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सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।


संदर्भ

भारत की भौगोलिक स्थिति इसे विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं के प्रति संवेदनशील बनाती है। विशेष रूप से ओडिशा जैसे तटीय राज्य 'जलवायु परिवर्तन' की अग्रिम पंक्ति में खड़े हैं। हाल ही में 16वें वित्त आयोग ने आपदा निधि के बंटवारे के लिए एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। हालाँकि, यह नया ढांचा एक गंभीर विरोधाभास पैदा करता है एक ओर आपदा प्रबंधन में ओडिशा का मॉडल वैश्विक स्तर पर सराहा जाता है, वहीं दूसरी ओर नए वित्तीय आवंटन में इसी राज्य को सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।

आपदा जोखिम: विधिक और वैज्ञानिक परिभाषा

आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत आपदा को किसी क्षेत्र में होने वाली ऐसी तबाही के रूप में परिभाषित किया गया है जो मानव क्षमता से बाहर हो। लेकिन आपदा 'जोखिम' को आधुनिक वैज्ञानिक ढांचे (IPCC की छठी रिपोर्ट के अनुसार) में तीन स्तंभों पर मापा जाता है:

  1. संकट: प्राकृतिक घटना की तीव्रता (जैसे चक्रवात या भूकंप)
  2. एक्सपोजर : संकट के मार्ग में मौजूद जनसंख्या और संपत्ति।
  3. भेद्यता: आपदा को झेलने की अक्षमता (आर्थिक और सामाजिक कारक)

चर्चा में क्यों?

16वें वित्त आयोग ने राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) के लिए ₹2,04,401 करोड़ आवंटित किए हैं (15वें आयोग से 59.5% अधिक) इसके बावजूद विवाद का मुख्य कारण आपदा जोखिम सूचकांक (DRI) का नया 'गुणात्मक फॉर्मूला' है:

  • ओडिशा का घाटा: ओडिशा की आपदा निधि हिस्सेदारी में 1.57 प्रतिशत अंक की भारी गिरावट आई है, जो सभी 28 राज्यों में सर्वाधिक है।
  • असमानता: 20 राज्यों की हिस्सेदारी कम हुई है। चौंकाने वाला तथ्य यह है कि ओडिशा का 'हजार्ड स्कोर' (12) देश में सबसे अधिक होने के बाद भी उसे कम फंड मिल रहा है।

16वें वित्त आयोग का नया फॉर्मूला: संरचनात्मक समस्या

आयोग नेआपदा जोखिम सूचकांक (DRI) = जोखिम X एक्सपोजर X भेद्यताका उपयोग किया है। समस्या सिद्धांत में नहीं, बल्कि इसके मापदंडों में है:

  • एक्सपोजर की त्रुटि: आयोग ने 'एक्सपोजर' को राज्य की कुल जनसंख्या (1 से 25 के स्केल पर) के आधार पर मापा है।
    • तर्क: यूपी को 25 और सिक्किम को 1 मिला।
    • त्रुटि: वैज्ञानिक रूप से 'एक्सपोजर' का अर्थ आपदा क्षेत्र में रहने वाली आबादी है। सुरक्षित पठार पर रहने वाली 10 करोड़ की आबादी का जोखिम, चक्रवात-प्रवण तट पर रहने वाली 3 करोड़ की आबादी से कम होता है।
  • भेद्यता की संकीर्णता: इसे प्रति व्यक्ति शुद्ध राज्य घरेलू उत्पाद (NSDP) के व्युत्क्रम से मापा गया है।
    • त्रुटि: यह केवल 'राजकोषीय क्षमता' मापता है, 'आपदा भेद्यता' नहीं। भेद्यता का अर्थ कच्चे घर, खराब स्वास्थ्य बुनियादी ढांचा और चेतावनी प्रणालियों की कमी है, कि केवल कम आय।

ओडिशा और अन्य राज्य

राज्य

हजार्ड स्कोर

जनसंख्या स्कोर

DRI (परिणाम)

विश्लेषण

ओडिशा

12 (सर्वोच्च)

5

79.8

उच्च जोखिम के बावजूद कम जनसंख्या के कारण फंड कम हुआ।

उत्तर प्रदेश

कम

25 (अधिक)

