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सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
संदर्भ
ग्रेट निकोबार परियोजना की नींव हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की भू-राजनीतिक स्थिति को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से रखी गई थी। ऐतिहासिक रूप से उपेक्षित रहे इस द्वीप का महत्व वर्तमान में चीन की समुद्री विस्तारवादी नीतियों के जवाब में और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्ग (मलक्का जलडमरूमध्य) की निकटता के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है।
वर्तमान समाचार
हाल ही में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने इस 80,000 करोड़ रुपये की मेगा परियोजना को हरी झंडी दे दी है। इस निर्णय से जुड़े मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- न्यायिक अनुमति: जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव की अध्यक्षता वाली छह सदस्यीय पीठ ने पर्यावरणीय चुनौतियों को खारिज करते हुए परियोजना को मंजूरी दी।
- सुरक्षा मानक: एनजीटी ने माना कि उच्चाधिकार प्राप्त समिति ने पर्यावरणीय चिंताओं का पर्याप्त समाधान कर लिया है और परियोजना में आवश्यक सुरक्षा उपाय शामिल हैं।
- सामरिक आवश्यकता: सरकार के अनुसार, विदेशी शक्तियों के बढ़ते दबाव के बीच हिंद महासागर में भारत की पकड़ मजबूत करने के लिए यह प्रोजेक्ट अपरिहार्य है।
- राजनीतिक विरोध: कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों और संरक्षणवादियों ने इसे 'विनाशकारी' बताते हुए पारिस्थितिक तंत्र और स्वदेशी जनजातियों (जैसे शोम्पेन और निकोबारी) के अस्तित्व के लिए खतरा बताया है।
महत्व
- सामरिक और सैन्य महत्व
- यह द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य के अत्यंत निकट है, जहाँ से दुनिया का अधिकांश समुद्री व्यापार गुजरता है। यहाँ बनने वाला दोहरे उपयोग वाला हवाई अड्डा और नौसैनिक आधार हिंद महासागर में चीन की बढ़ती गतिविधियों पर नज़र रखने और भारतीय नौसेना की पहुँच बढ़ाने के लिए गेम-चेंजर साबित होगा।
- आर्थिक और व्यापारिक लाभ
- लगभग 80,000 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाला इंटरनेशनल ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल भारत को वैश्विक लॉजिस्टिक्स मानचित्र पर स्थापित करेगा। वर्तमान में भारतीय कार्गो का बड़ा हिस्सा कोलंबो या सिंगापुर पोर्ट से होकर जाता है; इस पोर्ट के बनने से भारत विदेशी मुद्रा बचा सकेगा और अरबों डॉलर का राजस्व अर्जित करेगा।
- 'ब्लू इकोनॉमी' और क्षेत्रीय विकास
- यह परियोजना अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को केवल एक दूरस्थ पर्यटन स्थल के बजाय एक प्रमुख वैश्विक व्यापार केंद्र के रूप में विकसित करेगी। इससे क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और बुनियादी ढांचे (बिजली, सड़क, डिजिटल कनेक्टिविटी) का आधुनिक विस्तार होगा।
परियोजना का संक्षिप्त विवरण और प्रभाव
यह महत्वाकांक्षी परियोजना लगभग 166 वर्ग किमी क्षेत्र में विस्तृत है, जिसमें निम्नलिखित घटक शामिल हैं:
- बुनियादी ढांचा: एक विशाल अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, एक दोहरे उपयोग वाला (नागरिक और सैन्य) हवाई अड्डा, एक गैस-आधारित पावर प्लांट और एक हरित क्षेत्र वाला शहर।
