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वेनेज़ुएला में भूकंपीय आपदा: एक विस्तृत भू-वैज्ञानिक और मानवीय विश्लेषण

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।


संदर्भ

वेनेज़ुएला में 24 जून, 2026 को आए दो शक्तिशाली भूकंपों (क्रमशः 7.2 और 7.5 तीव्रता के 'डबलेट' भूकंप) ने देश के उत्तरी हिस्से में भारी तबाही मचाई है। ये घटनाएँ दशकों से चल रही भू-गर्भीय हलचलों का परिणाम हैं, जो इस क्षेत्र को विश्व के सबसे संवेदनशील भूकंपीय क्षेत्रों में से एक बनाती हैं।

वेनेज़ुएला:

दक्षिण अमेरिका के उत्तरी तट पर स्थित वेनेज़ुएला, कैरेबियन सागर और अटलांटिक महासागर के बीच एक रणनीतिक स्थान रखता है। यह देश अपने विशाल तेल और खनिज भंडारों के लिए जाना जाता है, लेकिन वर्तमान में यह राजनीतिक और आर्थिक चुनौतियों के साथ-साथ प्राकृतिक आपदाओं के दोहरे संकट से जूझ रहा है।

चर्चा के प्रमुख कारण

  • डबलेट भूकंप: 39 सेकंड के अंतराल पर आए दो बड़े भूकंपों ने संरचनाओं को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया है।

  • मानवीय त्रासदी: बड़ी संख्या में लोग हताहत हुए हैं, और सैकड़ों लोग मलबे में फंसने की सूचना है।
  • आधारभूत ढांचे को क्षति: कराकस का अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा और प्रमुख पेट्रोकेमिकल सुविधाएं क्षतिग्रस्त हुई हैं।
  • द्वितीयक खतरे: भूकंप के बाद भूस्खलन और द्रवीकरण का खतरा बढ़ गया है, जिससे राहत कार्यों में कठिनाई हो रही है।

वेनेज़ुएला की भौगोलिक अवस्थिति और टेक्टोनिक प्लेट्स

वेनेज़ुएला 'कैरेबियन प्लेट' और 'दक्षिण अमेरिकी प्लेट' की सीमा पर स्थित है। यहाँ 'बोकोनो-मोरोन-एल पिलर' फॉल्ट सिस्टम है, जो 1,300 किमी लंबा है और कैलिफोर्निया के 'सैन एंड्रियास फॉल्ट' के समान है। ये प्लेटें एक-दूसरे के क्षैतिज खिसकती हैं जिससे भारी ऊर्जा संचित होती है और अचानक भूकंप के रूप में निकलती है। कोलंबिया, पनामा और कैरेबियन द्वीप समूह भी इसी तरह की प्लेट सीमाओं पर स्थित हैं।

भूकंप क्या है?

भूकंप पृथ्वी की सतह का अचानक हिलना है, जो पृथ्वी के भीतर संचित ऊर्जा के अचानक रिलीज होने के कारण होता है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  • प्लेट टेक्टोनिक्स: प्लेटों का टकराना, एक-दूसरे के ऊपर चढ़ना या आपस में रगड़ना भूकंप का सबसे सामान्य कारण है।
  • ज्वालामुखी विस्फोट: ज्वालामुखी के फटने से भी ज़मीन के अंदर तीव्र कंपन उत्पन्न होते हैं।
  • मानवजनित गतिविधियाँ: खदानों में विस्फोट, परमाणु परीक्षण और फ्रैकिंग भी कंपन पैदा करते हैं।

भूकंपीय आपदा न्यूनीकरण: नीतिगत और व्यावहारिक उपाय

भूकंपीय आपदाओं के प्रति 'प्रतिक्रिया' के स्थान पर 'सक्षमता और सहनशीलता' पर आधारित दृष्टिकोण आवश्यक है:

  • भूकंपीय-अनुकूल अवसंरचना: निर्माण में 'बेस आइसोलेशन' तकनीक का एकीकरण अनिवार्य हो, जो आधार और अधिरचना के बीच शॉक-एब्जॉर्बिंग मैकेनिज्म द्वारा संरचनात्मक क्षति को रोकती है।
  • मानक सामग्री का उपयोग: निर्माण में स्टील और प्रबलित कंक्रीट (RCC) जैसे उच्च तन्यता वाले पदार्थों का प्रयोग सुनिश्चित हो, जो झटकों को अवशोषित कर ऊर्जा वितरित करने में सक्षम हैं।
  • विनियामक सुदृढ़ीकरण (जापान मॉडल): निर्माण संहिताओं का कड़ाई से अनुपालन हो। जापान की भांति नियमित ऑडिट और सख्त प्रवर्तन तंत्र द्वारा संरचनात्मक पतन को न्यूनतम किया जाए।
  • सामुदायिक तैयारी: आपदा प्रबंधन को सामुदायिक स्तर पर अपनाना अनिवार्य है। इसमें 'ड्रॉप, कवर और होल्ड-ऑन' प्रोटोकॉल की नियमित ड्रिल और प्रत्येक परिवार में आपातकालीन किट (प्राथमिक चिकित्सा, गैर-नाशवान भोजन पेयजल) की उपलब्धता सुनिश्चित करना दीर्घकालिक लचीलेपन हेतु आधारभूत है।

वैश्विक प्रतिक्रिया और भारत की भूमिका

  • विश्व: संयुक्त राष्ट्र, UNICEF और विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) ने तत्काल सहायता प्रदान करने के लिए लामबंदी शुरू कर दी है।

  • भारत: भारत ने वेनेज़ुएला के साथ एकजुटता व्यक्त की है और मानवीय आधार पर हर संभव सहायता देने का आश्वासन दिया है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण

  • डबलेट भूकंप : जब अत्यल्प समयांतराल में समान क्षेत्र में लगभग समान तीव्रता के दो बड़े भूकंप आते हैं, तो उन्हें डबलेट भूकंप कहा जाता है।

  • PAGER प्रणाली (USGS): USGS की प्रॉम्प्ट असेसमेंट ऑफ ग्लोबल अर्थक्वेक्स फॉर रिस्पॉन्स (PAGER) प्रणाली भूकंप के बाद संभावित जनहानि एवं आर्थिक क्षति का त्वरित आकलन करती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय राहत एजेंसियों को शीघ्र निर्णय लेने में सहायता मिलती है।
  • संशोधित मर्केली तीव्रता पैमाना (एमएमआई)
  • रिक्टर/मोमेंट मैग्नीट्यूड  (Mw): भूकंप द्वारा मुक्त ऊर्जा को मापता है।
  • MMI पैमाना: वास्तविक भूमि कंपन एवं संरचनात्मक क्षति का आकलन करता है।

