट्रीय मिशनों में विफलता का सटीक कारण क्या था ताकि भविष्य में जिम्मेदारी तय की जा सके।
अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य और प्रतिस्पर्धा:
- NavIC सीधे तौर पर अमेरिका के GPS, रूस के GLONASS और चीन के BeiDou के साथ प्रतिस्पर्धा करता है। NVS-02 की विफलता और उसके बाद की अपारदर्शिता भारत की इस वैश्विक प्रतिस्पर्धा में खड़े होने की क्षमता पर कूटनीतिक सवाल उठाती है।
सरकारी पहल और सुधारात्मक विश्लेषण:
- सरकार ने 'इन-स्पेस' (IN-SPACe) जैसी संस्थाओं के माध्यम से अंतरिक्ष क्षेत्र को खोला है। ऐसे में इसरो को अपनी 'विफलता विश्लेषण' पद्धति को और अधिक पेशेवर और सार्वजनिक बनाना होगा ताकि निजी निवेशकों का भरोसा बना रहे।
सीख और आगामी मिशनों पर प्रभाव:
- इस विफलता का लाभ LVM3-M5 मिशन (2 नवंबर, 2025) में देखा गया। GSAT-20 के सफल प्रक्षेपण ने यह सिद्ध किया कि इसरो ने NVS-02 की विद्युत प्रणालियों और वाल्व मैकेनिज्म की खामियों को पहचान कर उन्हें दुरुस्त कर लिया है।
भावी मार्ग:
- डिजिटल पारदर्शिता: विफलता की जांच के लिए एक स्वतंत्र डेटा पोर्टल बनाया जाना चाहिए।
- मानक संचालन प्रक्रिया (SOP): विनिर्माण के दौरान विद्युत कनेक्शनों की 'मल्टी-लेवल' चेकिंग और वाइब्रेशन टेस्ट को अधिक कठोर बनाया जाए।
निष्कर्ष:
NVS-02 मिशन भले ही तकनीकी रूप से विफल रहा, किंतु इसने इसरो को अपनी प्रक्रियाओं के आत्मनिरीक्षण का अवसर दिया है। भारत को एक 'ग्लोबल स्पेस हब' बनाने के लिए तकनीकी श्रेष्ठता के साथ-साथ प्रशासनिक पारदर्शिता को भी प्राथमिकता देनी होगी।
सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
संदर्भ
तीन वर्ष पूर्व, भारत की G-20 अध्यक्षता के समय 'महत्वपूर्ण खनिज' नीतिगत विमर्श के केंद्र में नहीं थे। अगस्त 2023 तक, लिथियम सहित कई अनिवार्य खनिजों को 'परमाणु खनिज' के रूप में वर्गीकृत किया गया था, जिससे निजी क्षेत्र की भागीदारी पूरी तरह प्रतिबंधित थी। हालाँकि, बजट 2026 ने एक बड़े नीतिगत बदलाव का संकेत दिया है, जहाँ इन खनिजों को भारत की औद्योगिक, ऊर्जा और भू-राजनीतिक रणनीति का मुख्य स्तंभ घोषित किया गया है।
महत्वपूर्ण खनिज: परिभाषा एवं महत्त्व
महत्वपूर्ण खनिज वे तत्व हैं जो आधुनिक उच्च-तकनीकी उद्योगों के लिए अपरिहार्य हैं, जिनकी आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता को खतरे में डाल सकता है।
- प्रमुख तत्व: लिथियम, कोबाल्ट, निकल (EV बैटरी), बेरिलियम, टैंटलम, निओबियम (रक्षा और एयरोस्पेस), और दुर्लभ पृथ्वी तत्व।
- भारत की स्थिति: वर्तमान में भारत ने 30 महत्वपूर्ण खनिजों की एक व्यापक सूची तैयार की है।
चर्चा में क्यों?
- राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन (NCMM): जनवरी 2025 में ₹16,300 करोड़ के परिव्यय के साथ लॉन्च किया गया।
- नीतिगत उदारीकरण: रॉयल्टी दरों को तर्कसंगत बनाया गया और कनिष्ठ खनिकों (Junior Miners) के लिए अन्वेषण मानदंडों को सरल बनाया गया।
- बजट 2026 की घोषणाएं: प्रसंस्करण में प्रयुक्त पूंजीगत सामानों पर आयात शुल्क की समाप्ति।
- 9 महत्वपूर्ण खनिजों के अन्वेषण व्यय पर कर कटौती की पात्रता।
- दुर्लभ पृथ्वी चुंबक के लिए ₹7,280 करोड़ की योजना।
कार्यान्वयन की चुनौतियाँ और रणनीतिक प्राथमिकताएं
भारत को केवल महत्वाकांक्षा से परे जाकर 'निष्पादन' पर ध्यान केंद्रित करना होगा:
- प्रसंस्करण वर्चस्व और तकनीकी उन्नयन: वैश्विक खनिज प्रसंस्करण क्षमता के 90% हिस्से पर चीन का नियंत्रण है। CEEW के विश्लेषण के अनुसार, भारत तांबा, ग्रेफाइट और टाइटेनियम को 99.9% शुद्धता तक संसाधित करने में सक्षम है, लेकिन इसे रक्षा और 'क्लीन-टेक' की उच्च गुणवत्ता आवश्यकताओं के लिए अपग्रेड करना अनिवार्य है।
- मांग सृजन: निवेशकों के लिए सबसे बड़ी बाधा लागत नहीं, बल्कि सुनिश्चित घरेलू मांग की कमी है। सौर मॉड्यूल, पवन टर्बाइन और बैटरी विनिर्माण में 'बैकवर्ड इंटीग्रेशन' की देरी को दूर करना होगा।
- AI-फर्स्ट अन्वेषण दृष्टिकोण: NCMM का लक्ष्य FY2031 तक 1,200 परियोजनाएं हैं। इसके लिए 'इंडिया-AI मिशन' और 'राष्ट्रीय भू-स्थानिक नीति' के समन्वय से सिस्मिक AI टूल्स का उपयोग करके अन्वेषण को जोखिम-मुक्त करना होगा।
- भू-राजनीतिक संप्रभुता: 2025 में आपूर्ति श्रृंखलाओं के 'शस्त्रीकरण' को देखते हुए, तटीय राज्यों में 'दुर्लभ पृथ्वी गलियारों' का निर्माण और मोनाजाइट रेत पर आयात शुल्क कम करना एक समयोचित कदम है।
अंतर्राष्ट्रीय साझेदारी और तकनीकी सहयोग
भारत को अपनी तकनीकी संप्रभुता के लिए वैश्विक स्तर पर सक्रिय होना होगा:
- साझेदार: ऑस्ट्रेलिया, जापान, ब्रिटेन, अमेरिका और यूरोपीय संघ।
- तंत्र: 'यूके-भारत क्रिटिकल मिनरल्स सप्लाई चेन ऑब्जर्वेटरी' और हालिया संपन्न भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता (FTA) के तहत अनुसंधान और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को बढ़ावा देना।
- उद्देश्य: विदेशी फर्मों को वैश्विक बाजार की सेवा के लिए भारत में अपनी प्रसंस्करण सुविधाएं स्थापित करने हेतु प्रेरित करना।
विश्लेषण
भारत का यह बदलाव "खनिज सुरक्षा" से "खनिज संप्रभुता" की ओर संक्रमण है। खनिज आपूर्ति श्रृंखला के मिडस्ट्रीम (प्रसंस्करण) में भारत की क्षमता रसायन और फार्मास्यूटिकल्स क्षेत्रों के पुराने कौशल पर आधारित है। भारत की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह कितनी तेजी से एक मजबूत 'रेगुलेटरी फ्रेमवर्क' और 'वॉटरटाइट लीगल स्ट्रक्चर' तैयार कर पाता है।
आगे की राह