- पारिस्थितिक प्रभाव: इस परियोजना के लिए लगभग 130 वर्ग किमी वन भूमि का डायवर्जन (उपयोग) किया जाएगा, जिससे लाखों पेड़ों की कटाई और समुद्री जैव विविधता (जैसे लेदरबैक कछुए) पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है।
- जनजातीय प्रभाव: यह क्षेत्र विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों का निवास स्थान है, जिनके प्राकृतिक आवास में मानवीय हस्तक्षेप बढ़ने की संभावना है।
निष्कर्ष
ग्रेट निकोबार परियोजना भारत के लिए 'विकास बनाम संरक्षण' की एक जटिल चुनौती पेश करती है। जहाँ एक ओर देश की राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक समृद्धि के लिए इसका कार्यान्वयन आवश्यक प्रतीत होता है, वहीं दूसरी ओर यहाँ की अद्वितीय जैव विविधता और आदिम जनजातियों का संरक्षण भी राज्य का संवैधानिक उत्तरदायित्व है। भविष्य में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार 'नीली अर्थव्यवस्था' के लक्ष्यों को प्राप्त करते समय पारिस्थितिक स्थिरता के साथ कितना न्याय कर पाती है।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
हाल ही में भारत सरकार ने 'अर्बन चैलेंज फंड' को अद्यतन किया है, जिसका उद्देश्य शहरी बुनियादी ढांचे के विकास के लिए "बाजार-आधारित और सुधार-प्रेरित" दृष्टिकोण अपनाना है। यह कदम ऐसे समय में आया है जब कई शहरी स्थानीय निकाय (ULBs) पहले से ही अमृत (AMRUT), स्मार्ट सिटी और स्वच्छ भारत मिशन जैसी योजनाओं के तहत अधूरे कार्यों और संसाधनों के अल्प-उपयोग से जूझ रहे हैं।
अर्बन चैलेंज फंड: मुख्य प्रावधान
- वित्तीय ढांचा: केंद्र सरकार परियोजना लागत का 25% हिस्सा वहन करेगी, बशर्ते शहर शेष 50% राशि बॉन्ड, ऋण या सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) के माध्यम से जुटाएं।
- उद्देश्य: शहरी प्रणालियों में राजकोषीय अनुशासन लाना और शहरों को निवेश के लिए "बैंक योग्य" बनाना।
- गारंटी: छोटे शहरों को ऋण लेने में सहायता के लिए ₹5,000 करोड़ की गारंटी का प्रावधान किया गया है।
प्रमुख चिंताएं और चुनौतियां
लेख के अनुसार, इस फंड का क्रियान्वयन कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है:
- प्रशासनिक क्षमता का अभाव: अधिकांश ULBs के पास बाजार से धन जुटाने या जटिल ऋण समझौतों को प्रबंधित करने के लिए आवश्यक प्रशासनिक और लेखांकन क्षमता की कमी है।
- वित्तीय शक्तियों का अधूरा हस्तांतरण: भारत में राजकोषीय विकेंद्रीकरण अभी भी पूर्ण नहीं है। स्थानीय करों और हस्तांतरण की राजनीति अक्सर राज्य-स्तरीय मुद्दों से प्रभावित होती है।
- सेवाओं का मुद्रीकरण बनाम जन सेवा: "कमाऊ विकास" पर ध्यान केंद्रित करने से गरीब बस्तियों के नियमितीकरण जैसी आवश्यक सेवाओं के बजाय केवल उन्हीं संपत्तियों के विकास पर जोर दिया जा सकता है जिनसे राजस्व प्राप्त हो सके।
- कमजोर शहरों का हाशिए पर जाना: बाजार-आधारित मॉडल में केवल उन्हीं शहरों को निवेश मिलेगा जो पहले से समृद्ध हैं, जिससे पिछड़े और छोटे शहर विकास की दौड़ में और पीछे छूट सकते हैं।
अन्य क्षेत्रों के अनुभव
सरकार द्वारा सार्वजनिक सहायता घटाकर निजी वित्त पर निर्भरता बढ़ाने के परिणाम अन्य क्षेत्रों में मिश्रित रहे हैं:
- उच्च शिक्षा: बुनियादी ढांचे के लिए ऋण लेने से विश्वविद्यालय कर्ज में डूब गए हैं, जिससे छात्रों पर फीस का बोझ बढ़ा है।