413.2

विशाल जनसंख्या के कारण सबसे अधिक लाभ।

बिहार

मध्यम

उच्च

224.2

जोखिम कम होने पर भी अधिक आवंटन।

केरल

मध्यम

4

34.5

उच्च प्रति व्यक्ति आय के कारण भेद्यता स्कोर (1.073) कम मिला, जिससे फंड घटा।

ओडिशा: आपदा प्रबंधन का वैश्विक आदर्श

ओडिशा ने पिछले दो दशकों में निवेश के माध्यम से एक 'शून्य मृत्यु दर' मॉडल विकसित किया है:

  • निवेश: प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, बहुउद्देशीय चक्रवात आश्रय और सामुदायिक भागीदारी।
  • विडंबना: जिस राज्य ने आपदा तैयारी में सबसे गहरा निवेश किया, उसे ही 'पुरस्कार' के बजाय वित्तीय 'दंड' मिल रहा है।

संवैधानिक और विधिक प्रावधान

  • अनुच्छेद 280: वित्त आयोग को संसाधनों के न्यायसंगत वितरण की शक्ति देता है।
  • सातवीं अनुसूची: आपदा प्रबंधन औपचारिक रूप से किसी सूची में नहीं है, लेकिन अवशिष्ट शक्तियों और समवर्ती सूची के माध्यम से केंद्र-राज्य दोनों का उत्तरदायित्व है।
  • अधिनियम 2005: यह वित्तीय संसाधनों (राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष/ राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष) के उचित प्रबंधन की वैधानिक अनिवार्यता तय करता है।

आवश्यक परिवर्तन: सुधार के सुझाव

विशेषज्ञों के अनुसार फॉर्मूले में निम्नलिखित सुधार होने चाहिए:

  • जनसंख्या डेटा: कुल जनसंख्या के बजाय BMTPC वल्नरेबिलिटी एटलस और जनगणना ब्लॉक डेटा का उपयोग कर 'जोखिम क्षेत्र' की आबादी गिनी जाए।
  • बहुआयामी सूचकांक: भेद्यता मापने के लिए NFHS-5, प्रधानमंत्री-फसल बीमा योजना, और NHM के डेटा का उपयोग हो (जैसे कच्चे घरों का %, कृषि निर्भरता)
  • संस्थागत मानकीकरण: NDMA को प्रतिवर्ष 'राज्य आपदा भेद्यता सूचकांक' जारी करने का वैधानिक आदेश दिया जाए।

विश्लेषण: 'जोखिम बनाम जनसंख्या'

वर्तमान फॉर्मूला 'जोखिम सूचकांक' नहीं बल्कि एक 'जनसंख्या हेडकाउंट' बन गया है। यह उन राज्यों को हतोत्साहित करता है जो:

  • जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे हैं।
  • आर्थिक प्रगति करके अपनी 'भेद्यता' कम करने की कोशिश कर रहे हैं।

यदि चक्रवात ओडिशा में आता है, तो आपदा राहत की आवश्यकता वहाँ की 'कुल जनसंख्या' पर नहीं, बल्कि प्रभावित 'तटीय आबादी' पर निर्भर करती है। 16वें वित्त आयोग का वर्तमान मॉडल इस बुनियादी वैज्ञानिक सत्य की अनदेखी करता है।

आगे की राह

  • वैज्ञानिक मापन: वित्तपोषण को राजनीति और प्रशासनिक सुविधा से हटाकर वैज्ञानिक डेटा (जैसे IMD और आपदा एटलस) पर आधारित किया जाए।
  • जलवायु लचीलापन: फंड आवंटन में भविष्य के जलवायु अनुमानों को शामिल किया जाए क्योंकि ओडिशा, केरल और असम जैसे राज्यों में आपदाओं की आवृत्ति बढ़ने वाली है।

निष्कर्ष

भारत के लिए आपदा वित्तपोषण में 'सहकारी संघवाद' और 'वित्तीय न्याय' को प्राथमिकता देना अनिवार्य है। 16वें वित्त आयोग को केवल जनसंख्या के बजाय 'वास्तविक क्षेत्रीय जोखिम' और 'संरचनात्मक संवेदनशीलता' को आवंटन का आधार बनाना चाहिए। ओडिशा जैसे आपदा-प्रवण राज्यों की सुरक्षा निधि में कटौती, उनके द्वारा वर्षों में विकसित किए गए 'डिजास्टर रेजिलिएंस' (आपदा लचीलापन) को कमजोर कर सकती है। अतः, एक वैज्ञानिक और जोखिम-आधारित वित्तीय ढांचा ही राष्ट्र की समग्र सुरक्षा सुनिश्चित करने की प्राथमिक आधारशिला है।