अर्थात समान तीव्रता वाले दो भूकंप विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग स्तर की क्षति पहुँचा सकते हैं।

अंतरराष्ट्रीय मानक और दिशा-निर्देश

  • सेंडाई फ्रेमवर्क (2015-2030)

                यह आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए वैश्विक स्तर पर सबसे महत्वपूर्ण नीतिगत दस्तावेज है।

  • मुख्य उद्देश्य: इसका लक्ष्य आपदाओं से होने वाली मौतों, प्रभावित लोगों की संख्या और आर्थिक नुकसान को बड़े पैमाने पर कम करना है।
  • प्रमुख प्राथमिकता: यह 'बिल्ड बैक बेटर' के सिद्धांत पर जोर देता है, यानी आपदा के बाद निर्माण ऐसा हो जो भविष्य के झटकों को झेलने में पहले से अधिक सक्षम हो।
  • अंतरराष्ट्रीय निर्माण मानक (IBC)

                 भूकंपीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए निर्माण क्षेत्र में वैश्विक मानक अपनाए जाते हैं:

  • भूकंपीय डिज़ाइन कोड: विभिन्न देश अपने यहाँ 'यूरोकोड 8' या अमेरिकी 'ASCE 7' जैसे मानकों का पालन करते हैं। ये मानक यह निर्धारित करते हैं कि किसी इमारत को कितनी तीव्रता के भूकंपीय बल को झेलने के लिए डिज़ाइन किया जाना चाहिए।
  • इंजीनियरिंग तकनीकें: इनमें 'बेस आइसोलेशन' और 'डैम्पिंग सिस्टम' जैसे मानक शामिल हैं, जो इमारतों को कंपन के दौरान लचीलापन प्रदान करते हैं।
  • संयुक्त राष्ट्र आपदा मूल्यांकन और समन्वय (UNDAC)

जब किसी देश में विनाशकारी भूकंप आता है, तो संयुक्त राष्ट्र का UNDAC दल अंतरराष्ट्रीय मानक        संचालन प्रक्रियाओं (SOPs) के तहत मदद करता है:

  • त्वरित प्रतिक्रिया: भूकंप के तुरंत बाद मलबे में दबे लोगों को खोजने के लिए 'अंतरराष्ट्रीय खोज और बचाव सलाहकार समूह' (INSARAG) के मानकों का पालन किया जाता है।

भारत के लिए सीख

भारत का लगभग 59% भूभाग विभिन्न भूकंपीय जोखिम क्षेत्रों में स्थित है। भारत को निम्न उपायों को और सुदृढ़ करना चाहिए

  • आईएस 1893: भवनों के भूकंपरोधी डिज़ाइन हेतु भारतीय मानक।
  • आईएस 4326: भूकंपरोधी निर्माण तकनीकों के लिए भारतीय मानक।
  • एनडीएमए दिशा-निर्देश: जोखिम न्यूनीकरण, तैयारी एवं त्वरित प्रतिक्रिया हेतु राष्ट्रीय रूपरेखा।
  • राष्ट्रीय भूकंपीय जोनिंग मानचित्र: भूकंपीय संवेदनशीलता के आधार पर क्षेत्रों का वर्गीकरण।
  • रेट्रोफिटिंग: पुराने भवनों को आधुनिक तकनीकों से अधिक सुरक्षित बनाना।
  • भूकंप प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली: भूकंपीय तरंगों के पहुँचने से पूर्व चेतावनी देकर जन-धन की हानि कम करना।

विश्लेषण

यह आपदा केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं है, बल्कि यह वेनेज़ुएला के पुराने होते बुनियादी ढांचे की कमजोरी को भी उजागर करती है। 'डबलेट भूकंप' ने साबित कर दिया है कि किसी भी विकास योजना में भूकंपीय संवेदनशीलता को शामिल करना अब अनिवार्य है।

आगे की राह

  • दीर्घकालिक: पूरे फॉल्ट सिस्टम का पुनर्मूल्यांकन और जोखिम मैपिंग करें।

  • निर्माण नीतियों में सुधार: पुराने भवनों का रेट्रोफिटिंग (मजबूतीकरण) और नए भवनों के लिए कड़े भूकंपीय मानक लागू करें।
  • सामुदायिक प्रशिक्षण: आपदा के दौरान तत्काल प्रतिक्रिया देने के लिए स्थानीय नागरिक सुरक्षा टीमों को प्रशिक्षित करें।
  • तकनीकी निवेश: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, GIS एवं रिमोट सेंसिंग आधारित आपदा पूर्वानुमान प्रणालियों में निवेश को प्राथमिकता दें।

निष्कर्ष

वेनेज़ुएला का यह भूकंप स्मरण कराता है कि भूकंप को रोका नहीं जा सकता, परंतु वैज्ञानिक नियोजन, भूकंपरोधी अवसंरचना, प्रभावी आपदा प्रबंधन, सामुदायिक तैयारी तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से इसके विनाशकारी प्रभावों को उल्लेखनीय रूप से कम किया जा सकता है। यही आपदा-सहिष्णु एवं सतत विकास की वास्तविक आधारशिला है।


अमोनिया गैस रिसाव: एक औद्योगिक त्रासदी और सुरक्षा प्रोटोकॉल की आवश्यकता

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।


संदर्भ

औद्योगीकरण के इस युग में कारखाने आर्थिक विकास के स्तंभ हैं, लेकिन अक्सर लाभ की होड़ में मानवीय सुरक्षा को दरकिनार कर दिया जाता है। हाल ही में तमिलनाडु के तिरुवल्लुर जिले में स्थित एक सीफूड प्रोसेसिंग यूनिट में अमोनिया गैस रिसाव की एक भयावह घटना सामने आई। यह लेख औद्योगिक सुरक्षा के गिरते मानकों और भविष्य की चुनौतियों पर प्रकाश डालता है।

अमोनिया गैस: प्रकृति और प्रभाव

अमोनिया (NH3) एक तीखी गंध वाली, रंगहीन और अत्यधिक घुलनशील गैस है, जिसके गुण और जोखिम निम्नलिखित हैं:

  • महत्व और उपयोग: यह कोल्ड स्टोरेज इकाइयों, उर्वरक निर्माण, और फार्मास्यूटिकल्स में एक अनिवार्य रेफ्रिजरेंट के रूप में उपयोग की जाती है। इसकी उच्च शीतलन क्षमता के कारण इसका कोई सस्ता विकल्प मौजूद नहीं है।
  • जोखिम और प्रभाव: यह अत्यंत तीखी और संक्षारक गैस है। यदि हवा में इसका स्तर सामान्य से अधिक हो जाए, तो यह फेफड़ों, आंखों और त्वचा के लिए अत्यंत घातक हो सकती है। इसके संपर्क में आने से श्वसन तंत्र में जलन, फेफड़ों में पानी भरना (पल्मोनरी एडिमा) और अत्यधिक सांद्रता होने पर यह तुरंत दम घुटने या मृत्यु का कारण बन सकती है।

चर्चा के कारण:

  • घटना का विवरण: तमिलनाडु के तिरुवल्लुर में अमोनिया रिसाव से दो प्रवासी श्रमिकों की मौत हुई और 60 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हो गए।

  • सरकारी पहल: घटना के तुरंत बाद, मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया। साथ ही, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शोक व्यक्त करते हुए पीड़ितों के प्रति संवेदना जताई। मुख्यमंत्री ने घायलों को सर्वोत्तम उपचार मुहैया कराने के निर्देश दिए हैं।
  • तत्काल सुरक्षा कदम: सरकार ने राज्य के सभी खतरनाक उद्योगों के लिए तत्काल संयुक्त निरीक्षण के आदेश दिए हैं और सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करने वाले कंपनी मालिक मैनेजर को गिरफ्तार किया है।

अमोनिया का महत्व, उपयोग और जोखिम

अमोनिया आधुनिक उद्योगों की रीढ़ है, विशेष रूप से कोल्ड स्टोरेज और उर्वरक संयंत्रों में इसका रेफ्रिजरेंट के रूप में कोई सस्ता विकल्प नहीं है। हालांकि, इसकी उपयोगिता इसके साथ जुड़े जोखिमों को कम नहीं करती। यदि इसे नियंत्रित वातावरण और सख्त सुरक्षा प्रोटोकॉल के बिना इस्तेमाल किया जाए, तो यह एक 'अदृश्य हत्यारे' की तरह व्यवहार करती है।

ऐतिहासिक तुलना: भोपाल गैस कांड और औद्योगिक लापरवाही

तिरुवल्लुर की यह घटना हमें 1984 के भोपाल गैस त्रासदी की याद दिलाती है। भोपाल में मिथाइल आइसोसाइनेट (MIC) के रिसाव ने हजारों लोगों की जान ली थी। उन दोनों ही मामलों में सामान्य सूत्र 'सुरक्षा मानकों में भारी चूक' है जैसे खराब अलार्म सिस्टम, आपातकालीन निकास की कमी, और उपकरणों के सुरक्षा ऑडिट का होना। यह स्पष्ट है कि दशकों बाद भी हम औद्योगिक आपदा प्रबंधन में उसी प्रकार की मानवीय और प्रशासनिक गलतियां दोहरा रहे हैं।

संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा ढांचा

औद्योगिक सुरक्षा और श्रमिकों के अधिकार सुनिश्चित करने के लिए भारत में निम्नलिखित कानूनी प्रावधान अनिवार्य हैं:

  • संवैधानिक प्रावधान
  • अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार): उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि 'गरिमापूर्ण जीवन' में सुरक्षित और जोखिम-मुक्त कार्यस्थल का अधिकार भी शामिल है।
  • अनुच्छेद 42 (कार्य की मानवीय दशाएं): राज्य का यह दायित्व है कि वह कार्यस्थल पर श्रमिकों के लिए न्यायसंगत और मानवीय दशाएं सुनिश्चित करे।
  • मुख्य कानूनी प्रावधान
  • फैक्ट्री अधिनियम, 1948 (धारा 41-B): यह खतरनाक प्रक्रियाओं वाली इकाइयों के लिए विशेष प्रावधान करता है। इसके तहत खतरनाक रसायनों के प्रबंधन, श्रमिकों को सुरक्षा जानकारी देना, 'ऑन-साइट इमरजेंसी प्लान' (आपातकालीन योजना) तैयार करना और नियमित सुरक्षा ऑडिट करना अनिवार्य है।
  • व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थिति संहिता, 2020 (OSH&WC Code): यह संहिता खतरनाक रसायनों के भंडारण और परिवहन के लिए सख्त मानक तय करती है और श्रमिकों को किसी भी असुरक्षित कार्य को अस्वीकार करने का अधिकार देती है।
  • सार्वजनिक दायित्व बीमा अधिनियम, 1991: यह कानून खतरनाक रसायनों के रिसाव से प्रभावित लोगों को त्वरित वित्तीय राहत और मुआवजा दिलाने के लिए बनाया गया है।

सरकारी पहल और राहत कार्य

तिरुवल्लुर औद्योगिक त्रासदी के बाद सरकार ने तत्काल प्रभाव से निम्नलिखित कदम उठाए हैं:

  • जांच समिति: मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने 3-सदस्यीय उच्च-स्तरीय जांच समिति गठित की है, जिसे 24 घंटे में अंतरिम और 3 दिनों में अंतिम रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है।
  • दंडात्मक कार्रवाई: सुरक्षा मानकों के घोर उल्लंघन और पिछली लापरवाही के आधार पर कंपनी के मालिक और मैनेजर को तत्काल गिरफ्तार किया गया है।
  • आर्थिक और मानवीय राहत: मृतकों के परिजनों को 2 लाख की सहायता राशि और शवों को उनके गृह राज्य (ओडिशा) तक भेजने का पूरा खर्च तमिलनाडु सरकार द्वारा वहन किया जा रहा है।
  • व्यापक निरीक्षण: भविष्य की घटनाओं को रोकने के लिए राज्य के सभी 'खतरनाक उद्योगों' का तत्काल संयुक्त सुरक्षा निरीक्षण अनिवार्य कर दिया गया है।
  • चिकित्सा प्राथमिकता: राज्य के स्वास्थ्य विभाग को घायलों के लिए सर्वोत्तम उपचार सुनिश्चित करने हेतु सभी सरकारी और निजी अस्पतालों के साथ समन्वय के निर्देश दिए गए हैं।

विश्लेषण

अमोनिया गैस का रिसाव महज एक दुर्घटना नहीं, बल्कि 'सिस्टम की विफलता' है। सुरक्षा उपकरणों में निवेश करने के बजाय, कंपनियां शॉर्टकट अपनाती हैं, जो अंततः श्रमिकों के लिए डेथ-ट्रैप (मृत्यु-जाल) साबित होता है।