- स्वास्थ्य: राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) में धन के हस्तांतरण में देरी के कारण अस्पतालों को भुगतान से पहले सेवाएं जारी रखने का दबाव झेलना पड़ता है।
- बिजली क्षेत्र: उदय (UDAY) योजना के ऑडिट ने बिजली वितरण कंपनियों (DISCOMs) में क्रियान्वयन और अनुपालन के बड़े अंतराल को उजागर किया है।
संरचनात्मक कमियां
शहरी शासन में कुछ बुनियादी सुधारों के बिना बाजार से धन जुटाना जोखिम भरा हो सकता है:
- भूमि रिकॉर्ड का अभाव: भूमि रिकॉर्ड की अव्यवस्था संपत्ति कर और ऋण लेने की क्षमता को बाधित करती है।
- मास्टर प्लान का उल्लंघन: शहरी निकायों द्वारा मास्टर प्लान का नियमित उल्लंघन शहरी विकास को अनियोजित बनाता है।
- सामाजिक सुरक्षा की कमी: ऋण-आधारित विकास में किराएदारों और कम आय वाले समूहों के हितों की रक्षा के लिए अतिरिक्त प्रावधानों का अभाव है।
विश्लेषण: 'बैंक योग्यता' बनाम 'सेवा गारंटी'
निजी पूंजी का उपयोग करना गलत नहीं है, लेकिन समस्या तब होती है जब केंद्र सरकार 'न्यूनतम सेवा गारंटी' सुनिश्चित करने के बजाय सार्वजनिक सहायता को 'बाजार पहुंच' की शर्त से जोड़ देती है। यदि शहरों के पास बेहतर लेखांकन और पारदर्शी प्रक्रियाएं नहीं होंगी, तो फंड का आवंटन राजनीतिक प्राथमिकताओं से प्रभावित होने का डर बना रहेगा।
आगे की राह
- क्षमता निर्माण: शहरों को बाजार में उतारने से पहले उनकी प्रशासनिक और तकनीकी दक्षता में निवेश करना अनिवार्य है।
- राजकोषीय सुधार: 74वें संविधान संशोधन की भावना के अनुरूप ULBs को कर लगाने और वसूलने की वास्तविक शक्तियां दी जानी चाहिए।
- संतुलित निवेश: 'अर्बन चैलेंज फंड' को इस तरह डिजाइन किया जाना चाहिए कि यह सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं और व्यावसायिक परियोजनाओं के बीच संतुलन बनाए रखे।
निष्कर्ष
अर्बन चैलेंज फंड एक वैध वित्तीय उपकरण हो सकता है, लेकिन इसकी सफलता केवल "बैंक योग्यता" पर नहीं, बल्कि शहरों के जमीनी शासन सुधारों पर निर्भर करेगी। शहरी विकास को केवल लाभ-हानि के चश्मे से देखने के बजाय समावेशी शासन के ढांचे में ढालना आवश्यक है।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
भूमिका
फरवरी 2026 का म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन (MSC) वैश्विक व्यवस्था के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ के रूप में दर्ज किया गया है। वर्तमान परिदृश्य में, द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात स्थापित 'नियम-आधारित व्यवस्था' अपनी प्रासंगिकता खोती प्रतीत हो रही है। जर्मनी और फ्रांस जैसे प्रमुख यूरोपीय राष्ट्रों द्वारा व्यक्त की गई चिंताएँ और अमेरिका के बदलते वैचारिक दृष्टिकोण ने ट्रांसअटलांटिक संबंधों के भविष्य पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
प्रमुख वक्तव्य एवं वैचारिक संघर्ष
सम्मेलन के दौरान प्रमुख नेताओं के भाषणों ने गठबंधन के भीतर की वैचारिक दरार को स्पष्ट किया:
- जर्मनी (चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़): उन्होंने कड़े शब्दों में घोषणा की कि "अंतर्राष्ट्रीय नियम-आधारित व्यवस्था अब अस्तित्व में नहीं है।" यह वैश्विक संस्थाओं और संधियों की विफलता का एक स्वीकारोक्ति पत्र है।
- फ्रांस (राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन): उन्होंने यूरोप की 'सैन्य स्वायत्तता' का आह्वान किया। मैक्रॉन का तर्क है कि यूरोप को नाटो (NATO) के भीतर एक स्वतंत्र और सशक्त स्तंभ के रूप में उभरना चाहिए, न कि केवल अमेरिका का अनुगामी बने रहना चाहिए।