- अंतर-मंत्रालयी समन्वय: खनन, उद्योग और विदेश मंत्रालय के बीच बेहतर तालमेल।
- सर्कुलर इकोनॉमी: खनिजों के पुनर्चक्रण को प्रोत्साहन देना।
- बुनियादी ढांचा: प्रसंस्करण इकाइयों के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZs) का विकास।
- कौशल विकास: खनन इंजीनियरिंग और डेटा साइंस (AI) में विशेषज्ञता का निर्माण।
- निजी क्षेत्र की भागीदारी: कनिष्ठ खनिकों के लिए अन्वेषण के नियमों को और अधिक सरल बनाना।
निष्कर्ष
अशांत वैश्विक परिवेश में, 2026 भारत के लिए एक निर्णायक वर्ष साबित हो सकता है। यदि भारत आत्मविश्वास, गति और वैश्विक साझेदारी के साथ अपने 'राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन' को क्रियान्वित करता है, तो वह न केवल अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, बल्कि वैश्विक औद्योगिक परिदृश्य में एक अनिवार्य शक्ति के रूप में स्थापित होगा।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।
सन्दर्भ
हाल ही में भारतीय प्रधानमंत्री की इज़रायल यात्रा ने दोनों देशों के बीच 'विशेष रणनीतिक साझेदारी' को एक नई ऊंचाई दी है। जहाँ एक ओर तकनीकी और आर्थिक मोर्चे पर यह यात्रा सफल रही, वहीं दूसरी ओर इसने पश्चिम एशिया में भारत की पारंपरिक 'संतुलनकारी नीति' के समक्ष नई कूटनीतिक चुनौतियाँ पेश की हैं।
प्रमुख बिंदु और द्विपक्षीय सहयोग
- रणनीतिक विस्तार: भारत और इज़रायल ने अपने संबंधों को 'विशेष रणनीतिक साझेदारी' में अपग्रेड किया है। इसके तहत एआई (AI), कृषि, और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में 15 से अधिक समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए।
- श्रमिक गतिशीलता: अगले पांच वर्षों में 50,000 भारतीय श्रमिकों को इज़रायल में रोजगार देने का निर्णय आर्थिक संबंधों को मानवीय आधार प्रदान करता है।
- क्षेत्रीय पहल: भारत ने I2U2 (भारत, इज़रायल, यूएई, अमेरिका) और IMEC (भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा) जैसी परियोजनाओं के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है, जो ध्रुवीकृत वातावरण में भी क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण का संकेत देती हैं।
कूटनीतिक चुनौतियाँ और चिंताएँ
- फिलिस्तीन का मुद्दा: आलोचना का मुख्य बिंदु यह है कि इस यात्रा के दौरान फिलिस्तीन का उल्लेख केवल परोक्ष रूप से किया गया। भारत ऐतिहासिक रूप से 'द्वि-राष्ट्र समाधान' का समर्थक रहा है, लेकिन वर्तमान मानवीय संकट (गाज़ा में हताहतों की संख्या) पर चुप्पी कूटनीतिक संतुलन को प्रभावित कर सकती है।
- पश्चिम एशिया में अलगाव का जोखिम: इज़रायल वर्तमान में वेस्ट बैंक बस्तियों और गाज़ा युद्ध के कारण वैश्विक स्तर पर (विशेषकर अरब जगत में) अलगाव का सामना कर रहा है। ऐसे समय में इज़रायल के साथ "मजबूती से खड़े होने" का संदेश भारत के पुराने मित्रों (जैसे ईरान और अरब देश) के साथ संबंधों में तनाव पैदा कर सकता है।