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।


संदर्भ

भारत में बिजली-संबंधी दुर्घटनाएँ कोई नई घटना नहीं हैं; पिछले दो दशकों में केरल, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में नग्न तारों, जर्जर खंभों तथा रख-रखाव की कमी के कारण अनेक दर्दनाक मृत्यु-घटनाएँ दर्ज की गई हैं। मानसून के मौसम में करंट लगने से भी स्थायी रूप से उच्च मृत्यु-दर देखी जाती रही है। औद्योगिक क्षेत्रों में विद्युत्उपकरणों की विफलता तथा ग्रामीण क्षेत्रों में वितरण-लाइन की खराब स्थिति ने लंबे समय से सुरक्षा-जोखिम बढ़ाए हैं। इसी क्रम में 1 दिसंबर 2025 को हरदोई और खर्गोन की घटनाएँ पुनः इस संरचनात्मक समस्या को उजागर करती हैं। इन दुर्घटनाओं ने यह प्रश्न और गम्भीर बना दिया है कि अवसंरचना में निरंतर निवेश, नियमित निरीक्षण तथा सुरक्षा-मानकों के कड़े पालन के बिना सार्वजनिक जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती।


बिजली-संबंधी मृत्यु

बिजली-संबंधी मृत्यु वह मृत्यु है जो प्रत्यक्ष विद्युत् स्पर्शाघात, विद्युत् आर्क/शॉर्ट-सर्किट, विद्युत् उपकरणों की त्रुटि, वितरण-लाइन से जुड़े हादसों अथवा इनसे उत्पन्न आग/विस्फोट के कारण घटित होती है। यह घरेलू, औद्योगिक, कृषि तथा सार्वजनिक वितरण तंत्रसभी स्तरों पर संभव है।


चर्चा में क्यों?

  • देश के विभिन्न भागों में बिजली-संबंधी दुखद घटनाएँ सामने आईं। उत्तर प्रदेश के हरदोई ज़िले के पंचमपुरवा ग्राम में एक मजदूर की विद्युत्स्पर्शाघात से मृत्यु तथा मध्य प्रदेश के खर्गोन ज़िले में विद्युत्खंभे ले जा रही ट्रैक्टरट्रॉली के पलटने से दो व्यक्तियों की मृत्युदोनों घटनाएँ यह दर्शाती हैं कि विद्युत्सुरक्षा भारत में अब भी गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है।
  • ताज़ा घटनाएँ इस बात को रेखांकित करती हैं कि ग्रामीण एवं शहरी दोनों क्षेत्रों में विद्युत्अवसंरचना की सुरक्षा तथा कार्य-प्रणालियों में अनेक कमियाँ विद्यमान हैं। यह विषय वर्तमान परिदृश्य में महत्त्वपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि यह सार्वजनिक सुरक्षा, प्रशासनिक उत्तरदायित्व, अवसंरचनात्मक गुणवत्ता, तथा मानवाधिकार जैसी बहुविषयक चिंताओं से जुड़ा है।


दुर्घटनाओं के प्रमुख कारण

  • सुरक्षा-जागरूकता और प्रशिक्षण का अभाव: उपकरणों, तारों और वितरण-लाइन के आसपास कार्य करते समय सुरक्षा-मानकों का पालन प्रायः नहीं किया जाता।
  • जर्जर एवं अनुपयुक्त विद्युत् अवसंरचना: नग्न तार, ढीले खंभे, खराब इंसुलेशन और पुरानी वितरण-व्यवस्थाएँ दुर्घटनाओं की संभावना बढ़ाती हैं।
  • अपर्याप्त रख-रखाव और भार-वितरण की समस्या: ट्रांसफ़ॉर्मर ओवरलोड, लाइन-फॉल्ट एवं रख-रखाव की कमी प्रमुख कारक हैं।
  • परिवहन और निर्माण-स्थलों पर सुरक्षा में लापरवाही: विद्युत् सामग्री/खंभों के परिवहन में सुरक्षा-नियमों की अनदेखी।
  • कानूनी प्रवर्तन में शिथिलता: दुर्घटनाओं के बाद जांच, दंडात्मक कार्रवाई तथा जवाबदेही की प्रक्रिया अक्सर धीमी अपूर्ण रहती है।