- अमेरिका (विदेश मंत्री मार्को रुबियो): रुबियो ने सहयोग का प्रस्ताव तो दिया, किंतु उसका आधार बदल दिया। उन्होंने गठबंधन को साझा रणनीतिक हितों के स्थान पर 'साझा इतिहास और सभ्यतागत मूल्यों' पर टिकाने की वकालत की।
यूरोप के समक्ष 'तिहरा संकट'
यूरोप वर्तमान में तीन दिशाओं से दबाव का सामना कर रहा है:
- पूर्वी मोर्चे पर निरंतर संघर्ष: यूक्रेन और रूस के मध्य विगत चार वर्षों से जारी युद्ध ने यूरोप की सुरक्षा स्थिरता को भंग कर दिया है। सैन्य सहायता और आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद युद्ध किसी निर्णायक बिंदु पर नहीं पहुँच सका है।
- सुरक्षा निर्भरता का जोखिम: शीत युद्ध के बाद से यूरोप अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर रहा है। किंतु अमेरिका में 'अमेरिका फर्स्ट' नीति और धुर-दक्षिणपंथी आंदोलनों के उदय ने इस भरोसे को कमजोर कर दिया है।
- आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता: यूरोपीय संघ (EU) के भीतर ही राष्ट्रवादी और धुर-दक्षिणपंथी आंदोलनों का पुनरुत्थान हुआ है, जो यूरोपीय एकजुटता और समावेशी लोकतांत्रिक ढांचे को भीतर से खोखला कर रहे हैं।
पहचान की राजनीति बनाम रणनीतिक स्वायत्तता
अमेरिका का वर्तमान प्रशासन यूरोप को अपने 'सांस्कृतिक युद्धों' और 'पश्चिमी प्रभुत्व' को पुनः स्थापित करने के एजेंडे में शामिल करना चाहता है। मार्को रुबियो द्वारा 'सभ्यतागत मिटाव' जैसे शब्दों का प्रयोग यह दर्शाता है कि अब गठबंधन का आधार कूटनीति से अधिक वैचारिक होता जा रहा है। इसके विपरीत, यूरोपीय नेतृत्व इस 'सांस्कृतिक गुटबाजी' से बचकर अपनी स्वतंत्र रणनीतिक पहचान बनाना चाहता है।
रणनीतिक सिफारिशें और आगे की राह
यूरोप को अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए निम्नलिखित कदम उठाने अनिवार्य होंगे:
- अमेरिका पर निर्भरता में कटौती: सुरक्षा और आर्थिक नीतियों में आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता देना।
- पश्चिमी दायरे से परे विस्तार: 'ग्लोबल साउथ' और एशियाई शक्तियों के साथ नए गठबंधन बनाना ताकि एक संतुलित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का निर्माण हो सके।
- रूस के साथ 'व्यावहारिक शांति': यूक्रेन संकट का कूटनीतिक समाधान खोजकर रूस के साथ एक स्थिर 'नया सामान्य' संबंध स्थापित करना।
- लोकतांत्रिक सुदृढ़ीकरण: जनता के बीच राजनीतिक प्रतिष्ठान के प्रति व्याप्त असंतोष को दूर करना ताकि आंतरिक कट्टरपंथ को नियंत्रित किया जा सके।
निष्कर्ष
वर्तमान वैश्विक संक्रमण काल में यूरोप का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह अमेरिका के 'सभ्यतागत एजेंडे' का हिस्सा बनने के बजाय अपनी स्वतंत्र वैश्विक भूमिका को कितना सशक्त बना पाता है। भविष्य की विश्व व्यवस्था केवल सैन्य शक्ति पर नहीं, बल्कि रणनीतिक स्वायत्तता और समावेशी सहयोग के संतुलन पर आधारित होगी।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