आगे की राह

  • अनिवार्य सुरक्षा ऑडिट: उद्योगों के लिए तीसरे पक्ष द्वारा नियमित सुरक्षा ऑडिट अनिवार्य किया जाए।

  • आधुनिक तकनीक: गैस रिसाव का पता लगाने वाले अत्याधुनिक सेंसर और ऑटोमैटिक शटडाउन वाल्व लगाना कानूनी रूप से अनिवार्य हो।
  • श्रमिक सशक्तिकरण: कारखानों में नियमित मॉक-ड्रिल हो और श्रमिकों को गैस रिसाव के प्रोटोकॉल की जानकारी दी जाए।
  • कठोर दंड: सुरक्षा मानकों के उल्लंघन को गैर-जमानती अपराध माना जाए ताकि मालिकों में डर बना रहे।

निष्कर्ष

तिरुवल्लुर की यह त्रासदी औद्योगिक विकास और श्रमिक सुरक्षा के बीच विद्यमान उस असंतुलन को रेखांकित करती है, जहाँ मुनाफे की प्रतिस्पर्धा में सुरक्षा मानकों को अक्सर गौण कर दिया जाता है। भोपाल गैस त्रासदी जैसे ऐतिहासिक अनुभवों के बावजूद, कार्यस्थलों पर सुरक्षा प्रोटोकॉल का अभाव एक गंभीर संस्थागत विफलता को दर्शाता है। अतः, औद्योगिक प्रगति को स्थायी बनाने हेतु 'शून्य-सहनशीलता' नीति अपनाते हुए अनिवार्य सुरक्षा ऑडिट, अत्याधुनिक तकनीकी निगरानी और सख्त कानूनी जवाबदेही सुनिश्चित करना समय की आवश्यकता है। अंततः, आर्थिक विकास तभी सार्थक है जब वह मानव जीवन की सुरक्षा और गरिमा को सर्वोपरि रखे।


सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।


संदर्भ

भारत की भौगोलिक स्थिति इसे विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं के प्रति संवेदनशील बनाती है। विशेष रूप से ओडिशा जैसे तटीय राज्य 'जलवायु परिवर्तन' की अग्रिम पंक्ति में खड़े हैं। हाल ही में 16वें वित्त आयोग ने आपदा निधि के बंटवारे के लिए एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। हालाँकि, यह नया ढांचा एक गंभीर विरोधाभास पैदा करता है एक ओर आपदा प्रबंधन में ओडिशा का मॉडल वैश्विक स्तर पर सराहा जाता है, वहीं दूसरी ओर नए वित्तीय आवंटन में इसी राज्य को सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।

आपदा जोखिम: विधिक और वैज्ञानिक परिभाषा

आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत आपदा को किसी क्षेत्र में होने वाली ऐसी तबाही के रूप में परिभाषित किया गया है जो मानव क्षमता से बाहर हो। लेकिन आपदा 'जोखिम' को आधुनिक वैज्ञानिक ढांचे (IPCC की छठी रिपोर्ट के अनुसार) में तीन स्तंभों पर मापा जाता है:

  1. संकट: प्राकृतिक घटना की तीव्रता (जैसे चक्रवात या भूकंप)
  2. एक्सपोजर : संकट के मार्ग में मौजूद जनसंख्या और संपत्ति।
  3. भेद्यता: आपदा को झेलने की अक्षमता (आर्थिक और सामाजिक कारक)

चर्चा में क्यों?

16वें वित्त आयोग ने राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) के लिए ₹2,04,401 करोड़ आवंटित किए हैं (15वें आयोग से 59.5% अधिक) इसके बावजूद विवाद का मुख्य कारण आपदा जोखिम सूचकांक (DRI) का नया 'गुणात्मक फॉर्मूला' है:

  • ओडिशा का घाटा: ओडिशा की आपदा निधि हिस्सेदारी में 1.57 प्रतिशत अंक की भारी गिरावट आई है, जो सभी 28 राज्यों में सर्वाधिक है।
  • असमानता: 20 राज्यों की हिस्सेदारी कम हुई है। चौंकाने वाला तथ्य यह है कि ओडिशा का 'हजार्ड स्कोर' (12) देश में सबसे अधिक होने के बाद भी उसे कम फंड मिल रहा है।

16वें वित्त आयोग का नया फॉर्मूला: संरचनात्मक समस्या

आयोग नेआपदा जोखिम सूचकांक (DRI) = जोखिम X एक्सपोजर X भेद्यताका उपयोग किया है। समस्या सिद्धांत में नहीं, बल्कि इसके मापदंडों में है:

  • एक्सपोजर की त्रुटि: आयोग ने 'एक्सपोजर' को राज्य की कुल जनसंख्या (1 से 25 के स्केल पर) के आधार पर मापा है।
    • तर्क: यूपी को 25 और सिक्किम को 1 मिला।
    • त्रुटि: वैज्ञानिक रूप से 'एक्सपोजर' का अर्थ आपदा क्षेत्र में रहने वाली आबादी है। सुरक्षित पठार पर रहने वाली 10 करोड़ की आबादी का जोखिम, चक्रवात-प्रवण तट पर रहने वाली 3 करोड़ की आबादी से कम होता है।
  • भेद्यता की संकीर्णता: इसे प्रति व्यक्ति शुद्ध राज्य घरेलू उत्पाद (NSDP) के व्युत्क्रम से मापा गया है।
    • त्रुटि: यह केवल 'राजकोषीय क्षमता' मापता है, 'आपदा भेद्यता' नहीं। भेद्यता का अर्थ कच्चे घर, खराब स्वास्थ्य बुनियादी ढांचा और चेतावनी प्रणालियों की कमी है, कि केवल कम आय।

ओडिशा और अन्य राज्य

राज्य

हजार्ड स्कोर

जनसंख्या स्कोर

DRI (परिणाम)

विश्लेषण

ओडिशा

12 (सर्वोच्च)

5

79.8

उच्च जोखिम के बावजूद कम जनसंख्या के कारण फंड कम हुआ।

उत्तर प्रदेश

कम

25 (अधिक)