सरकारी पहलें

  • विद्युत् मंत्रालय एवं केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण द्वारा विद्युत् सुरक्षा के लिए दिशा-निर्देश, सुरक्षा पुस्तिकाएँ, जन-जागरूकता अभियानों तथा इलेक्ट्रिकल सेफ़्टी डे जैसी पहलें निरंतर संचालित हैं।
  • डिस्कॉम स्तर पर सुधार: कई राज्यों में वितरण-लाइनें सुरक्षित बनाने, फॉल्ट-सर्किट ब्रेकर लगाने तथा ओवरलोड प्रबंधन हेतु तकनीकी सुधार लागू किए जा रहे हैं।
  • नियामकीय ढाँचा: बिजली नियम, भारतीय मानक और केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण विनियम सुरक्षा के विस्तृत मानक प्रदान करते हैं, यद्यपि इनके क्रियान्वयन में अक्सर कमी देखी जाती है।


मानवाधिकार संस्थाएँ एवं गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका

  • राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (NSC) एवं अन्य संगठनों द्वारा विद्युत् सुरक्षा पर प्रशिक्षण, कार्यशालाएँ तथा सामुदायिक अभियानों का आयोजन किया जाता है।
  • अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ESFI, NFPA एवं OSHA जैसी संस्थाएँ विद्युत् सुरक्षा के सर्वोत्तम मानक विकसित करती हैं, जो भारत सहित अनेक देशों के लिए मार्गदर्शक हैं।
  • NGO और मानवाधिकार समूह दुर्घटना-पीड़ितों के लिए मुआवज़ा, शीघ्र जाँच तथा सुरक्षित कार्य-परिवेश की माँग उठाते रहते हैं।


संविधान एवं मानवाधिकार

भारत के संविधान का अनुच्छेद 21—“जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार”—राज्य पर यह कर्तव्य सौंपता है कि वह प्रत्येक नागरिक के जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित करे। विद्युत् अवसंरचना में लापरवाही या सुरक्षा-मानकों के अभाव के कारण यदि व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो यह जीवन-रक्षा की संवैधानिक परिधि में गंभीर प्रश्न उत्पन्न करता है। न्यायपालिका ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि सुरक्षित एवं गरिमामय जीवन Article 21 का मूल तत्व है।


विश्व परिदृश्य

विश्व के अनेक देशों में विद्युत् सुरक्षा को कठोर मानकों और कड़े प्रवर्तन द्वारा नियंत्रित किया जाता है। अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में OSHA और NFPA द्वारा निर्धारित सुरक्षा मानक अनिवार्य हैं। विकसित देशों में भी विद्युत् दुर्घटनाएँ होती हैं, परन्तु निरंतर निगरानी, तकनीकी आधुनिकीकरण और जनता में उच्च स्तर की जागरूकता के कारण मृत्यु-दर अपेक्षाकृत कम है।


विश्लेषण

भारतीय संदर्भ में समस्या केवल तकनीकी नहीं, बल्कि प्रशासनिक, सामाजिक और संरचनात्मक है। सुरक्षा-नियम उपस्थित होने के बावजूद उनका पालन असंगत है। ग्रामीण क्षेत्रों में अवसंरचना पुरानी है तथा शहरी विस्तार में वितरण-तंत्र पर बढ़ते भार के कारण जोखिम बढ़ रहा है। प्रभावी समाधान के लिए नीति-निर्माताओं को डेटा-आधारित योजना, कड़े प्रवर्तन, तथा नागरिक-जागरूकता के त्रि-स्तरीय ढाँचे को प्राथमिकता देनी होगी।


मार्ग-आगे

  1. सख्त प्रवर्तन और नियमित सुरक्षा-ऑडिट: केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण और राज्य डिस्कॉम्स को अवसंरचना का नियमित निरीक्षण तथा उच्च-जोखिम क्षेत्रों की प्राथमिकता-आधारित मरम्मत सुनिश्चित करनी चाहिए।
  2. जन-जागरूकता और प्रशिक्षण विस्तार: विद्यालयों, पंचायतों, निर्माण-स्थलों और कृषि क्षेत्रों में विद्युत्सुरक्षा पर अनिवार्य प्रशिक्षण कार्यक्रम।
  3. सुरक्षित परिवहन मानक: विद्युत् खंभों, तारों और भारी उपकरणों के परिवहन के लिए सख्त तकनीकी मानदंड और लाइसेंसिंग प्रणाली।
  4. तेज़ पारदर्शी जवाबदेही: दुर्घटना के मामलों में शीघ्र जांच, दायित्व निर्धारण और दोषियों पर समयबद्ध कार्रवाई।
  5. डेटा-संग्रहण में सुधार: दुर्घटना-संबंधी राष्ट्रीय डेटाबेस को मजबूत करना ताकि नीति-निर्माण वैज्ञानिक आधार पर हो सके।