भारतीय संविधान का निर्माण अत्यंत चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में हुआ था। विभाजन का आघात, 550 से अधिक रियासतों का एकीकरण और राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने के भय ने संविधान निर्माताओं को एक 'मजबूत केंद्र' (सेंट्रलाइजिंग बायस) वाली संघीय व्यवस्था बनाने पर मजबूर किया। 1935 के भारत सरकार अधिनियम से प्रेरित इस ढांचे ने नई दिल्ली को व्यापक अधिकार दिए, जबकि राज्यों को एक सीमित कार्यक्षेत्र सौंपा गया। वर्तमान में, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री द्वारा 'स्वायत्त राज्य और कुशल संघ' का आह्वान यह दर्शाता है कि 75 वर्षों के बाद भारत की राजनीतिक परिपक्वता अब "नियंत्रण" के बजाय "विश्वास और स्वायत्तता" पर आधारित संघवाद की मांग कर रही है।
भारतीय संघवाद का दर्शन
भारत को 'विनाशकारी राज्यों का अविनाशी संघ' कहा गया है। संविधान सभा के सदस्य के. संथानम के अनुसार, संघ की वास्तविक शक्ति कार्यों के अंधाधुंध संचय में नहीं, बल्कि उन जिम्मेदारियों को त्यागने में है जो स्थानीय स्तर पर बेहतर ढंग से निभाई जा सकती हैं। भारत का संघवाद 'सब्सिडियरी' के सिद्धांत पर आधारित होना चाहिए—अर्थात निर्णय उस स्तर पर लिए जाएं जो जनता के सबसे करीब हो।
हालिया चर्चा का कारण: तमिलनाडु और कुरियन जोसेफ समिति (2026)
वर्तमान में संघवाद की बहस का केंद्र तमिलनाडु है। तमिलनाडु सरकार ने केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा के लिए न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति गठित की थी।
- प्रमुख घटनाक्रम: फरवरी 2026 में इस समिति ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें भारतीय संघीय ढांचे में 'स्ट्रक्चरल रिसेट' की तत्काल आवश्यकता बताई गई।
- रिपोर्ट का मुख्य तर्क: रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान ढांचा राज्यों की स्वायत्तता को संकुचित कर रहा है। समिति ने केंद्र की भूमिका को पुनः परिभाषित करने और राज्यों को शासन के वास्तविक केंद्र के रूप में स्थापित करने की सिफारिश की है।
'स्ट्रक्चरल रिसेट' की आवश्यकता क्यों?
समिति की रिपोर्ट के अनुसार, 75 वर्षों के बाद अब परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं, लेकिन पुरानी केंद्रीकृत संरचनाएँ निम्नलिखित समस्याओं को जन्म दे रही हैं:
- अत्यधिक केंद्रीकरण: केंद्र द्वारा 'एक राष्ट्र, एक नीति' के तहत ऐसी योजनाएँ बनाई जा रही हैं जो राज्यों की स्थानीय विविधता और नीति-निर्माण क्षमता को प्रभावित करती हैं।
- वित्तीय संघवाद में असंतुलन: उपकर और अधिभार के बढ़ते उपयोग के कारण विभाज्य पूल (छोटा हो रहा है, जिससे राज्यों का वास्तविक हिस्सा कम हो गया है। GST व्यवस्था ने राज्यों की कराधान स्वतंत्रता को भी सीमित किया है।
- राज्य विषयों में अतिक्रमण: कृषि, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे 'राज्य सूची' के विषयों में केंद्र की सक्रियता और हस्तक्षेप बढ़ गया है।
- राज्यपाल की विवादित भूमिका: राज्यों का आरोप है कि राज्यपाल विधेयकों को अनिश्चित काल तक रोककर या देरी करके लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकारों के कार्यों में राजनीतिक बाधा उत्पन्न कर रहे हैं।
प्रमुख विवाद और गतिरोध के बिंदु
- राज्यपाल का पद: राज्यपालों द्वारा राज्य विधानमंडलों द्वारा पारित विधेयकों को अनिश्चित काल के लिए रोकना।
- वित्तीय संघवाद: उपकर और अधिभार के माध्यम से केंद्र द्वारा राजस्व का बड़ा हिस्सा अपने पास रखना, जिससे राज्यों का विभाज्य पूल कम हो रहा है।
- विधायी अतिक्रमण: शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे विषयों पर 'एक राष्ट्र, एक नीति' के नाम पर राज्यों की विशिष्ट आवश्यकताओं की अनदेखी।