413.2

विशाल जनसंख्या के कारण सबसे अधिक लाभ।

बिहार

मध्यम

उच्च

224.2

जोखिम कम होने पर भी अधिक आवंटन।

केरल

मध्यम

4

34.5

उच्च प्रति व्यक्ति आय के कारण भेद्यता स्कोर (1.073) कम मिला, जिससे फंड घटा।

ओडिशा: आपदा प्रबंधन का वैश्विक आदर्श

ओडिशा ने पिछले दो दशकों में निवेश के माध्यम से एक 'शून्य मृत्यु दर' मॉडल विकसित किया है:

  • निवेश: प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, बहुउद्देशीय चक्रवात आश्रय और सामुदायिक भागीदारी।
  • विडंबना: जिस राज्य ने आपदा तैयारी में सबसे गहरा निवेश किया, उसे ही 'पुरस्कार' के बजाय वित्तीय 'दंड' मिल रहा है।

संवैधानिक और विधिक प्रावधान

  • अनुच्छेद 280: वित्त आयोग को संसाधनों के न्यायसंगत वितरण की शक्ति देता है।
  • सातवीं अनुसूची: आपदा प्रबंधन औपचारिक रूप से किसी सूची में नहीं है, लेकिन अवशिष्ट शक्तियों और समवर्ती सूची के माध्यम से केंद्र-राज्य दोनों का उत्तरदायित्व है।
  • अधिनियम 2005: यह वित्तीय संसाधनों (राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष/ राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष) के उचित प्रबंधन की वैधानिक अनिवार्यता तय करता है।

आवश्यक परिवर्तन: सुधार के सुझाव

विशेषज्ञों के अनुसार फॉर्मूले में निम्नलिखित सुधार होने चाहिए:

  • जनसंख्या डेटा: कुल जनसंख्या के बजाय BMTPC वल्नरेबिलिटी एटलस और जनगणना ब्लॉक डेटा का उपयोग कर 'जोखिम क्षेत्र' की आबादी गिनी जाए।
  • बहुआयामी सूचकांक: भेद्यता मापने के लिए NFHS-5, प्रधानमंत्री-फसल बीमा योजना, और NHM के डेटा का उपयोग हो (जैसे कच्चे घरों का %, कृषि निर्भरता)
  • संस्थागत मानकीकरण: NDMA को प्रतिवर्ष 'राज्य आपदा भेद्यता सूचकांक' जारी करने का वैधानिक आदेश दिया जाए।

विश्लेषण: 'जोखिम बनाम जनसंख्या'

वर्तमान फॉर्मूला 'जोखिम सूचकांक' नहीं बल्कि एक 'जनसंख्या हेडकाउंट' बन गया है। यह उन राज्यों को हतोत्साहित करता है जो:

  • जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे हैं।
  • आर्थिक प्रगति करके अपनी 'भेद्यता' कम करने की कोशिश कर रहे हैं।

यदि चक्रवात ओडिशा में आता है, तो आपदा राहत की आवश्यकता वहाँ की 'कुल जनसंख्या' पर नहीं, बल्कि प्रभावित 'तटीय आबादी' पर निर्भर करती है। 16वें वित्त आयोग का वर्तमान मॉडल इस बुनियादी वैज्ञानिक सत्य की अनदेखी करता है।

आगे की राह

  • वैज्ञानिक मापन: वित्तपोषण को राजनीति और प्रशासनिक सुविधा से हटाकर वैज्ञानिक डेटा (जैसे IMD और आपदा एटलस) पर आधारित किया जाए।
  • जलवायु लचीलापन: फंड आवंटन में भविष्य के जलवायु अनुमानों को शामिल किया जाए क्योंकि ओडिशा, केरल और असम जैसे राज्यों में आपदाओं की आवृत्ति बढ़ने वाली है।

निष्कर्ष

भारत के लिए आपदा वित्तपोषण में 'सहकारी संघवाद' और 'वित्तीय न्याय' को प्राथमिकता देना अनिवार्य है। 16वें वित्त आयोग को केवल जनसंख्या के बजाय 'वास्तविक क्षेत्रीय जोखिम' और 'संरचनात्मक संवेदनशीलता' को आवंटन का आधार बनाना चाहिए। ओडिशा जैसे आपदा-प्रवण राज्यों की सुरक्षा निधि में कटौती, उनके द्वारा वर्षों में विकसित किए गए 'डिजास्टर रेजिलिएंस' (आपदा लचीलापन) को कमजोर कर सकती है। अतः, एक वैज्ञानिक और जोखिम-आधारित वित्तीय ढांचा ही राष्ट्र की समग्र सुरक्षा सुनिश्चित करने की प्राथमिक आधारशिला है।

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।


संदर्भ

भारत में बिजली-संबंधी दुर्घटनाएँ कोई नई घटना नहीं हैं; पिछले दो दशकों में केरल, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में नग्न तारों, जर्जर खंभों तथा रख-रखाव की कमी के कारण अनेक दर्दनाक मृत्यु-घटनाएँ दर्ज की गई हैं। मानसून के मौसम में करंट लगने से भी स्थायी रूप से उच्च मृत्यु-दर देखी जाती रही है। औद्योगिक क्षेत्रों में विद्युत्उपकरणों की विफलता तथा ग्रामीण क्षेत्रों में वितरण-लाइन की खराब स्थिति ने लंबे समय से सुरक्षा-जोखिम बढ़ाए हैं। इसी क्रम में 1 दिसंबर 2025 को हरदोई और खर्गोन की घटनाएँ पुनः इस संरचनात्मक समस्या को उजागर करती हैं। इन दुर्घटनाओं ने यह प्रश्न और गम्भीर बना दिया है कि अवसंरचना में निरंतर निवेश, नियमित निरीक्षण तथा सुरक्षा-मानकों के कड़े पालन के बिना सार्वजनिक जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती।


बिजली-संबंधी मृत्यु

बिजली-संबंधी मृत्यु वह मृत्यु है जो प्रत्यक्ष विद्युत् स्पर्शाघात, विद्युत् आर्क/शॉर्ट-सर्किट, विद्युत् उपकरणों की त्रुटि, वितरण-लाइन से जुड़े हादसों अथवा इनसे उत्पन्न आग/विस्फोट के कारण घटित होती है। यह घरेलू, औद्योगिक, कृषि तथा सार्वजनिक वितरण तंत्रसभी स्तरों पर संभव है।


चर्चा में क्यों?