निष्कर्ष

बिजली-संबंधी मृत्यु केवल एक तकनीकी या यांत्रिक समस्या नहीं, बल्कि यह मानव-जीवन, प्रशासनिक उत्तरदायित्व और संवैधानिक मूल्यों से गहराई से जुड़ा हुआ विषय है। 1 दिसंबर 2025 की घटनाएँ यह स्मरण कराती हैं कि अवसंरचना का आधुनिकीकरण, सुरक्षा-मानकों का कड़ाई से पालन, जन-जागरूकता और पारदर्शी जवाबदेही ही भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोक सकती हैै। 

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  • चर्चा में क्यों?
    • 16वें वित्त आयोग के साथ एक बैठक में, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री ने राज्य की विशिष्ट कमज़ोरियों को बेहतर ढंग से दर्शाने के लिए आपदा जोखिम सूचकांक (डीआरआई) में संशोधन की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। यह माँग आपदा-प्रवण क्षेत्रों में संसाधनों के समान आवंटन के लिए सटीक मूल्यांकन उपकरणों के महत्व को रेखांकित करती है।
  • आपदा जोखिम सूचकांक (डीआरआई) के बारे में
    • डीआरआई को 15वें वित्त आयोग द्वारा विभिन्न राज्यों के सामने आने वाले आपदा जोखिमों को ध्यान में रखते हुए राजकोषीय हस्तांतरण में निष्पक्षता लाने के लिए विकसित किया गया था। यह 14 खतरों, 14 कमजोरियों और 2 जोखिम मापदंडों का मूल्यांकन करता है। खतरों में भूकंप, चक्रवात, बाढ़ और सूखा शामिल हैं, जबकि कमजोरियों में ग्रामीण और शहरी गरीब, महिलाएं और बच्चे जैसे कारकों पर विचार किया जाता है। जोखिम को जनसंख्या और सकल घरेलू उत्पाद संकेतकों का उपयोग करके मापा जाता है।
    • इन आयामों को एकीकृत करके, सूचकांक संसाधन वितरण को निर्देशित करने, तैयारियों को मजबूत करने, तथा यह सुनिश्चित करने में मदद करता है कि उच्च जोखिम वाले राज्यों को पर्याप्त वित्तीय सहायता प्राप्त हो।

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  • चर्चा में क्यों?
    • 1 सितंबर, 2025 को अफ़ग़ानिस्तान में एक शक्तिशाली भूकंप आया, जिसमें 1,400 से ज़्यादा लोग मारे गए और कम से कम 3,100 घायल हुए। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने बताया कि नांगरहार प्रांत के जलालाबाद के पास आठ किलोमीटर की गहराई पर 6.3 तीव्रता का पहला भूकंप आया, जिसके बाद 4.7 तीव्रता का एक और झटका आया। सीमित संसाधनों और तालिबान शासन पर प्रतिबंधों के कारण कुनार और नांगरहार में बचाव कार्य बाधित हो रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र और सहायता एजेंसियों ने सहायता का वादा किया है।
  • प्रमुख प्रावधान:-
    • भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटों के मिलन बिंदु पर स्थित अफ़ग़ानिस्तान भूकंप के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बना हुआ है। 1900 से, पूर्वोत्तर में 7 से ज़्यादा तीव्रता के 12 भूकंप आ चुके हैं। चिली से तुलना करें, जहाँ समान तीव्रता के भूकंप आते हैं, लेकिन सख्त भवन निर्माण नियमों के कारण न्यूनतम हताहत होते हैं, तो अफ़ग़ानिस्तान की कमज़ोरी साफ़ दिखाई देती है। अक्टूबर 2023 में हेरात में आए भूकंप, जिसकी तीव्रता भी 6.3 थी , में 1,500 से ज़्यादा लोग मारे गए और 63,000 घर क्षतिग्रस्त हुए। भूकंपों का जानलेवा होना ज़रूरी नहीं है; अफ़ग़ानिस्तान को जन जागरूकता उपायों के साथ-साथ मज़बूत भवन मानकों को तुरंत अपनाना और लागू करना होगा।

