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नाटो का अंकारा शिखर सम्मेलन: वैश्विक रक्षा परिदृश्य और भारत के लिए चेतावनी के संकेत
सामान्य अध्ययन पेपर – II: शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।
संदर्भ
उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) का अंकारा शिखर सम्मेलन (7-8 जुलाई, 2026) वैश्विक रक्षा परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण मोड़ बनकर उभरा है। शीत युद्ध के दौर से लेकर वर्तमान तक, यूरोप और उत्तरी अमेरिका के बीच का यह सैन्य संगठन अपनी भूमिका को लगातार बदलता रहा है। 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध और हालिया वैश्विक सैन्य अभियानों के बाद, यूरोपीय सुरक्षा और वैश्विक हथियारों के बाजार में एक बड़ा संरचनात्मक बदलाव आया है, जो सीधे तौर पर भारत जैसी उभरती शक्तियों के रक्षा आयात को प्रभावित कर रहा है।
नाटो (NATO) क्या है?
परिचय: नाटो (नार्थ अटलांटिक ट्रीटी आर्गेनाइजेशन) उत्तरी अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच 4 अप्रैल, 1949 को वाशिंगटन संधि के तहत स्थापित एक राजनीतिक और सैन्य गठबंधन है।
- उद्देश्य:
- सामूहिक रक्षा: राजनीतिक और सैन्य साधनों के माध्यम से अपने सदस्य देशों की स्वतंत्रता और सुरक्षा की गारंटी देना।
- सामूहिक रक्षा का सिद्धांत (अनुच्छेद 5): किसी भी एक या अधिक सदस्य देश पर हमला सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाएगा।
- लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा: विवादों के शांतिपूर्ण समाधान और सैन्य क्षमताओं के सुदृढ़ीकरण हेतु सहयोग प्रदान करना।
- सदस्य संख्या: वर्तमान में नाटो में कुल 32 सदस्य देश शामिल हैं (फ़िनलैंड 31वें और स्वीडन 32वें सदस्य के रूप में शामिल हुए हैं)।
चर्चा के कारण -
अंकारा शिखर सम्मेलन (7-8 जुलाई, 2026): तुर्किये के अंकारा में 32 नाटो देशों के प्रमुखों की बैठक हुई, जिसका मुख्य उद्देश्य 2025 के हेग शिखर सम्मेलन के बाद हुई प्रगति की समीक्षा करना था।
- डोनाल्ड ट्रम्प की उपस्थिति: सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की कर्कश उपस्थिति और अमेरिकी हथियार प्रणालियों की श्रेष्ठता व रणनीतियों की सफलता पर जोर देना चर्चा का केंद्र रहा।
- वैश्विक हथियारों की कमी (ऑपरेशन एपिक फ्यूरी): ईरान के खिलाफ अमेरिकी-इजरायल अभियान ('ऑपरेशन एपिक फ्यूरी') के दौरान 850 से अधिक टोमाहॉक क्रूज मिसाइलों के इस्तेमाल से हथियारों का संकट पैदा हो गया है, क्योंकि इनकी वर्तमान उत्पादन दर केवल 85 प्रति वर्ष है।
- एशियाई और यूरोपीय मांगों में प्रतिस्पर्धा: अमेरिकी हथियारों के लिए एशियाई सहयोगियों की मांग और यूरोप की अपनी जरूरतों के बीच प्रतिस्पर्धा तेज हो गई है।
- भारतीय आपूर्ति में देरी: अमेरिकी फर्म 'जनरल इलेक्ट्रिक एयरोस्पेस' द्वारा भारतीय वायु सेना के 'तेजस' (LCA) विमानों के लिए आवश्यक F-404 इंजनों की आपूर्ति में देरी होना।
सम्मेलन में लिए गए ठोस निर्णय
अंकारा शिखर सम्मेलन से चार मुख्य प्रतिबद्धताएं सामने आईं:
- अनुच्छेद 5 के प्रति अटूट प्रतिबद्धता: 32 सदस्य देशों ने वाशिंगटन संधि के अनुच्छेद 5 (सामूहिक रक्षा) और ट्रांसअटलांटिक संबंधों के प्रति अपनी पूर्ण निष्ठा व्यक्त की।
- रक्षा बजट में ऐतिहासिक वृद्धि (5% GDP): "द हेग रक्षा प्रतिबद्धता" को सर्वसम्मति से स्वीकार करते हुए सभी सदस्यों ने 2035 तक अपनी-अपनी जीडीपी का कम से कम 5 प्रतिशत रक्षा पर खर्च करने का अभूतपूर्व संकल्प लिया (जो पहले 2% था)।