- नैतिक और सामरिक संतुलन: भारत की छवि हमेशा से शांति, नैतिकता और करुणा के समर्थक की रही है। अरब देश उम्मीद करते हैं कि भारत अपनी 'कैलिब्रेटेड' (नपी-तुली) नीति पर कायम रहे।
विश्लेषण
भारत और इज़रायल के बीच 'विशेष रणनीतिक साझेदारी' तकनीकी और सुरक्षा की दृष्टि से एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन गाज़ा संकट के बीच फिलिस्तीन पर भारत की चुप्पी अरब जगत के साथ हमारे पारंपरिक संबंधों को प्रभावित कर सकती है। भारत की असली चुनौती अपनी 'डी-हाइफनेशन' नीति को बनाए रखते हुए पश्चिम एशिया में नैतिक और सामरिक संतुलन सुनिश्चित करने की है।
आगे की राह
भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह अपनी 'डी-हाइफनेशन' नीति को और अधिक स्पष्ट करे। इसका अर्थ है इज़रायल और फिलिस्तीन के साथ संबंधों को स्वतंत्र रूप से प्रबंधित करना।
- फिलिस्तीन के साथ जुड़ाव: भविष्य में फिलिस्तीन की उच्च-स्तरीय यात्रा या मानवीय सहायता के माध्यम से भारत को अपनी संतुलित स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
- क्षेत्रीय स्थिरता: भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा और प्रवासियों के हितों को ध्यान में रखते हुए अरब देशों के साथ अपने संबंधों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
- शांति मध्यस्थ के रूप में भूमिका: एक वैश्विक शक्ति के रूप में, भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता का उपयोग करते हुए पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता के लिए बातचीत का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।
निष्कर्ष
भारत-इज़रायल संबंध राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास के लिए अपरिहार्य हैं, लेकिन इन्हें अरब जगत की कीमत पर आगे नहीं बढ़ाया जाना चाहिए। भारत की वास्तविक कूटनीतिक परीक्षा इस बात में है कि वह बिना किसी पक्ष का मोहरा बने, अपनी नैतिक साख और सामरिक हितों के बीच सामंजस्य कैसे बिठाता है।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।
संदर्भ
चार्ल्स डिकेंस के कालजयी उपन्यास 'A Tale of Two Cities' की पंक्तियाँ—"यह सर्वोत्तम समय था, यह सूक्ष्मतम समय था" वर्तमान भारतीय आर्थिक परिदृश्य पर सटीक बैठती हैं। पिछले दशक में भारत ने जहाँ एक ओर तीव्र जीडीपी विकास दर दर्ज की है, वहीं दूसरी ओर जनसंख्या के विभिन्न वर्गों के बीच आय गतिशीलता में गंभीर विसंगतियाँ उभरी हैं। आय गतिशीलता का तात्पर्य किसी परिवार की आर्थिक स्थिति में समय के साथ होने वाले सुधार या गिरावट से है। 2014 से 2025 के बीच भारतीय समाज के विभिन्न आर्थिक, जातिगत और धार्मिक समूहों की बदलती स्थिति एक बार फिर चर्चा का विषय बानी हुई है।
चर्चा में क्यों?
'सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी' (CMIE) के 'कंज्यूमर पिरामिड्स हाउसहोल्ड सर्वे' (CPHS) पर आधारित आंकड़ों ने आय वितरण के पारंपरिक पैमानों (जैसे गिनी गुणांक) से इतर कुछ चौंकाने वाले तथ्य प्रस्तुत किए हैं:
- अधोगामी गतिशीलता में तीव्र उछाल: 2015 में केवल 14% परिवार अपनी आय श्रेणी से नीचे गिरे थे, लेकिन 2025 तक यह संख्या लगभग दोगुनी होकर 26.8% हो गई है।
- आर्थिक स्थिरता का क्षरण: 2014 में जो परिवार जिस आय समूह (शीर्ष 10%, मध्य 40%, निचला 50%) में थे, उनमें से 70% उसी में बने रहते थे। 2025 तक यह स्थिरता गिरकर 50% से भी कम रह गई है।
- असंतुलित विकास पथ: यद्यपि ऊर्ध्वगामी गतिशीलता 14.1% से बढ़कर 23.5% हुई है, लेकिन यह सुधार 'अधोगामी गिरावट' की गति की तुलना में धीमा है। सरल शब्दों में, लोग ऊपर कम चढ़ रहे हैं और नीचे अधिक गिर रहे हैं।
क्षेत्रीय एवं सामाजिक विषमताएँ
- ग्रामीण बनाम शहरी विभाजन:
- ग्रामीण भारत: 2025 तक लगभग 29% ग्रामीण परिवार 2014 की तुलना में आर्थिक रूप से बदतर स्थिति में पहुँच गए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में आय की सीढ़ी से नीचे फिसलने वाले परिवारों की संख्या में सबसे तेज गिरावट 2014-19 के बीच देखी गई।
- शहरी भारत: शहरी क्षेत्रों में ऊर्ध्वगामी गतिशीलता ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में तेज रही है, जिससे 'समावेशी विकास' के दावों पर सवाल खड़े होते हैं।
- जातिगत प्रतिमान
- OBC और SC समूह: इन समूहों में अधोगामी गतिशीलता में भारी वृद्धि हुई है। 2025 तक इन समूहों के लगभग 25% परिवार बदतर स्थिति में हैं।
- बाधाएँ: अनुसूचित जातियों (SC) के लिए समस्या केवल नीचे गिरना नहीं है, बल्कि ऊपर जाने वाले अवसरों का लगातार संकुचित होना है।
- ST समूह: अनुसूचित जनजातियों ने लक्षित क्षेत्रीय विकास योजनाओं के कारण कुछ हद तक लचीलापन और ऊर्ध्वगामी सुधार दिखाया है।
धार्मिक प्रतिमान
- हिंदू और मुस्लिम दोनों समूहों में अधोगामी गतिशीलता बढ़ी है, जो अक्सर चुनावी वर्षों के आसपास तीव्र होती देखी गई।
- सिख और ईसाई परिवारों ने शुरुआती वर्षों में बेहतर ऊर्ध्वगामी प्रदर्शन किया, लेकिन दशक के अंत तक उनकी गति भी मद्धम पड़ गई। विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय में भेदभाव के कारण ऊर्ध्वगामी गतिशीलता सबसे कमजोर रही है।
गहराती असमानता: विश्लेषण एवं कारण
सांख्यिकीय विश्लेषण स्पष्ट करता है कि असमानता आकांक्षा को प्रेरित करने के बजाय आर्थिक सीमाओं को और कठोर बनाती है।
- जिला-स्तरीय विषमता: जिन जिलों में आय वितरण अधिक असमान है, वहां परिवारों के नीचे गिरने की संभावना अधिक देखी गई।
- कोविड-19 का प्रभाव: महामारी और उसके अकुशल प्रबंधन ने अनौपचारिक क्षेत्र (कृषि, सूक्ष्म उद्योग) को गहरी चोट पहुंचाई, जिससे आर्थिक व्यवधान लंबे समय तक बना रहा।
- रणनीतिक चूक: अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के बजाय वैचारिक एजेंडे पर अधिक ध्यान देने से कृषि और छोटे उद्योगों में सुधार की गति धीमी रही।
चिंता का विषय: सामाजिक स्थिरता
एक ऐसी अर्थव्यवस्था जहाँ ऊपर बढ़ने वालों की तुलना में नीचे गिरने वाले परिवारों की संख्या अधिक हो, वह लंबे समय तक सामाजिक स्थिरता बनाए नहीं रख सकती। जब आर्थिक असमानता 'स्थायी' होने लगती है, तो युवाओं में आकांक्षा का स्थान निराशा ले लेती है, जो अराजकता और सामाजिक विद्वेष का कारण बन सकती है।