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  • चर्चा में क्यों?
    • केंद्रीय जल शक्ति मंत्री ने आपदा प्रबंधन प्रयासों को समर्थन देने के लिए डिज़ाइन किए गए नए एकीकृत बाढ़ पूर्वानुमान प्लेटफॉर्म सी-फ्लड का उद्घाटन किया है।
  • प्रमुख प्रावधान:-
    • यह वेब-आधारित प्रणाली उन्नत 2-डी हाइड्रोडायनामिक मॉडलिंग का उपयोग करके दो दिन पहले गांव-स्तर पर बाढ़ के पूर्वानुमान प्रदान करती है। सी-फ्लड विभिन्न राष्ट्रीय और क्षेत्रीय एजेंसियों से बाढ़ के आंकड़ों को एक साथ लाता है, जो एकीकृत पूर्वानुमान और वास्तविक समय के खतरे का मानचित्रण प्रदान करता है।
    • लगभग 40 मिलियन हेक्टेयर - भारत के भूमि क्षेत्र का 12% - बाढ़-प्रवण है। सी-फ्लड समय पर बाढ़ के नक्शे और जल स्तर के पूर्वानुमान प्रदान करके इस चुनौती का समाधान करता है ताकि अधिकारियों को तैयारी और प्रतिक्रिया में सहायता मिल सके।
    • सी-फ्लड को सी-डैक पुणे, केंद्रीय जल आयोग, जल संसाधन विभाग और राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग केंद्र द्वारा संयुक्त रूप से विकसित किया गया है। इसे राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन (NSM) के तहत क्रियान्वित किया गया है , जो 2015 में शुरू की गई MeitY और DST की एक संयुक्त पहल है ।
    • वर्तमान में महानदी, गोदावरी और तापी नदी घाटियों को कवर करने वाली यह प्रणाली जल्द ही देश भर में विस्तारित हो जाएगी और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन आपातकालीन प्रतिक्रिया पोर्टल (एनडीईएम) के साथ एकीकृत हो जाएगी।

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  • चर्चा में क्यों?
    • विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो (एएआईबी) अहमदाबाद हवाई अड्डे पर हाल ही में हुए एयर इंडिया विमान हादसे की व्यापक जांच करेगा। इस घटना के कारण का पता लगाने और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए औपचारिक जांच शुरू कर दी गई है।
  • प्रमुख प्रावधान:-
    • 2012 में स्थापित, AAIB नागरिक उड्डयन मंत्रालय के तहत एक संलग्न कार्यालय के रूप में कार्य करता है। इसका गठन अंतर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन सम्मेलन (1944) के अनुलग्नक 13 के प्रति भारत की प्रतिबद्धता के अनुरूप है, जो विमान दुर्घटना जांच के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानकों की रूपरेखा तैयार करता है।
    • ब्यूरो की प्राथमिक भूमिका विमान (दुर्घटनाओं और घटनाओं की जांच) नियम, 2017 के तहत जांच की देखरेख करना और कानूनी प्रक्रियाओं का समर्थन करना है। यह विशेष रूप से 2,250 किलोग्राम से अधिक कुल वजन (एयूडब्ल्यू) वाले विमान या टर्बोजेट विमान से जुड़ी सभी दुर्घटनाओं और गंभीर घटनाओं की जांच करता है।
    • स्वतंत्र और वस्तुनिष्ठ जांच सुनिश्चित करके, AAIB विमानन सुरक्षा मानकों को बेहतर बनाने और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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  • चर्चा में क्यों?
    • विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो (एएआईबी) अहमदाबाद हवाई अड्डे पर हाल ही में हुए एयर इंडिया विमान हादसे की व्यापक जांच करेगा। इस घटना के कारण का पता लगाने और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए औपचारिक जांच शुरू कर दी गई है।
  • प्रमुख प्रावधान:-
    • 2012 में स्थापित, AAIB नागरिक उड्डयन मंत्रालय के तहत एक संलग्न कार्यालय के रूप में कार्य करता है। इसका गठन अंतर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन सम्मेलन (1944) के अनुलग्नक 13 के प्रति भारत की प्रतिबद्धता के अनुरूप है, जो विमान दुर्घटना जांच के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानकों की रूपरेखा तैयार करता है।
    • ब्यूरो की प्राथमिक भूमिका विमान (दुर्घटनाओं और घटनाओं की जांच) नियम, 2017 के तहत जांच की देखरेख करना और कानूनी प्रक्रियाओं का समर्थन करना है। यह विशेष रूप से 2,250 किलोग्राम से अधिक कुल वजन (एयूडब्ल्यू) वाले विमान या टर्बोजेट विमान से जुड़ी सभी दुर्घटनाओं और गंभीर घटनाओं की जांच करता है।
    • स्वतंत्र और वस्तुनिष्ठ जांच सुनिश्चित करके, AAIB विमानन सुरक्षा मानकों को बेहतर बनाने और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