न्यायिक दृष्टिकोण और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश
- एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994): संघवाद को संविधान की मूल संरचना माना और आर्टिकल-356 के दुरुपयोग पर सीमाएँ लगाईं।
- NCT दिल्ली बनाम भारत संघ (2018): चुनी हुई सरकार की संवैधानिक भूमिका और सहकारी संघवाद पर बल दिया।
- रामेश्वर प्रसाद बनाम भारत संघ (2006): बिहार विधानसभा विघटन को असंवैधानिक बताते हुए राज्यपाल की सिफारिशों को न्यायिक समीक्षा के अधीन माना।
- दिल्ली बनाम केंद्र (2023): चुनी हुई दिल्ली सरकार की प्रशासनिक शक्तियों और लोकतांत्रिक जवाबदेही को मान्यता दी।
संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 1: भारत राज्यों का एक संघ है।
- सातवीं अनुसूची: संघ, राज्य और समवर्ती सूचियों के माध्यम से शक्तियों का स्पष्ट विभाजन।
- अनुच्छेद 245-255: केंद्र और राज्यों के बीच विधायी संबंधों का विवरण।
- अनुच्छेद 268-293: केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों का ढांचा।
- अनुच्छेद 356: राज्यों में राष्ट्रपति शासन (जिसका दुरुपयोग संघवाद के लिए सबसे बड़ा खतरा रहा है)।
विकेंद्रीकरण और राज्यों की स्वायत्तता का प्रभाव
राज्यों को स्वायत्तता देने के सकारात्मक परिणाम 'प्रयोगशाला' के रूप में देखे जा सकते हैं:
- उदाहरण: तमिलनाडु का 'मिड-डे मील' और 'पब्लिक हेल्थ मॉडल' बाद में राष्ट्रीय नीतियां बनीं।
- प्रभाव: स्वायत्तता नवाचार को जन्म देती है। जब राज्य आर्थिक रूप से स्वतंत्र होते हैं, तो वे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत का प्रतिनिधित्व बेहतर ढंग से कर सकते हैं (जैसे 'इन्वेस्ट तमिलनाडु' अभियान)।
तमिलनाडु का परिप्रेक्ष्य
तमिलनाडु संघवाद की रक्षा में 'बौद्धिक नेतृत्व' प्रदान कर रहा है:
- राजमन्नार समिति (1969) से लेकर कुरियन जोसेफ समिति (2026) तक, तमिलनाडु का रुख स्पष्ट है "राज्यों में स्वायत्तता, केंद्र में संघवाद"।
- न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ रिपोर्ट की सिफारिशें (2026):
- राज्यपालों के लिए 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ इंस्ट्रक्शंस' (दिशानिर्देश) का कोडिफिकेशन।
- शिक्षा को पुन: राज्य सूची में स्थानांतरित करना।
- लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन को जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों के हितों की रक्षा करते हुए स्थगित करना।
विश्लेषण
अत्यधिक केंद्रीकरण न केवल राज्यों को कमजोर करता है, बल्कि केंद्र को भी उन कार्यों के बोझ से दबा देता है जिन्हें वह कुशलतापूर्वक नहीं कर सकता। वास्तविक एकता "एकरूपता" में नहीं बल्कि "विविधता के सम्मान" में है। यदि भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनना है, तो उसे 28 'इंजन' (राज्यों) की आवश्यकता है, न कि केवल एक केंद्रीय शक्ति की।
आगे की राह
- संस्थागत सुधार: अंतर-राज्य परिषद (आर्टिकल-263) को केवल एक सलाहकार निकाय के बजाय एक सशक्त निर्णय लेने वाली संस्था बनाना।
- राजकोषीय सुधार: उपकर को विभाज्य पूल का हिस्सा बनाना ताकि राज्यों को उनका उचित हिस्सा मिले।
- सहकारी संघवाद से प्रतिस्पर्धी संघवाद: राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना, न कि केंद्र द्वारा उन पर नियंत्रण।
निष्कर्ष