  • देश के विभिन्न भागों में बिजली-संबंधी दुखद घटनाएँ सामने आईं। उत्तर प्रदेश के हरदोई ज़िले के पंचमपुरवा ग्राम में एक मजदूर की विद्युत्स्पर्शाघात से मृत्यु तथा मध्य प्रदेश के खर्गोन ज़िले में विद्युत्खंभे ले जा रही ट्रैक्टरट्रॉली के पलटने से दो व्यक्तियों की मृत्युदोनों घटनाएँ यह दर्शाती हैं कि विद्युत्सुरक्षा भारत में अब भी गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है।
  • ताज़ा घटनाएँ इस बात को रेखांकित करती हैं कि ग्रामीण एवं शहरी दोनों क्षेत्रों में विद्युत्अवसंरचना की सुरक्षा तथा कार्य-प्रणालियों में अनेक कमियाँ विद्यमान हैं। यह विषय वर्तमान परिदृश्य में महत्त्वपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि यह सार्वजनिक सुरक्षा, प्रशासनिक उत्तरदायित्व, अवसंरचनात्मक गुणवत्ता, तथा मानवाधिकार जैसी बहुविषयक चिंताओं से जुड़ा है।


दुर्घटनाओं के प्रमुख कारण

  • सुरक्षा-जागरूकता और प्रशिक्षण का अभाव: उपकरणों, तारों और वितरण-लाइन के आसपास कार्य करते समय सुरक्षा-मानकों का पालन प्रायः नहीं किया जाता।
  • जर्जर एवं अनुपयुक्त विद्युत् अवसंरचना: नग्न तार, ढीले खंभे, खराब इंसुलेशन और पुरानी वितरण-व्यवस्थाएँ दुर्घटनाओं की संभावना बढ़ाती हैं।
  • अपर्याप्त रख-रखाव और भार-वितरण की समस्या: ट्रांसफ़ॉर्मर ओवरलोड, लाइन-फॉल्ट एवं रख-रखाव की कमी प्रमुख कारक हैं।
  • परिवहन और निर्माण-स्थलों पर सुरक्षा में लापरवाही: विद्युत् सामग्री/खंभों के परिवहन में सुरक्षा-नियमों की अनदेखी।
  • कानूनी प्रवर्तन में शिथिलता: दुर्घटनाओं के बाद जांच, दंडात्मक कार्रवाई तथा जवाबदेही की प्रक्रिया अक्सर धीमी अपूर्ण रहती है।


सरकारी पहलें

  • विद्युत् मंत्रालय एवं केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण द्वारा विद्युत् सुरक्षा के लिए दिशा-निर्देश, सुरक्षा पुस्तिकाएँ, जन-जागरूकता अभियानों तथा इलेक्ट्रिकल सेफ़्टी डे जैसी पहलें निरंतर संचालित हैं।
  • डिस्कॉम स्तर पर सुधार: कई राज्यों में वितरण-लाइनें सुरक्षित बनाने, फॉल्ट-सर्किट ब्रेकर लगाने तथा ओवरलोड प्रबंधन हेतु तकनीकी सुधार लागू किए जा रहे हैं।
  • नियामकीय ढाँचा: बिजली नियम, भारतीय मानक और केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण विनियम सुरक्षा के विस्तृत मानक प्रदान करते हैं, यद्यपि इनके क्रियान्वयन में अक्सर कमी देखी जाती है।


मानवाधिकार संस्थाएँ एवं गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका

  • राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (NSC) एवं अन्य संगठनों द्वारा विद्युत् सुरक्षा पर प्रशिक्षण, कार्यशालाएँ तथा सामुदायिक अभियानों का आयोजन किया जाता है।
  • अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ESFI, NFPA एवं OSHA जैसी संस्थाएँ विद्युत् सुरक्षा के सर्वोत्तम मानक विकसित करती हैं, जो भारत सहित अनेक देशों के लिए मार्गदर्शक हैं।
  • NGO और मानवाधिकार समूह दुर्घटना-पीड़ितों के लिए मुआवज़ा, शीघ्र जाँच तथा सुरक्षित कार्य-परिवेश की माँग उठाते रहते हैं।


संविधान एवं मानवाधिकार

भारत के संविधान का अनुच्छेद 21—“जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार”—राज्य पर यह कर्तव्य सौंपता है कि वह प्रत्येक नागरिक के जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित करे। विद्युत् अवसंरचना में लापरवाही या सुरक्षा-मानकों के अभाव के कारण यदि व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो यह जीवन-रक्षा की संवैधानिक परिधि में गंभीर प्रश्न उत्पन्न करता है। न्यायपालिका ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि सुरक्षित एवं गरिमामय जीवन Article 21 का मूल तत्व है।


विश्व परिदृश्य

विश्व के अनेक देशों में विद्युत् सुरक्षा को कठोर मानकों और कड़े प्रवर्तन द्वारा नियंत्रित किया जाता है। अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में OSHA और NFPA द्वारा निर्धारित सुरक्षा मानक अनिवार्य हैं। विकसित देशों में भी विद्युत् दुर्घटनाएँ होती हैं, परन्तु निरंतर निगरानी, तकनीकी आधुनिकीकरण और जनता में उच्च स्तर की जागरूकता के कारण मृत्यु-दर अपेक्षाकृत कम है।


विश्लेषण

भारतीय संदर्भ में समस्या केवल तकनीकी नहीं, बल्कि प्रशासनिक, सामाजिक और संरचनात्मक है। सुरक्षा-नियम उपस्थित होने के बावजूद उनका पालन असंगत है। ग्रामीण क्षेत्रों में अवसंरचना पुरानी है तथा शहरी विस्तार में वितरण-तंत्र पर बढ़ते भार के कारण जोखिम बढ़ रहा है। प्रभावी समाधान के लिए नीति-निर्माताओं को डेटा-आधारित योजना, कड़े प्रवर्तन, तथा नागरिक-जागरूकता के त्रि-स्तरीय ढाँचे को प्राथमिकता देनी होगी।


मार्ग-आगे

  1. सख्त प्रवर्तन और नियमित सुरक्षा-ऑडिट: केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण और राज्य डिस्कॉम्स को अवसंरचना का नियमित निरीक्षण तथा उच्च-जोखिम क्षेत्रों की प्राथमिकता-आधारित मरम्मत सुनिश्चित करनी चाहिए।
  2. जन-जागरूकता और प्रशिक्षण विस्तार: विद्यालयों, पंचायतों, निर्माण-स्थलों और कृषि क्षेत्रों में विद्युत्सुरक्षा पर अनिवार्य प्रशिक्षण कार्यक्रम।
  3. सुरक्षित परिवहन मानक: विद्युत् खंभों, तारों और भारी उपकरणों के परिवहन के लिए सख्त तकनीकी मानदंड और लाइसेंसिंग प्रणाली।
  4. तेज़ पारदर्शी जवाबदेही: दुर्घटना के मामलों में शीघ्र जांच, दायित्व निर्धारण और दोषियों पर समयबद्ध कार्रवाई।
  5. डेटा-संग्रहण में सुधार: दुर्घटना-संबंधी राष्ट्रीय डेटाबेस को मजबूत करना ताकि नीति-निर्माण वैज्ञानिक आधार पर हो सके।