आगे की राह
- हेडलाइन ग्रोथ से परे सोच: केवल जीडीपी विकास दर के बजाय सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार-गहन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना।
- अनौपचारिक क्षेत्र का सशक्तिकरण: कृषि और लघु उद्योगों के लिए ऋण, तकनीक और बाजार तक पहुँच सुनिश्चित करना।
- भेदभाव विरोधी ढांचे: जाति और धर्म आधारित आर्थिक बाधाओं को दूर करना केवल सामाजिक न्याय नहीं, बल्कि आर्थिक विकास की अनिवार्यता है।
- सामाजिक सुरक्षा का सुदृढ़ीकरण: कमजोर वर्गों के लिए आय सहायता और स्वास्थ्य बीमा योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाना।
निष्कर्ष
भारत का वर्तमान आर्थिक स्वरूप "शेड्स ऑफ ग्रे" (धुंधलेपन) से भरा है। आय की सीढ़ी पर नीचे गिरने वालों की बढ़ती संख्या और ऊपर चढ़ने के संकुचित होते रास्ते भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती हैं। आर्थिक प्रगति में 'विश्वास' बहाल करने के लिए नीतियों को न्यायसंगत, समावेशी और गतिशीलता-उन्मुख बनाना अनिवार्य है।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।
संदर्भ
शिक्षा का मूल उद्देश्य नागरिकों में संवैधानिक संस्थाओं के प्रति सम्मान और समझ विकसित करना है। कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तकें भारतीय शासन व्यवस्था, न्यायपालिका और संविधान के बुनियादी ढांचे से छात्रों को परिचित कराने का प्राथमिक स्रोत मानी जाती हैं।
चर्चा में क्यों?
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने NCERT द्वारा प्रकाशित कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। चर्चा के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- भ्रष्टाचार का चित्रण: पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका को एक भ्रष्ट संस्था के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया था।
- दोषपूर्ण संदर्भ: कोर्ट ने पाया कि न्यायपालिका के विरुद्ध "चयनात्मक संदर्भों" का उपयोग कर एक नकारात्मक धारणा बनाने की कोशिश की गई।
- स्वतः संज्ञान: मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इसे न्यायपालिका की छवि धूमिल करने की एक "गहरी साजिश" करार दिया।
- प्रतियों की जब्ती: न्यायालय ने सभी डिजिटल और भौतिक प्रतियों को तत्काल प्रभाव से जब्त करने और सील करने का आदेश दिया है।
प्रधानमंत्री का वक्तव्य:
"प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस गंभीर विषय पर संज्ञान लेते हुए NCERT की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका पर लगाए गए 'भ्रष्टाचार' के आरोपों और संबंधित अध्याय के संदर्भ में कड़ी जवाबदेही तय करने का आह्वान किया है।"
यह मुद्दा क्यों महत्वपूर्ण है?
- संस्थागत विश्वसनीयता: न्यायपालिका लोकतंत्र का तीसरा स्तंभ है। इसकी विश्वसनीयता पर प्रहार लोकतांत्रिक ढांचे को अस्थिर कर सकता है।
- कोमल मन पर प्रभाव: कक्षा 8 के छात्र मानसिक रूप से अत्यंत संवेदनशील होते हैं। गलत जानकारी उनके भविष्य के दृष्टिकोण को दूषित कर सकती है।
- संवैधानिक नैतिकता: यह मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संवैधानिक मर्यादाओं के बीच संतुलन की व्याख्या करता है।
संभावित प्रभाव