- यूक्रेन को निरंतर समर्थन: यूक्रेन की स्वतंत्रता, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए नाटो ने अपने "अटूट समर्थन" की घोषणा की।
- यूरोप-व्यापी रक्षा औद्योगिक आधार (DIB) का निर्माण: गठबंधन ने पूरे यूरोप में उच्च तकनीक और उच्च क्षमता वाले 'डिफेंस इंडस्ट्रियल बेस' (DIB) को विकसित करने का संकल्प लिया।
कार्यान्वयन पर ध्यान
अंकारा में मुख्य जोर राजनीतिक वादों को वास्तविक सैन्य क्षमता में बदलने पर था:
- निवेश और नवाचार: रक्षा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश, औद्योगिक क्षमता में वृद्धि और नई सैन्य तकनीकों के नवाचार पर ध्यान केंद्रित किया गया।
- उत्पादन बढ़ाने की चुनौती: यूरोप की प्रमुख रक्षा कंपनियां (जैसे MBDA और राइनमेटाल) गोला-बारूद और मिसाइल उत्पादन की कमी से जूझ रही हैं, जिन्हें दूर करना प्राथमिक लक्ष्य रखा गया है।
रूस के आरोप
अनियंत्रित विस्तारवाद का आरोप: रूस अमेरिका और यूरोपीय देशों पर नाटो के माध्यम से पूर्वी और मध्य यूरोप में अनियंत्रित विस्तार का आरोप लगाता है।
- प्रभाव क्षेत्र में हस्तक्षेप: पोलैंड, रोमानिया, बाल्टिक राज्यों और पूर्व सोवियत गणराज्यों के नाटो में शामिल होने को मास्को अपने ऐतिहासिक 'प्रभाव क्षेत्र' में सीधा अतिक्रमण मानता है।
- यूक्रेन पर आक्रमण का कारण: मास्को का तर्क है कि 2022 में यूक्रेन पर आक्रमण का मुख्य कारण कीव को नाटो में शामिल होने से रोकना था, हालांकि इसके कारण उल्टे फ़िनलैंड और स्वीडन नाटो में शामिल हो गए।
नाटो का रूपांतरण
नाटो ने बदलते रणनीतिक परिवेश के अनुसार खुद को बार-बार ढाला है:
- शीत युद्ध के बाद (1990-91): वारसॉ संधि के विघटन के बाद नाटो ने बाल्कन जैसे 'आउट-ऑफ-एरिया' (क्षेत्र से बाहर) ऑपरेशन्स पर ध्यान केंद्रित किया।
- 9/11 हमलों के बाद (2001): अमेरिका पर हुए हमलों के बाद नाटो ने वैश्विक आतंकवाद विरोधी अभियानों का रुख किया।
- वर्तमान युग: रूस और चीन की बढ़ती रणनीतिक साझेदारी और महाशक्ति टकराव के नए युग में नाटो एक बार फिर पारंपरिक राज्य-स्तरीय रक्षा और रक्षा औद्योगिक पुनरुद्धार की ओर लौट रहा है।
नाटो की आर्थिक-रणनीतिक भूमिका
अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता: 2022-2024 के बीच यूरोप के रक्षा खर्च का 50% हिस्सा अमेरिका से आया (जो 2019-2021 में मात्र 28% था)।
- विदेशी सैन्य बिक्री में उछाल: अमेरिकी कांग्रेस को यूरोपीय देशों द्वारा दिए गए सैन्य खरीद के ऑर्डर 2008 के बाद से चार गुना बढ़कर 2024 में 76 अरब डॉलर तक पहुंच गए हैं।
- उत्पादन का पुनर्गठन: यूक्रेन को लाइसेंस के तहत पैट्रियट वायु रक्षा प्रणालियों के निर्माण की अनुमति देना यह दर्शाता है कि नाटो अब केवल हथियारों का खरीदार नहीं, बल्कि उत्पादन का रणनीतिक नेटवर्क बन रहा है।
भारत के लिए चुनौतियाँ
खरीदारों के बाजार से विक्रेताओं के बाजार में बदलाव: यूरोपीय देशों द्वारा रक्षा बजट बढ़ाने से वैश्विक हथियारों का बाजार " सेलर्स ' मार्किट " में बदल गया है, जहाँ आपूर्तिकर्ता (विशेषकर अमेरिकी और यूरोपीय कंपनियां) मनमाने मूल्य और शर्तें तय कर रहे हैं।
- आपूर्ति में प्राथमिकता का संकट: पश्चिमी रक्षा निर्माता कंपनियां अब यूरोपीय और नाटो देशों के ऑर्डर्स को भारत जैसे गैर-नाटो सहयोगियों की तुलना में प्राथमिकता दे रही हैं।
- महत्वपूर्ण घटकों की आपूर्ति में देरी: अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (GE) द्वारा भारतीय LCA तेजस के लिए F-404 इंजनों की आपूर्ति में देरी इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है, जिससे भारत की परिचालन तैयारियों पर असर पड़ रहा है।
यह भारत के लिए चेतावनी क्यों है?