भारत का संघवाद एक 'साझा संवैधानिक उद्यम' है। जैसा कि के. संथानम ने कहा था, एक वास्तविक संघीय प्रणाली तभी टिक सकती है जब शक्तियों का सीमांकन स्पष्ट और न्यायपूर्ण हो। तमिलनाडु द्वारा उठाई गई आवाज केवल एक राज्य की मांग नहीं, बल्कि भारत के लोकतंत्र को और अधिक परिपक्व और समावेशी बनाने का एक रोडमैप है।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023 की धारा 44(3) की संवैधानिकता की समीक्षा करने के लिए मामले को संविधान पीठ के पास भेजने का निर्णय लिया है। मुख्य चिंता यह है कि क्या नया डेटा कानून आरटीआई अधिनियम को कमजोर कर नागरिकों के सूचना प्राप्त करने के अधिकार पर "करारा प्रहार" कर रहा है।
परिचय: RTI अधिनियम और DPDP अधिनियम 2023
- RTI अधिनियम (2005): यह नागरिकों को सरकारी कार्यों और निर्णयों के बारे में जानकारी प्राप्त करने का अधिकार देता है ताकि शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
- DPDP अधिनियम (2023): यह डिजिटल व्यक्तिगत डेटा के प्रसंस्करण को विनियमित करने वाला भारत का पहला व्यापक कानून है। इसका उद्देश्य व्यक्तियों की निजता की रक्षा करना और डेटा के दुरुपयोग को रोकना है।
चर्चा के कारण
- धारा 44(3) का विवाद: याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि DPDP अधिनियम की धारा 44(3) ने आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(j) को इस तरह संशोधित किया है कि अब व्यक्तिगत जानकारी प्राप्त करना लगभग असंभव हो गया है।
- न्यायिक टिप्पणी: मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत ने इसे "जटिल और संवेदनशील" कानूनी प्रश्न माना है।
- कार्यकारी विवेक: अधिवक्ताओं का आरोप है कि सरकार ने "छेनी के बजाय हथौड़े" का उपयोग कर पारदर्शिता को खत्म करने की कोशिश की है।
सूचना बनाम निजता: विवाद और प्रासंगिकता
यह विवाद मूलतः "जानने के अधिकार" और "निजता के अधिकार" के बीच है।
- विवाद: आरटीआई कार्यकर्ताओं का मानना है कि भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए अक्सर लोक सेवकों की 'व्यक्तिगत जानकारी' (जैसे संपत्ति का विवरण, शिक्षा प्रमाण पत्र) की आवश्यकता होती है। नया कानून इसे 'निजता' के नाम पर पूरी तरह प्रतिबंधित कर देता है।
- प्रासंगिकता: एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए पारदर्शिता जरूरी है, लेकिन डिजिटल युग में पहचान की चोरी और डेटा लीक को रोकने के लिए निजता भी अनिवार्य है।
दोनों अधिनियमों के विस्तृत प्रावधान
प्रावधान | RTI अधिनियम (धारा 8(1)(j) - मूल) | DPDP अधिनियम 2023 (धारा 44(3) के बाद) |
प्रकटीकरण का आधार | यदि जानकारी का सार्वजनिक हित से संबंध है, तो दी जा सकती थी। | व्यक्तिगत जानकारी के प्रकटीकरण पर 'पूर्ण प्रतिबंध' जैसा प्रभाव। |
निर्णयकर्ता | लोक सूचना अधिकारी (PIO) विवेक का उपयोग कर सकता था। | विवेक की गुंजाइश लगभग समाप्त, डेटा संरक्षण को प्राथमिकता। |
अपवाद | यदि जानकारी संसद को देने से मना नहीं की जा सकती, तो नागरिक को भी मिलेगी। | इस सुरक्षा कवच को हटा दिया गया है। |
महत्व और प्रभाव: सूचना बनाम निजता
- जवाबदेही पर प्रभाव: यदि सरकारी अधिकारियों की नियुक्तियों या उनके निर्णयों से जुड़ी जानकारी को 'व्यक्तिगत' कहकर छुपाया गया, तो सार्वजनिक जवाबदेही कम हो जाएगी।
- भ्रष्टाचार पर प्रभाव: लोक मूल्यांकन और मनरेगा जैसे कार्यों में लाभार्थियों की सूची 'व्यक्तिगत डेटा' होने के कारण सार्वजनिक नहीं हो पाएगी, जिससे पारदर्शिता खत्म होगी।