चर्चा में क्यों?

o ICDRI 2025 में, भारत ने पाँच वैश्विक प्राथमिकताओं पर प्रकाश डाला: शिक्षा में आपदा तन्यकता को शामिल करना, वैश्विक डिजिटल आपदा डेटा प्लेटफ़ॉर्म लॉन्च करना, विकासशील देशों के लिए अभिनव वित्त को सक्षम करना, SIDS को बड़े महासागर राष्ट्रों के रूप में मान्यता देना और प्रारंभिक चेतावनी क्षमताओं को बढ़ावा देना।

प्रमुख प्रावधान:-

o एक प्रमुख आकर्षण "SIDS में तटीय तन्यकता के लिए कार्रवाई का आह्वान" था, जिसमें SIDS ग्लोबल डेटा हब 2.0, 2030 तक सार्वभौमिक बहु-खतरा प्रारंभिक चेतावनी और वित्त मंत्रालय-आधारित तन्यकता इकाइयों की स्थापना जैसी दस रणनीतिक पहलों का प्रस्ताव था।

o यूरोप में पहली बार, नीस में आयोजित सम्मेलन में स्केलेबल जलवायु-तन्यक बुनियादी ढाँचा सुनिश्चित करने के लिए एकीकृत निवेश रणनीतियों और नीतिगत सुसंगतता पर जोर दिया गया।


o भारत द्वारा शुरू किए गए वैश्विक गठबंधन CDRI के तहत आयोजित यह मंच बुनियादी ढाँचे में जलवायु अनुकूलन और तन्यकता को बढ़ावा देने के लिए एक प्रमुख मंच है।

o वर्ष 2050 तक लचीले बुनियादी ढांचे में 10 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के निवेश को उत्प्रेरित करने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य के साथ, सीडीआरआई दुनिया भर में कमजोर तटीय समुदायों को समर्थन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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  • मुल्लापेरियार बांध के रखरखाव के संबंध में केरल द्वारा उठाई गई चिंताओं का समाधान करे।
  • राष्ट्रीय बांध सुरक्षा प्राधिकरण (एनडीएसए) के बारे में:
    • एनडीएसए राष्ट्रीय बांध सुरक्षा अधिनियम, 2021 की धारा 8(1) के तहत केंद्र सरकार द्वारा स्थापित एक वैधानिक निकाय है।
  • कार्य:
    • एनडीएसए पूरे भारत में बांधों के विनियमन, निगरानी और निरीक्षण के लिए जिम्मेदार है।
    • यह पूरे देश में बांधों के निर्माण, रखरखाव और संचालन के लिए नीतियों और दिशानिर्देशों को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
    • एनडीएसए की एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी राज्य बांध सुरक्षा संगठनों के बीच या राज्य संगठन और राज्य के भीतर बांध मालिक के बीच विवादों को सुलझाना है।
    • एनडीएसए बांध सुरक्षा के संबंध में जनता को शिक्षित करने के लिए राष्ट्रीय जागरूकता अभियान भी चलाता है।
    • प्राकृतिक आपदाओं या आपात स्थितियों की स्थिति में, प्राधिकरण यह सुनिश्चित करता है कि आपातकालीन प्रतिक्रिया योजनाएं मौजूद हों।
    • एनडीएसए का नेतृत्व एक अध्यक्ष करता है तथा इसे पांच सदस्यों का समर्थन प्राप्त है जो इसके विभिन्न विभागों का नेतृत्व करते हैं: नीति और अनुसंधान, तकनीकी, विनियमन, आपदा लचीलापन, तथा प्रशासन और वित्त।
    • इसका मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है।