अत्यधिक व्यस्त आपूर्तिकर्ता: पश्चिमी देश और उनके रक्षा उद्योग अब अपने स्वयं के युद्धों और नाटो की प्राथमिकताओं को पूरा करने में व्यस्त हैं। संकट के समय भारत को तुरंत हथियार या स्पेयर पार्ट्स मिलने की संभावना घट गई है।
- क्रिटिकल टेक्नोलॉजी में एकाधिकार का जोखिम: एयर डिफेंस, प्रिसिजन-गाइडेड म्यूनिशन्स और इंटरसेप्टर मिसाइलों की वैश्विक कमी के कारण भारत को उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकियों से वंचित रखा जा सकता है।
- भू-राजनीतिक दबाव: नाटो के आर्थिक और रणनीतिक पुनरुत्थान के बीच भारत पर रूस के साथ अपने पारंपरिक रक्षा संबंधों को सीमित करने का दोहरा पश्चिमी दबाव बढ़ सकता है।
विश्लेषण
नाटो का रक्षा पर जीडीपी का 5% खर्च करने का निर्णय वैश्विक हथियारों की आपूर्ति श्रृंखला में भारी व्यवधान पैदा कर रहा है। पश्चिमी देशों की प्राथमिकताएं अब नाटो की अपनी आवश्यकताओं की ओर स्थानांतरित हो गई हैं, जिससे भारत जैसे बड़े रक्षा आयातकों के लिए सैन्य आपूर्ति में देरी और लागत में वृद्धि होना तय है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर अत्यधिक निर्भरता भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा जोखिम बन चुकी है।
आगे की राह
रक्षा क्षेत्र में पूर्ण आत्मनिर्भरता: भारत को 'आत्मनिर्भर भारत' पहल के तहत महत्वपूर्ण सैन्य प्रौद्योगिकियों—जैसे एआई (AI), ड्रोन, साइबर व इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों और जेट इंजन तकनीक में स्वदेशी विनिर्माण को अभूतपूर्व गति देनी होगी।
- सप्लाई चेन का विविधीकरण: किसी एक देश या ब्लॉक (जैसे केवल अमेरिका या केवल रूस) पर निर्भर रहने के बजाय भारत को इजरायल, फ्रांस और घरेलू निजी रक्षा क्षेत्र के साथ साझेदारी को और गहरा करना चाहिए।
- घरेलू आरएंडडी (R&D) में निवेश बढ़ाना: रक्षा अनुसंधान एवं विकास में निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहन देना चाहिए ताकि भविष्य के युद्धों के लिए स्वदेशी आपूर्ति श्रृंखला तैयार की जा सके।
निष्कर्ष
नाटो का अंकारा सम्मेलन भारत के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि बदलती वैश्विक भू-राजनीति में कोई भी विदेशी आपूर्तिकर्ता हमेशा विश्वसनीय नहीं रह सकता। अपने रक्षा बजट को बढ़ा रहे नाटो देशों के बीच भारत को अपनी सैन्य तैयारियों को बनाए रखने के लिए आयात-निर्भरता को समाप्त करना होगा। अत्याधुनिक रक्षा प्रौद्योगिकियों में त्वरित आत्मनिर्भरता और स्वदेशी औद्योगिक क्षमता का विकास ही भारत की राष्ट्रीय संप्रभुता को सुरक्षित रखने का एकमात्र मार्ग है।