- नकारात्मक धारणा: भविष्य की पीढ़ी का न्याय प्रणाली से भरोसा उठ सकता है, जो अराजकता को जन्म दे सकता है।
- शैक्षिक मानक: यह घटना पाठ्यपुस्तकों के चयन और समीक्षा प्रक्रिया में गंभीर खामियों को उजागर करती है।
- न्यायिक सक्रियता: सर्वोच्च न्यायालय का यह कड़ा रुख अन्य संस्थाओं के लिए एक चेतावनी है कि वे अपनी सीमाओं का उल्लंघन न करें।
अन्य महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ
- सॉलिसिटर जनरल का पक्ष: तुषार मेहता ने इसे एक "शर्मनाक कृत्य" बताते हुए कोर्ट से बिना शर्त माफी मांगी और दोषियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई का भरोसा दिया।
- वरिष्ठ अधिवक्ताओं की राय: कपिल सिब्बल और ए.एम. सिंघवी जैसे विशेषज्ञों ने माना कि यह सामग्री केवल एक त्रुटि नहीं, बल्कि एक "जानबूझकर किया गया कृत्य" प्रतीत होता है।
न्यायपालिका की सुरक्षा हेतु प्रमुख संवैधानिक प्रावधान
भारतीय संविधान न्यायपालिका की स्वतंत्रता और गरिमा अक्षुण्ण रखने के लिए निम्नलिखित कवच प्रदान करता है:
- न्यायिक अवमानना
- अनुच्छेद 129: सर्वोच्च न्यायालय को 'अभिलेख न्यायालय' घोषित करता है और इसे अपनी अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति देता है।
- अनुच्छेद 215: उच्च न्यायालयों को भी अपनी अवमानना के विरुद्ध दंड देने की समान शक्ति प्रदान करता है।
- आचरण पर चर्चा पर रोक
- अनुच्छेद 121: संसद में न्यायाधीशों के कर्तव्य-निर्वहन के दौरान किए गए आचरण पर चर्चा करने पर रोक लगाता है (महाभियोग के अतिरिक्त)।
- अनुच्छेद 211: राज्य विधानमंडलों पर भी न्यायाधीशों के आचरण की चर्चा को लेकर समान प्रतिबंध लगाता है।
- न्यायपालिका की स्वतंत्रता
- अनुच्छेद 50 (DPSP): राज्य को कार्यपालिका से न्यायपालिका के पृथक्करण का निर्देश देता है।
- अनुच्छेद 141: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित कानून देश की सभी अदालतों पर बाध्यकारी है, जो इसकी न्यायिक सर्वोच्चता सुनिश्चित करता है।
- अभिव्यक्ति पर उचित प्रतिबंध
- अनुच्छेद 19(2): भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (19(1)(a)) असीमित नहीं है; राज्य 'न्यायालय की अवमानना' के आधार पर इस पर उचित प्रतिबंध लगा सकता है।
विश्लेषण
न्यायपालिका में सुधार की गुंजाइश हमेशा रहती है, परंतु सुधार के सुझाव और संस्था को बदनाम करने के बीच एक सूक्ष्म रेखा होती है। शैक्षिक सामग्री को तथ्यों पर आधारित होना चाहिए, न कि व्यक्तिगत या प्रेरित विचारधारा पर।
आगे की राह:
- समीक्षा समिति का पुनर्गठन: पाठ्यपुस्तकों की समीक्षा के लिए कानूनी और संवैधानिक विशेषज्ञों की एक स्थायी समिति होनी चाहिए।
- जवाबदेही सुनिश्चित करना: जैसा कि CJI ने कहा, “ जिम्मेदारों पर गाज गिरनी चाहिए”, ताकि भविष्य में ऐसी पुनरावृत्ति न हो।
- संतुलित पाठ्यक्रम: पुस्तकों में समस्याओं के साथ-साथ संस्थाओं की उपलब्धियों (जैसे- जनहित याचिका, मौलिक अधिकारों का संरक्षण) का भी उल्लेख अनिवार्य होना चाहिए।
निष्कर्ष
न्यायपालिका का सम्मान केवल न्यायाधीशों का सम्मान नहीं है, बल्कि उस संविधान का सम्मान है जिसे सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई है। NCERT विवाद ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शिक्षा के क्षेत्र में "बौद्धिक सतर्कता" अत्यंत आवश्यक है ताकि भारत की लोकतांत्रिक नींव को भविष्य के खतरों से बचाया जा सके।