निष्कर्ष

बिजली-संबंधी मृत्यु केवल एक तकनीकी या यांत्रिक समस्या नहीं, बल्कि यह मानव-जीवन, प्रशासनिक उत्तरदायित्व और संवैधानिक मूल्यों से गहराई से जुड़ा हुआ विषय है। 1 दिसंबर 2025 की घटनाएँ यह स्मरण कराती हैं कि अवसंरचना का आधुनिकीकरण, सुरक्षा-मानकों का कड़ाई से पालन, जन-जागरूकता और पारदर्शी जवाबदेही ही भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोक सकती हैै। 

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  • चर्चा में क्यों?
    • 16वें वित्त आयोग के साथ एक बैठक में, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री ने राज्य की विशिष्ट कमज़ोरियों को बेहतर ढंग से दर्शाने के लिए आपदा जोखिम सूचकांक (डीआरआई) में संशोधन की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। यह माँग आपदा-प्रवण क्षेत्रों में संसाधनों के समान आवंटन के लिए सटीक मूल्यांकन उपकरणों के महत्व को रेखांकित करती है।
  • आपदा जोखिम सूचकांक (डीआरआई) के बारे में
    • डीआरआई को 15वें वित्त आयोग द्वारा विभिन्न राज्यों के सामने आने वाले आपदा जोखिमों को ध्यान में रखते हुए राजकोषीय हस्तांतरण में निष्पक्षता लाने के लिए विकसित किया गया था। यह 14 खतरों, 14 कमजोरियों और 2 जोखिम मापदंडों का मूल्यांकन करता है। खतरों में भूकंप, चक्रवात, बाढ़ और सूखा शामिल हैं, जबकि कमजोरियों में ग्रामीण और शहरी गरीब, महिलाएं और बच्चे जैसे कारकों पर विचार किया जाता है। जोखिम को जनसंख्या और सकल घरेलू उत्पाद संकेतकों का उपयोग करके मापा जाता है।
    • इन आयामों को एकीकृत करके, सूचकांक संसाधन वितरण को निर्देशित करने, तैयारियों को मजबूत करने, तथा यह सुनिश्चित करने में मदद करता है कि उच्च जोखिम वाले राज्यों को पर्याप्त वित्तीय सहायता प्राप्त हो।

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  • चर्चा में क्यों?
    • 1 सितंबर, 2025 को अफ़ग़ानिस्तान में एक शक्तिशाली भूकंप आया, जिसमें 1,400 से ज़्यादा लोग मारे गए और कम से कम 3,100 घायल हुए। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने बताया कि नांगरहार प्रांत के जलालाबाद के पास आठ किलोमीटर की गहराई पर 6.3 तीव्रता का पहला भूकंप आया, जिसके बाद 4.7 तीव्रता का एक और झटका आया। सीमित संसाधनों और तालिबान शासन पर प्रतिबंधों के कारण कुनार और नांगरहार में बचाव कार्य बाधित हो रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र और सहायता एजेंसियों ने सहायता का वादा किया है।
  • प्रमुख प्रावधान:-
    • भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटों के मिलन बिंदु पर स्थित अफ़ग़ानिस्तान भूकंप के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बना हुआ है। 1900 से, पूर्वोत्तर में 7 से ज़्यादा तीव्रता के 12 भूकंप आ चुके हैं। चिली से तुलना करें, जहाँ समान तीव्रता के भूकंप आते हैं, लेकिन सख्त भवन निर्माण नियमों के कारण न्यूनतम हताहत होते हैं, तो अफ़ग़ानिस्तान की कमज़ोरी साफ़ दिखाई देती है। अक्टूबर 2023 में हेरात में आए भूकंप, जिसकी तीव्रता भी 6.3 थी , में 1,500 से ज़्यादा लोग मारे गए और 63,000 घर क्षतिग्रस्त हुए। भूकंपों का जानलेवा होना ज़रूरी नहीं है; अफ़ग़ानिस्तान को जन जागरूकता उपायों के साथ-साथ मज़बूत भवन मानकों को तुरंत अपनाना और लागू करना होगा।

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  • चर्चा में क्यों?
    • केंद्रीय जल शक्ति मंत्री ने आपदा प्रबंधन प्रयासों को समर्थन देने के लिए डिज़ाइन किए गए नए एकीकृत बाढ़ पूर्वानुमान प्लेटफॉर्म सी-फ्लड का उद्घाटन किया है।
  • प्रमुख प्रावधान:-
    • यह वेब-आधारित प्रणाली उन्नत 2-डी हाइड्रोडायनामिक मॉडलिंग का उपयोग करके दो दिन पहले गांव-स्तर पर बाढ़ के पूर्वानुमान प्रदान करती है। सी-फ्लड विभिन्न राष्ट्रीय और क्षेत्रीय एजेंसियों से बाढ़ के आंकड़ों को एक साथ लाता है, जो एकीकृत पूर्वानुमान और वास्तविक समय के खतरे का मानचित्रण प्रदान करता है।
    • लगभग 40 मिलियन हेक्टेयर - भारत के भूमि क्षेत्र का 12% - बाढ़-प्रवण है। सी-फ्लड समय पर बाढ़ के नक्शे और जल स्तर के पूर्वानुमान प्रदान करके इस चुनौती का समाधान करता है ताकि अधिकारियों को तैयारी और प्रतिक्रिया में सहायता मिल सके।
    • सी-फ्लड को सी-डैक पुणे, केंद्रीय जल आयोग, जल संसाधन विभाग और राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग केंद्र द्वारा संयुक्त रूप से विकसित किया गया है। इसे राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन (NSM) के तहत क्रियान्वित किया गया है , जो 2015 में शुरू की गई MeitY और DST की एक संयुक्त पहल है ।
    • वर्तमान में महानदी, गोदावरी और तापी नदी घाटियों को कवर करने वाली यह प्रणाली जल्द ही देश भर में विस्तारित हो जाएगी और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन आपातकालीन प्रतिक्रिया पोर्टल (एनडीईएम) के साथ एकीकृत हो जाएगी।

