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भारत में परिसीमन की नई दिशा: EAC-PM का 'लक्षित विभाजन' मॉडल और चुनावी भविष्य

सामान्य अध्ययन पेपर  – II:  शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।

संदर्भ

भारत में परिसीमन की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत निर्धारित है। 1976 में एक संवैधानिक संशोधन के माध्यम से 1971 की जनगणना के आंकड़ों पर सीटों का वितरण 'स्थिर' कर दिया गया था। अब, प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) ने एक नए वर्किंग पेपर में लोकसभा परिसीमन के लिए 'लक्षित विभाजन' मॉडल प्रस्तावित किया है। यह मॉडल केवल जनसंख्या बल्कि मतदाता व्यवहार और जनसांख्यिकीय प्रोफाइल पर भी केंद्रित है।

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM )

यह भारत सरकार, विशेष रूप से प्रधानमंत्री को आर्थिक और उससे संबंधित मुद्दों पर सलाह देने के लिए गठित एक स्वतंत्र निकाय है। इसके बारे में मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:

  • प्रकृति: यह एक गैर-संवैधानिक और गैर-स्थायी निकाय है। इसका गठन समय-समय पर सरकार की प्राथमिकताओं के अनुसार किया जाता है।
  • मुख्य भूमिका:
    • प्रधानमंत्री द्वारा संदर्भित किसी भी आर्थिक या अन्य मुद्दे का विश्लेषण करना और उस पर सलाह देना।
    • समग्र आर्थिक महत्व के मुद्दों को संबोधित करना और प्रधानमंत्री के सामने अपने विचार प्रस्तुत करना।
    • "EAC-PM व्यापक आर्थिक महत्व के विषयों पर अध्ययन, विश्लेषण, रिपोर्ट एवं नीतिगत सुझाव प्रस्तुत करता है।"
  • रचना: इसमें एक अध्यक्ष, कुछ पूर्णकालिक, सदस्य और कई अंशकालिक, सदस्य होते हैं, जो आमतौर पर अर्थशास्त्र, वित्त या सार्वजनिक प्रशासन के क्षेत्र के विशेषज्ञ होते हैं। वर्तमान में EAC-PM में एक अध्यक्ष, 3 पूर्णकालिक सदस्य तथा 11 अंशकालिक सदस्य हैं।
  • उद्देश्य: इसका प्राथमिक उद्देश्य सरकार को आर्थिक नीति के मामलों पर एक तटस्थ और विशेषज्ञ दृष्टिकोण प्रदान करना है ताकि देश के आर्थिक शासन को बेहतर बनाया जा सके।

यह सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण 'थिंक-टैंक' की तरह कार्य करता है, जो उच्च स्तर पर आर्थिक नीति निर्धारण में रणनीतिक इनपुट प्रदान करता है।

प्रस्तावित मॉडल के मुख्य सांख्यिकीय आंकड़े

EAC-PM के इस मॉडल में कई महत्वपूर्ण डेटा बिंदु शामिल हैं:

  • लोकसभा का आकार: कुल सीटों की संख्या 543 से बढ़कर 824 हो सकती है।
  • छोटे राज्यों पर असर: मिजोरम, पुडुचेरी, सिक्किम, लद्दाख, अंडमान-निकोबार, नागालैंड, चंडीगढ़ और लक्षद्वीप जैसे छोटे राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में सीटों की संख्या को दोगुना करने का सुझाव है।
  • विभाजन का दायरा: मॉडल के अनुसार कुल 170 सीटों को विभाजित करने की सिफारिश है जिनमें 59 निर्वाचन क्षेत्रों का दो-तरफा और 111 निर्वाचन क्षेत्रों का तीन-तरफा विभाजन शामिल है।
  • प्रमुख राज्यों में प्रभाव: यह मॉडल बड़े राज्यों में सीटों की संख्या बढ़ाने का सुझाव देता है:
    • केरल: 20 से 30 सीटें
    • तमिलनाडु: 39 से 59 सीटें
    • उत्तर प्रदेश: 80 से 120 सीटें

सांख्यिकीय पद्धति और 'लक्षित मानदंड'

शमिका रवि और मुदित कपूर द्वारा तैयार इस पेपर की कार्यप्रणाली अद्वितीय है:

  • डेटासेट: 2009 से 2024 तक के लोकसभा चुनावों के डेटा का उपयोग करके एक "सांख्यिकीय संबंध" स्थापित किया गया।
  • कारक: यह मॉडल केवल जनसंख्या नहीं, बल्कि 5 प्रमुख विशेषताओं का विश्लेषण करता है: शहरी हिस्सेदारी, SC हिस्सेदारी, ST हिस्सेदारी, भाषाई ध्रुवीकरण और भाषाई विविधता।
  • मतदान-अधिकतम रणनीति: इसका लक्ष्य उन सीटों को तोड़ना है जहाँ मतदान कम है या आकार बहुत बड़ा है, ताकि "मतदान-अधिकतम" स्थिति प्राप्त की जा सके।

क्षेत्रीय संतुलन और चुनावी प्रभाव

रिपोर्ट में दक्षिण बनाम उत्तर के राजनीतिक संतुलन पर विशेष ध्यान दिया गया है:

  • दक्षिणी राज्यों का हिस्सा: मॉडल के बाद दक्षिणी राज्यों (तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु) की कुल हिस्सेदारी 23.6% रहेगी, जो वर्तमान में 23.7% है।
  • उत्तरी राज्यों का हिस्सा: छह सबसे अधिक आबादी वाले उत्तरी राज्यों (राजस्थान, यूपी, एमपी, गुजरात, बिहार, महाराष्ट्र) की हिस्सेदारी 45.2% होगी, जो अभी 45.6% है।
  • मतदाता भागीदारी: शोधकर्ताओं का दावा है कि इस मॉडल से अगले आम चुनाव में देश भर में मतदाता मतदान में 2.3% तक की वृद्धि हो सकती है।

चुनौतियां

  • लिंग-आधारित डेटा: रिपोर्ट में कहा गया है कि परिसीमन के साथ '2027 की जनगणना' और लिंग-विभाजित चुनावी डेटा को समय पर जारी करना आवश्यक है।

  • महिला प्रतिनिधित्व: शहरी क्षेत्रों में महिलाओं के मतदान में अभी भी 'अवशिष्ट अंतर' है, जिसे सुलझाने के लिए महिला-केंद्रित मतदान केंद्र और मतदाता रोल अपडेट अभियान चलाने का सुझाव दिया गया है।
  • डेटा की आवश्यकता: अध्ययन 2011 की जनगणना पर आधारित है, इसलिए इसे अधिक विश्वसनीय बनाने के लिए 2027 के आंकड़ों से अपडेट करना अनिवार्य होगा।

आगे की राह

इस मॉडल को धरातल पर उतारने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जाने चाहिए:

  • 2027 जनगणना का समयबद्ध आयोजन: मॉडल की सफलता पूरी तरह से सटीक और नवीनतम डेटा पर निर्भर है। सरकार को 2027 की जनगणना और इसके साथ ही 'बूथ युक्तिकरण चक्र' को समय पर पूरा करना चाहिए।
  • व्यापक राजनीतिक आम सहमति: परिसीमन एक अत्यधिक संवेदनशील मुद्दा है। इसे संसद में पेश करने से पहले सभी राज्यों और राजनीतिक दलों के साथ व्यापक 'सर्वदलीय बैठक' की जानी चाहिए, ताकि 'उत्तर-दक्षिण' के बीच किसी भी प्रकार का अविश्वास उत्पन्न हो।
  • पारदर्शी डेटा-साझाकरण: सांख्यिकी मंत्रालय को चुनावी और जनसांख्यिकीय डेटा को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराना चाहिए ताकि अकादमिक और राजनीतिक स्तर पर इस मॉडल की निष्पक्ष समीक्षा हो सके।
  • संवैधानिक संशोधन की तैयारी: चूंकि परिसीमन के लिए सीटों की संख्या (जो संविधान द्वारा निर्धारित है) में बदलाव करना होगा, इसलिए एक नए संवैधानिक संशोधन की प्रक्रिया को पारदर्शी तरीके से शुरू करने की आवश्यकता है।
  • स्थानीय निकायों से तालमेल: परिसीमन प्रक्रिया को स्थानीय निकाय चुनावों की सीमाओं के साथ तालमेल बिठाने पर भी विचार करना चाहिए ताकि प्रशासनिक जटिलता कम हो।