संवैधानिक प्रावधान और अन्य कानून
- अनुच्छेद 19(1)(a): अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, जिसमें 'सूचना का अधिकार' निहित है।
- अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने 'निजता के अधिकार' को शामिल किया है।
- पुट्टस्वामी निर्णय (2017): 9 न्यायाधीशों की पीठ ने निजता को मौलिक अधिकार घोषित किया था।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने निर्णय
- राज नारायण बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1975): कोर्ट ने कहा कि लोगों को हर सार्वजनिक कार्य के बारे में जानने का अधिकार है।
- ADR बनाम भारत संघ (2002): मतदाताओं को उम्मीदवारों की संपत्ति और आपराधिक रिकॉर्ड (जो व्यक्तिगत डेटा है) जानने का अधिकार दिया गया।
- गिरीश रामचंद्र देशपांडे मामला (2012): यहाँ कोर्ट ने लोक सेवक के मेमो और प्रदर्शन रिपोर्ट को व्यक्तिगत जानकारी मानकर सुरक्षा दी थी।
अंतरराष्ट्रीय विश्लेषण
- यूरोपीय संघ (EU) - GDPR मॉडल
- यूरोपीय संघ का जनरल डाटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन (GDPR) दुनिया का सबसे सख्त डेटा संरक्षण कानून माना जाता है। GDPR निजता को प्राथमिकता देता है, लेकिन इसमें 'लोकहित' के लिए स्पष्ट प्रावधान हैं।
- संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) - FOIA मॉडल
- अमेरिका में सूचना की स्वतंत्रता के लिए फ्रीडम ऑफ़ इनफार्मेशन एक्ट (FOIA) है। यहाँ 'निजता' (प्राइवेसी एक्ट, 1974) और 'सूचना' (FOIA) के बीच स्पष्ट अलगाव है।
- यूनाइटेड किंगडम (UK) - एकीकृत मॉडल
- ब्रिटेन में डेटा सुरक्षा और सूचना का अधिकार एक ही संस्था द्वारा विनियमित होते हैं। वहाँ इनफार्मेशन कमिश्नरस ऑफिस (ICO) दोनों कानूनों की देखरेख करता है। UK का डेटा प्रोटेक्शन एक्ट (2018) और RTI एक्ट (2000) एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि कोई जानकारी RTI के तहत मांगी जाती है, तो उसे केवल तभी रोका जा सकता है जब वह वास्तव में डेटा सुरक्षा सिद्धांतों का 'गंभीर उल्लंघन' करती हो।
विश्लेषण
DPDP अधिनियम का उद्देश्य सराहनीय है क्योंकि यह डेटा के अनधिकृत उपयोग को रोकता है। हालांकि, समस्या इसके "अति-व्यापक विस्तार" में है। आरटीआई अधिनियम में पहले से ही निजता के लिए संतुलन मौजूद था (धारा 8(1)(j))। नए संशोधन ने "जनहित" वाले विकल्प को लगभग समाप्त कर दिया है। यदि निजता के अधिकार का उपयोग सरकार अपनी कमियों को छिपाने के लिए 'ढाल' के रूप में करने लगे, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध होगा। संतुलन तभी बनेगा जब 'व्यक्तिगत जानकारी' को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाए ताकि यह भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष में बाधा न बने।
निष्कर्ष
RTI और DPDP के बीच का यह संघर्ष केवल दो कानूनों की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह "जवाबदेही बनाम सुरक्षा" का संतुलन है। समाधान यह है कि 'व्यक्तिगत जानकारी' को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाए और 'जनहित' के अपवाद को बहाल किया जाए। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ का निर्णय यह तय करेगा कि भारत एक 'निगरानी समाज' की ओर बढ़ेगा या एक 'पारदर्शी लोकतंत्र' के रूप में अपनी स्थिति और मजबूत करेगा।