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  • चर्चा में क्यों?
    • विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो (एएआईबी) अहमदाबाद हवाई अड्डे पर हाल ही में हुए एयर इंडिया विमान हादसे की व्यापक जांच करेगा। इस घटना के कारण का पता लगाने और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए औपचारिक जांच शुरू कर दी गई है।
  • प्रमुख प्रावधान:-
    • 2012 में स्थापित, AAIB नागरिक उड्डयन मंत्रालय के तहत एक संलग्न कार्यालय के रूप में कार्य करता है। इसका गठन अंतर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन सम्मेलन (1944) के अनुलग्नक 13 के प्रति भारत की प्रतिबद्धता के अनुरूप है, जो विमान दुर्घटना जांच के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानकों की रूपरेखा तैयार करता है।
    • ब्यूरो की प्राथमिक भूमिका विमान (दुर्घटनाओं और घटनाओं की जांच) नियम, 2017 के तहत जांच की देखरेख करना और कानूनी प्रक्रियाओं का समर्थन करना है। यह विशेष रूप से 2,250 किलोग्राम से अधिक कुल वजन (एयूडब्ल्यू) वाले विमान या टर्बोजेट विमान से जुड़ी सभी दुर्घटनाओं और गंभीर घटनाओं की जांच करता है।
    • स्वतंत्र और वस्तुनिष्ठ जांच सुनिश्चित करके, AAIB विमानन सुरक्षा मानकों को बेहतर बनाने और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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  • चर्चा में क्यों?
    • विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो (एएआईबी) अहमदाबाद हवाई अड्डे पर हाल ही में हुए एयर इंडिया विमान हादसे की व्यापक जांच करेगा। इस घटना के कारण का पता लगाने और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए औपचारिक जांच शुरू कर दी गई है।
  • प्रमुख प्रावधान:-
    • 2012 में स्थापित, AAIB नागरिक उड्डयन मंत्रालय के तहत एक संलग्न कार्यालय के रूप में कार्य करता है। इसका गठन अंतर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन सम्मेलन (1944) के अनुलग्नक 13 के प्रति भारत की प्रतिबद्धता के अनुरूप है, जो विमान दुर्घटना जांच के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानकों की रूपरेखा तैयार करता है।
    • ब्यूरो की प्राथमिक भूमिका विमान (दुर्घटनाओं और घटनाओं की जांच) नियम, 2017 के तहत जांच की देखरेख करना और कानूनी प्रक्रियाओं का समर्थन करना है। यह विशेष रूप से 2,250 किलोग्राम से अधिक कुल वजन (एयूडब्ल्यू) वाले विमान या टर्बोजेट विमान से जुड़ी सभी दुर्घटनाओं और गंभीर घटनाओं की जांच करता है।
    • स्वतंत्र और वस्तुनिष्ठ जांच सुनिश्चित करके, AAIB विमानन सुरक्षा मानकों को बेहतर बनाने और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


चर्चा में क्यों?

o ICDRI 2025 में, भारत ने पाँच वैश्विक प्राथमिकताओं पर प्रकाश डाला: शिक्षा में आपदा तन्यकता को शामिल करना, वैश्विक डिजिटल आपदा डेटा प्लेटफ़ॉर्म लॉन्च करना, विकासशील देशों के लिए अभिनव वित्त को सक्षम करना, SIDS को बड़े महासागर राष्ट्रों के रूप में मान्यता देना और प्रारंभिक चेतावनी क्षमताओं को बढ़ावा देना।

प्रमुख प्रावधान:-

o एक प्रमुख आकर्षण "SIDS में तटीय तन्यकता के लिए कार्रवाई का आह्वान" था, जिसमें SIDS ग्लोबल डेटा हब 2.0, 2030 तक सार्वभौमिक बहु-खतरा प्रारंभिक चेतावनी और वित्त मंत्रालय-आधारित तन्यकता इकाइयों की स्थापना जैसी दस रणनीतिक पहलों का प्रस्ताव था।

o यूरोप में पहली बार, नीस में आयोजित सम्मेलन में स्केलेबल जलवायु-तन्यक बुनियादी ढाँचा सुनिश्चित करने के लिए एकीकृत निवेश रणनीतियों और नीतिगत सुसंगतता पर जोर दिया गया।


o भारत द्वारा शुरू किए गए वैश्विक गठबंधन CDRI के तहत आयोजित यह मंच बुनियादी ढाँचे में जलवायु अनुकूलन और तन्यकता को बढ़ावा देने के लिए एक प्रमुख मंच है।

o वर्ष 2050 तक लचीले बुनियादी ढांचे में 10 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के निवेश को उत्प्रेरित करने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य के साथ, सीडीआरआई दुनिया भर में कमजोर तटीय समुदायों को समर्थन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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  • मुल्लापेरियार बांध के रखरखाव के संबंध में केरल द्वारा उठाई गई चिंताओं का समाधान करे।
  • राष्ट्रीय बांध सुरक्षा प्राधिकरण (एनडीएसए) के बारे में:
    • एनडीएसए राष्ट्रीय बांध सुरक्षा अधिनियम, 2021 की धारा 8(1) के तहत केंद्र सरकार द्वारा स्थापित एक वैधानिक निकाय है।
  • कार्य:
    • एनडीएसए पूरे भारत में बांधों के विनियमन, निगरानी और निरीक्षण के लिए जिम्मेदार है।
    • यह पूरे देश में बांधों के निर्माण, रखरखाव और संचालन के लिए नीतियों और दिशानिर्देशों को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
    • एनडीएसए की एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी राज्य बांध सुरक्षा संगठनों के बीच या राज्य संगठन और राज्य के भीतर बांध मालिक के बीच विवादों को सुलझाना है।
    • एनडीएसए बांध सुरक्षा के संबंध में जनता को शिक्षित करने के लिए राष्ट्रीय जागरूकता अभियान भी चलाता है।
    • प्राकृतिक आपदाओं या आपात स्थितियों की स्थिति में, प्राधिकरण यह सुनिश्चित करता है कि आपातकालीन प्रतिक्रिया योजनाएं मौजूद हों।
    • एनडीएसए का नेतृत्व एक अध्यक्ष करता है तथा इसे पांच सदस्यों का समर्थन प्राप्त है जो इसके विभिन्न विभागों का नेतृत्व करते हैं: नीति और अनुसंधान, तकनीकी, विनियमन, आपदा लचीलापन, तथा प्रशासन और वित्त।
    • इसका मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है।