निष्कर्ष

EAC-PM का यह मॉडल परिसीमन को केवल एक संख्यात्मक अभ्यास से बदलकर एक 'सांख्यिकीय और जनसांख्यिकीय' समाधान बनाने की कोशिश है। यह मॉडल बड़े राज्यों की सीटों को तर्कसंगत बनाते हुए संघीय संतुलन बनाए रखने का एक प्रयास है। हालांकि, इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे 2027 के नए जनगणना आंकड़ों के साथ कैसे लागू किया जाता है और इस पर राजनीतिक सर्वसम्मति कितनी जल्दी बनती है।

भारत के रक्षा विनिर्माण में नया युग: 'मेड इन इंडिया' एयरबस C-295 की ऐतिहासिक उड़ान

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।

संदर्भ

भारत ने रक्षा विनिर्माण में एक बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए अपने पहले 'मेड इन इंडिया' एयरबस C-295 सैन्य परिवहन विमान का सफल परीक्षण उड़ान संपन्न किया। यह उपलब्धि देश की आत्मनिर्भरता की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है।

वर्तमान समाचार

  • हाल ही में, वडोदरा स्थित फाइनल असेंबली लाइन (FAL) से इस पहले स्वदेशी C-295 विमान ने अपनी पहली उड़ान भरी।

  • यह घटना भारतीय विमानन और रक्षा क्षेत्र के लिए एक मील का पत्थर है, जो इस वर्ष के अंत तक भारतीय वायुसेना (IAF) को पहला भारत-निर्मित विमान सौंपने के लक्ष्य को पूरा करने के करीब ले जाती है।

C-295 विमान:

C-295 एक अत्यधिक विश्वसनीय और बहुमुखी सामरिक परिवहन विमान है। यह विमान आधुनिक सैन्य अभियानों की जटिल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • विविध उपयोग: यह कार्गो सपोर्ट, सामरिक सहायता, निगरानी, और मानवीय सहायता कार्यों के लिए सक्षम है।
  • क्षमता: यह एक साथ भारी सैन्य उपकरण और सैनिकों को चुनौतीपूर्ण स्थानों पर पहुँचाने में सक्षम है, जो इसे वैश्विक स्तर पर सैन्य संचालन का आधार बनाता है।

निर्माण और परियोजना का विवरण

यह विमान एयरबस और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (TASL) की एक महत्वपूर्ण साझेदारी का परिणाम है।

  • परियोजना: यह भारतीय वायुसेना के लिए कुल 40 विमानों के निर्माण की परियोजना का हिस्सा है।
  • विकास: इस संयंत्र का उद्घाटन अक्टूबर 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़ ने किया था। इस कार्यक्रम में पूरे भारत से कई MSMEs (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) विमान के पुर्जों के निर्माण में योगदान दे रहे हैं।

यह उड़ान क्यों महत्वपूर्ण है?

यह परीक्षण उड़ान इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि:

  • यह भारत में निजी क्षेत्र द्वारा निर्मित पहला सैन्य विमान है।
  • यह 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' पहल की सफलता का प्रमाण है।
  • यह देश की रक्षा विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक 'गेम चेंजर' साबित हो रहा है।

भारत की स्थिति में बदलाव और वैश्विक परिदृश्य

इस परियोजना के सफल होने से भारत की रक्षा क्षमताओं में व्यापक बदलाव आएंगे:

  • स्वदेशी क्षमता: भारत का अब रक्षा आयात पर निर्भरता कम होगी और वह अपनी घरेलू रक्षा उत्पादन क्षमता में वृद्धि करेगा।
  • एयरोस्पेस हब: यह विमान निर्माण केवल देश की एयरोस्पेस क्षमताओं को मजबूत करेगा, बल्कि भारत को एक वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करेगा।
  • वैश्विक परिदृश्य: यह उपलब्धि विश्व के सामने भारत के विनिर्माण कौशल को प्रदर्शित करती है, जिससे भविष्य में अन्य उन्नत सैन्य तकनीक के उत्पादन के द्वार खुलेंगे।


निष्कर्ष

'मेड इन इंडिया' एयरबस C-295 का सफलतापूर्वक परीक्षण उड़ान भरना भारतीय रक्षा इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय है। यह केवल भारतीय वायुसेना की परिचालन शक्ति को बढ़ाएगा, बल्कि 'आत्मनिर्भर भारत' के संकल्प को नई ऊँचाइयों पर ले जाएगा। टाटा और एयरबस का यह सहयोग देश के युवाओं और उद्योगों के लिए एक नया मार्ग प्रशस्त करता है, जो भविष्य में भारत को रक्षा क्षेत्र में एक निर्यातक के रूप में स्थापित करने की क्षमता रखता है।